नई अमेरिकी सुरक्षा नीति में भारत कहां

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उन्नीसवीं सदी के जर्मन राजनेता ओटो वॉन बिस्मार्क ने एक बार कहा था, ‘मूर्खों, शराबियों और अमेरिका पर ईश्वर की विशेष कृपा बरसती है।’ इससे पता चलता है कि किस्मत ने अमेरिका को क्या दिया है…

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जोरावर दौलत सिंह,इतिहासकार और रणनीतिकार

उन्नीसवीं सदी के जर्मन राजनेता ओटो वॉन बिस्मार्क ने एक बार कहा था, ‘मूर्खों, शराबियों और अमेरिका पर ईश्वर की विशेष कृपा बरसती है।’ इससे पता चलता है कि किस्मत ने अमेरिका को क्या दिया है। बड़े सागरों और प्रचुर संसाधनों से भरे महाद्वीप से घिरे होने के कारण अमेरिका थोड़े से भू-राजनीतिक प्रयासों से भी शांति और समृद्धि हासिल कर सकता था। उसके लिए दुनिया के हरेक कोने में अपनी ताकत दिखाना हमेशा से वैकल्पिक रहा है, अनिवार्य नहीं, पर उसकी नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (एनएसएस) में पश्चिमी गोलार्ध पर फिर से ध्यान केंद्रित करने की वकालत की गई है और कहा गया है कि ‘‘हम मुनरो सिद्धांत के लिए ‘ट्रंप कोरोलरी’ को लागू करेंगे’’।

ऐसी सुरक्षा रणनीति क्यों बनाई गई है, इसके कारण स्पष्ट हैं। पहला, विश्व में अमेरिका की आगामी भूमिका को लेकर पश्चिमी जगत में भयंकर टकराव चल रहा है, शायद एक तरह का गृहयुद्ध भी। ये मतभेद मामूली नहीं हैं, बल्कि पश्चिमी समाज की राजनीतिक व्यवस्था और राष्ट्रीय पहचान के साथ-साथ विश्व स्तर पर उनकी रणनीतिक भागीदारी से जुड़े हैं। सत्ता-प्रतिष्ठानों के उस दबाव को ट्रंप प्रशासन ने खुले तौर पर चुनौती दी है, जिसके तहत वर्चस्व की विफल रणनीति को और मजबूत करने की कोशिश की जा रही थी। इसी तरह, वैश्विक परिदृश्य भी समान रूप से अहम हैं, क्योंकि इनसे शक्ति संतुलन में ऐसे बदलाव आए हैं, जिनकी कल्पना दो दशक पहले तक नहीं की जा सकती थी। गैर-पश्चिमी देशों और उनके प्रमुख शक्ति-केंद्रों का भरोसा अमेरिकी नेतृत्व से डिगा है। इससे नए सुरक्षा विमर्श पैदा हो रहे हैं। यह असामान्य परिस्थिति ट्रंप और उनके साथियों को पश्चिम की ‘व्यापक रणनीति’ (अपनी दीर्घकालिक लक्ष्यों को पाने के लिए सभी साधनों के इस्तेमाल) में अहम बना देती है।

कुल मिलाकर, अमेरिका की नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति पश्चिमी गोलार्ध में दबदबा बनाने की वकालत करती है और यूरोप व एशिया में रणनीतिक प्रतिबद्धताओं को बनाए रखने के लिए अमेरिकी गठबंधन के अग्रिम पंक्ति के देशों पर जिम्मेदारियों का ‘भार डालने’ का प्रस्ताव करती है। चूंकि एनएसएस अमेरिकी गुट की मौजूदा प्रतिबद्धताओं पर मौलिक रूप से सवाल नहीं उठाती या नई सुरक्षा व्यवस्था की बात नहीं कहती (इसमें बहुध्रुवीयता का उल्लेख नहीं है), इसलिए इसे ऐसी भू-राजनीति के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसमें कोई महाशक्ति अपनी उपस्थिति, सैन्य प्रभाव व विदेश नीति से जुड़ी प्रतिबद्धताओं में तेजी से कमी करती है। इसे दुनिया भर में अमेरिका की प्रमुख स्थिति को कम खर्च करते हुए और शक्तिशाली देशों के साथ संघर्ष से बचते हुए संरक्षित करने की इच्छा के रूप में देखा जाना चाहिए।

यह सोच कुछ हद तक चालाकी भरा प्रतीत होती है और इस उलझन को दो अलग-अलग ढांचों के बीच अनसुलझे संघर्ष से समझा जा सकता है, जो हैं- विश्व व्यवस्था के प्रति ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ की सोच और व्यापक अंतरराष्ट्रीय भूमिका में निहित डीप स्टेट के हित। हालांकि, एनएसएस इस बात को गलत ठहराती है कि अमेरिका में व्यापक पैमाने पर अंतरराष्ट्रीय प्रभुत्व की वैचारिक जड़ें मौजूद हैं।

