नीतीश कुमार ने रखी मजबूत नींव
आधुनिक बिहार के इतिहास में 24 नवंबर, 2005 सिर्फ सत्ता-परिवर्तन की तारीख नहीं है, बल्कि यह एक राज्य की खोई हुई गरिमा की पुनर्स्थापना का प्रस्थान-बिंदु है।बिहारवासियों के दिल में बसे नीतीश कुमार…

संजय कुमार झा, सांसद व कार्यकारी अध्यक्ष, जद-यू
आधुनिक बिहार के इतिहास में 24 नवंबर, 2005 सिर्फ सत्ता-परिवर्तन की तारीख नहीं है, बल्कि यह एक राज्य की खोई हुई गरिमा की पुनर्स्थापना का प्रस्थान-बिंदु है।
बिहारवासियों के दिल में बसे नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री के रूप में करीब दो दशकों का सबसे लंबा कार्यकाल, इसके इतिहास के स्वर्णिम व परिवर्तनकारी अध्याय के रूप में दर्ज हो चुका है। अब जब नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद का त्याग कर दिया है, तब यह उनकी सेवा यात्रा का विराम नहीं, बल्कि एक नया विस्तार है। वह आगे भी अपने बिहार परिवार की सेवा के साथ-साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की नई सरकार का मार्गदर्शन करते रहेंगे।
किसी भी राजनेता के योगदान का वास्तविक मूल्यांकन उसके द्वारा छोड़ी गई विरासत के साथ-साथ उन चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों से भी होता है, जिनमें उसने कार्यभार संभाला था। वर्ष 2005 का वह दौर याद कीजिए, जब बिहार निराशा के घनघोर अंधेरे में डूबा हुआ था। तब सूर्यास्त के बाद लोग भयवश घरों में कैद होने को मजबूर हो जाते थे। जंगलराज की छवि ने देश-दुनिया में बिहारियों का सिर शर्म से झुका दिया था। उस काले कालखंड से बाहर निकलकर आज का बिहार यदि आत्मविश्वास से लबरेज है, तो इसके पीछे नीतीश कुमार का वह भगीरथ संकल्प है, जिसने विकास की गंगा को बिहार के हर गांव की आखिरी पगडंडी तक पहुंचाया है।
नीतीश कुमार की लंबी राजनीतिक यात्रा में जो उपाधि सबसे स्थायी रही, वह है सुशासन बाबू। मुख्यमंत्री के रूप में अपनेे पहले कार्यकाल में शासन-प्रशासन को जनता के अनुरूप सुधारने के जो व्यापक प्रयास उन्होंने किए थे, उनको आज भी याद किया जाता है और आगे भी किया जाएगा। यह छवि उनकी उस प्रशासनिक दक्षता का प्रमाण है, जिसने बिहार में दशकों बाद कानून का राज स्थापित किया और इसे न्याय के साथ विकास के पथ पर अग्रसर किया। उनके कार्यकाल में बिहार के बजट का आकार जिस तरह 14.5 गुना से अधिक बढ़ा, वह किसी करिश्मे से कम नहीं है। वर्ष 2004-05 में महज 23,885 करोड़ रुपये का बिहार-बजट अब 2026-27 में 3,47,590 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। यह विशाल आंकड़ा इस बात का गवाह है कि मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार के कुशल नेतृत्व में एक बीमारू राज्य नकारात्मक विकास दर से निकलकर देश का ‘ग्रोथ इंजन’ बन गया।
गांधी, लोहिया, जेपी और कर्पूरी ठाकुर जैसी महान विभूतियों की वैचारिक विरासत को यदि किसी ने फाइलों से निकालकर धरातल पर साकार किया, तो वह नीतीश कुमार हैं। सत्ता उनके लिए सुख-भोग का साधन नहीं, बल्कि विकास का लाभ हर गांव, हर गली और हर घर तक पहुंचाने का माध्यम बनी। बिहार में संसाधनों की भारी कमी के बावजूद उन्होंने साबित किया कि यदि नेतृत्व सक्षम और ईमानदार हो, तो असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है।