एनएसएस साफ करती है कि रूस के साथ नाटो का टकराव विफल रहा और चीन को नियंत्रित करना अब व्यावहारिक नहीं है। यूक्रेन युद्ध को खत्म करने के लिए बातचीत करना, युद्ध के अनपेक्षित विस्तार को रोकना, रूस के साथ रणनीतिक स्थिरता को फिर से कायम करना व नाटो के विस्तार को रोकने में ही अब अमेरिका के ‘बड़े हित’ हैं। चीन के बारे में यह कहती है कि उसके समुद्री विस्तार को रोकने का प्रयास इस तरह से किया जाए कि संघर्ष से बचा जा सके और ‘पारस्परिक रूप से लाभकारी’ आर्थिक निर्भरता बनी रहे। चीन को उन्नत एच200 सीरीज के चिप निर्यात करने संबंधी व्हाइट हाउस के फैसले को इसी रणनीति का हिस्सा मानना चाहिए। संघर्ष से बचने का एक अन्य उदाहरण चीन-जापान के बीच पैदा तनाव के दौरान बीजिंग को अमेरिका द्वारा दिया गया हालिया आश्वासन है।

यूरोप के बारे में एनएसएस में कहा गया है कि ‘यूरोपीय देशों के भीतर यूरोप की मौजूदा दिशा के प्रति प्रतिरोध पैदा करना होगा’। अमेरिका चाहता है कि यूरोप ‘अपने सभ्यतागत आत्मविश्वास को फिर से हासिल करे’। यह काफी हद तक ट्रंप द्वारा घरेलू स्तर पर किए गए पुनर्जागरण के प्रयास जैसा होगा। यदि ये घोषणाएं स्पष्ट नीतियों का रूप ले सकीं, जो यूरोपीय संघ में बची हुई वैश्विक व्यवस्थाओं को कमजोर करती हैं, तो इस सोच का यूरोप की भू-राजनीति और भविष्य में पश्चिमी देशों के स्वरूप पर गहरा प्रभाव पड़ेगा।

भारत के लिए इसके क्या निहितार्थ हैं? भारत का संक्षिप्त उल्लेख आश्वस्तकारी संकेत देने के इरादे से किया गया है। फिर भी, संपूर्ण दस्तावेज के संदर्भ और इसके अंतर्निहित वैचारिक व भू-राजनीतिक आधार बताते हैं कि नई दिल्ली यदि पुराने प्रतिमानों पर कायम रही, तो उसे सचेत रहना होगा। एकध्रुवीयता के शीर्ष काल में अमेरिका ने भारत को लेकर जो कल्पना की थी, वह दौर अब बीत चुका है और विश्व स्तर पर बदलता शक्ति समीकरण वास्तविक व स्थायी है।

एनएसएस को इस रूप में नहीं देखा जाना चाहिए कि भारत अब भी वाशिंगटन के रडार पर मौजूद है, बल्कि यह समझने के लिए इस पर गौर करना चाहिए कि अमेरिका पश्चिमी प्रशांत में चीन के प्रति अपने ‘दुश्मन-दोस्त’ रवैये में भारत को किन उद्देश्यों के लिए उपयोगी मानता है? निस्संदेह, भारत अब भी अमेरिका के लिए अहम है। हालांकि, इस साल मध्य-पूर्व में अमेरिकी नेतृत्व वाली सुरक्षा व्यवस्था में पाकिस्तान के शामिल होने पर एनएसएस की चुप्पी यही बताती है कि यह उप-महाद्वीप अमेरिका-भारत रिश्ते में टकराव व अनिश्चय का क्षेत्र बन गया है। पाकिस्तान व उसकी सेना के प्रति अमेरिकी प्रतिबद्धता, जो पिछली नीति का एक स्थायी कारक है, भू-राजनीतिक स्तर पर मजबूत हुई है, और यह विडंबना है कि इस नीति को अमेरिकी डीप स्टेट का समर्थन हासिल है। इस वजह से यह ऐसा दुर्लभ मसला भी है, जिस पर विभाजित अमेरिका में भी सहमति है।

यह राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति कहती है, ‘अमेरिका द्वारा एटलस की तरह पूरी विश्व व्यवस्था को सहारा देने के दिन अब लद गए हैं’। लगता यही है कि बिना साफ तौर पर इसका समर्थन किए, अमेरिका ने बहुध्रुवीय विश्व की जरूरत को मान लिया है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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