नीतीश कुमार के प्रशासनिक दृष्टिकोण में सोशल इंजीनियरिंग की वैज्ञानिक सूक्ष्मता स्पष्ट रूप से दिखती है। चाहे हर घर तक बिजली पहुंचाने का लक्ष्य हो, हर टोले को पक्की सड़क से जोड़ना हो या फिर हर जिले में इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज खोलना, उनकी नीतियों में कभी किसी जाति, धर्म या क्षेत्र के साथ भेदभाव नहीं दिखा। सभी घरेलू उपभोक्ताओं को 125 यूनिट फ्री बिजली देने जैसे फैसले उनकी गहरी जन-सरोकारी सोच को दर्शाते हैं।
नीतीश कुमार के शासनकाल का एक सबसे क्रांतिकारी पक्ष आधी आबादी का ऐतिहासिक सशक्तीकरण है। उन्होंने साइकिल और पोशाक जैसी दूरगामी योजनाओं के जरिये बेटियों को सपनों की उड़ान भरने के लिए पंख दिए। ग्राम पंचायतों, नगर निकायों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण देकर महिलाओं को विकास की मुख्यधारा का हिस्सा बनाया। उनकी दूरदर्शिता ने न केवल बिहार की सामाजिक संरचना को बदला, बल्कि एक ऐसी मौन क्रांति को जन्म दिया, जिससे बिहार के राजनीतिक फलक पर एक सशक्त महिला वोट बैंक का उदय हुआ।
कोई दोराय नहीं कि नीतीश कुमार के बिहार विकास मॉडल की चर्चा आज वैश्विक स्तर पर होती है। दुनिया जब जलवायु परिवर्तन के संकट से जूझ रही थी, तब उन्होंने जल-जीवन-हरियाली जैसा अभियान शुरू कर प्रकृति और प्रगति के संतुलन का मार्ग दिखाया। संयुक्त राष्ट्र द्वारा उन्हें ‘क्लाइमेट लीडर’ पुकारा जाना इस बात का प्रमाण है कि उनकी दृष्टि केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं थी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करने की थी।
सार्वजनिक जीवन में नीतीश कुमार ने सादगी और शुचिता के जो मानक स्थापित किए, वे विरल हैं। सादा जीवन उच्च विचार को उन्होंने केवल नारों में नहीं, बल्कि अपने आचरण मेें जिया। वह भारतीय राजनीति के उन विरले नेताओं में से हैं, जिन्होंने मूल्यों की राजनीति का अनुकरणीय उदाहरण पेश किया है। बिहार के लोगों के लिए वह केवल मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि एक बेहद सहृदय और जिम्मेदार अभिभावक की भूमिका में रहे हैं और सदैव बने रहेंगे।
वर्ष 2005 की न्याय यात्रा से लेकर वर्ष 2026 की समृद्धि यात्रा तक, नीतीश कुमार ने बिहार के नवनिर्माण की जो लंबी लकीर खींची है, उसकी गूंज सदियों तक रहेगी। इस दौरान प्रदेश की निःस्वार्थ सेवा से उन्होंने बिहारवासियों के दिल में अपनी अमिट छाप छोड़ी है। आधुनिक बिहार के इस विश्वकर्मा ने न केवल राज्य के जर्जर बुनियादी ढांचे का कायाकल्प किया है, बल्कि देश-दुनिया में बसे बिहारियों के खोऐ हुए आत्मसम्मान को भी पुनर्स्थापित किया है। आज ‘बिहारी’ शब्द अपमान का नहीं, बल्कि प्रतिभा, परिश्रम और प्रगति का वैश्विक प्रतीक बन गया है।
मुख्यमंत्री पद से नीतीश कुमार का इस्तीफा पद का मोह त्यागने का उनका साहस है, अपने दायित्वों से विमुख होना नहीं। बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में उनका सबसे लंबा और ऐतिहासिक कार्यकाल भले ही पूरा हो गया है, लेकिन बिहार की सेवा की उनकी अनंत यात्रा आगे भी अनवरत जारी रहेगी। मुझे पूरा विश्वास है कि नीतीश कुमार ने विकसित बिहार की जो मजबूत नींव रखी है, नई सरकार उस पर बिहार के भविष्य की बुलंद इमारत खड़ी करेगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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