मतदाता पुनरीक्षण पर फिजूल हंगामा

Apr 13, 2026 11:12 pm ISTHindustan लाइव हिन्दुस्तान
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मतदाता सूची ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) को लेकर एक बार फिर बड़ी हलचल है। उत्तर प्रदेश में लगभग ढाई करोड़ वोट इस प्रक्रिया के कारण कट गए हैं। पूरे देश में सर्वाधिक संख्या में वोट कटने का रिकॉर्ड उत्तर प्रदेश के नाम है…

मतदाता पुनरीक्षण पर फिजूल हंगामा

सूर्यकांत द्विवेदी,वरिष्ठ पत्रकार

मतदाता सूची ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) को लेकर एक बार फिर बड़ी हलचल है। उत्तर प्रदेश में लगभग ढाई करोड़ वोट इस प्रक्रिया के कारण कट गए हैं। पूरे देश में सर्वाधिक संख्या में वोट कटने का रिकॉर्ड उत्तर प्रदेश के नाम है। जाहिर है, बड़ा प्रदेश है, तो नाम भी ज्यादा कटेंगे। राज्य के उप-मुख्यमंत्री बृजेश पाठक के विधानसभा क्षेत्र में तो 34 प्रतिशत वोट कम हो गए हैं। स्वाभाविक ही पार्टियां अपना-अपना गणित निकाल रही हैं, मगर हल्ला सिर्फ इस बात पर है कि किसके वोट कटे और क्यों कटे? कौन बाहरी है? किसके पास वैध दस्तावेज हैं और किसके पास नहीं?

सवाल यह है कि एसआईआर की आवश्यकता क्यों पड़ी? तर्क भले कुछ भी दिए जा रहे हों, घुसपैठियों को मुद्दा बनाया जा रहा हो या इसे वोटिंग प्रतिशत बढ़ाने की कवायद बताई जा रही हो, लेकिन इसके कुछ और भी कारण हैं और ये वे कारण हैं, जिनके बारे में राजनीतिक लोग बात नहीं कर रहे। हमारे देश में वोटिंग का राष्ट्रीय औसत 58.48 प्रतिशत है। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में वोटिंग प्रतिशत 66.44 दर्ज किया गया था, जबकि 2019 में 67.40 फीसदी। यह वह वक्त था, जब देश में नरेंद्र मोदी की लहर थी। उन्होंने पूरी धमक के साथ सत्ता संभाली थी। साल 2024 में मतदान लगभग एक फीसदी गिरकर 66.10 प्रतिशत रहा। साल 2024 के आम चुनाव में सबसे ज्यादा मतदान लक्षद्वीप में 84.01 प्रतिशत और सबसे कम बिहार में 56.19 फीसदी हुआ था।

गौर कीजिए, साल 2014 में यूपी की 73 सीटें भाजपा गठबंधन के खाते में आई थीं। यह आंकड़ा इसलिए चौंकाता है, क्योंकि तब राज्य में मतदान प्रतिशत 54.96 ही था। 2024 में विभिन्न चरणों में हुए मतदान में अधिकतम 66.65 फीसदी और न्यूनतम 58.02 प्रतिशत वोट पड़े थे। हार-जीत का यह आंकड़ा चौंकाने वाला है। 2014 में कम मतदान में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में विपक्ष का सूपड़ा साफ कर दिया था, जबकि 2024 के अपेक्षाकृत अधिक मतदान में उसे सिर्फ 33 सीटें मिलीं। इस आंकड़े से ही एसआईआर का काफी सच सामने आ जाता है।

उत्तर प्रदेश में पहले कुल मतदाता 15.44 करोड़ थे, जो एसआईआर के बाद अब 13.39 करोड़ रह गए हैं। इसके बाद सबसे ज्यादा तमिलनाडु में 97.37 लाख, पश्चिम बंगाल में 91 लाख, गुजरात में 73.73 लाख, मध्य प्रदेश में 42.74 लाख, राजस्थान में 41.79 लाख, छत्तीसगढ़ में 27.34 लाख, केरल में 24.08 लाख, गोवा में 1.27 लाख, पुडुचेरी में 1.03 लाख, अंडमान-निकोबार में 64,014 और लक्षद्वीप में 1,429 वोट कटे। पुडुचेरी व असम में वोट कटने के बाद भी मतदान का रिकॉर्ड बना है। पुडुचेरी में 89.83, असम में 85.38 और केरल में 78.03 प्रतिशत मतदान हुआ। इसमें एसआईआर की भूमिका कितनी है, अभी कहना कठिन है, पर ये आंकड़े चौंकाते हैं। सामान्य गणित लगाएं, तो एसआईआर के बाद मतदान प्रतिशत कम होना चाहिए था।

कुछ साल पहले तक देश में 46 फीसदी लोग वोट नहीं डालते थे। लोकतंत्र के महापर्व के प्रति उनकी उदासीनता थी। अब राष्ट्रीय मतदान दर के औैसत में कुछ सुधार जरूर हुआ है, पर अभी भी वोट डालने और न डालने वालों के बीच का अंतर काफी है। लगभग 35-40 फीसदी आबादी अब भी वोट ही नहीं डालती और 35 से 37 प्रतिशत मत हासिल करने पर ही सरकारें बन जाती हैं। हमारे देश के राजनीतिक विमर्श से यह मुद्दा गौण है कि कितने प्रतिशत मतदाताओं ने वोट नहीं डाला और क्यों नहीं डाला?

पूरे देश में एसआईआर के तहत वोट कटने का प्रतिशत महज सात है, और जो सात फीसदी वोट कटे हैं, वे निष्क्रिय मतदाता माने गए हैं। निष्क्रिय मतदाता में तीन प्रकार के नागरिक शामिल हैं- दोहरे मतदाता पहचान-पत्र वाले, यानी जिनका वोट एक से अधिक जगह था। दूसरा, जिनकी मृत्यु हो चुकी है और तीसरा, जिनके पास कोई मान्य कानूनी दस्तावेज नहीं था। अगर सात फीसदी वोट कटने को ही आधार मानें, तो देश में उदासीन वोटरों की संख्या अब भी कहीं अधिक है। निस्संदेह, वोट न डालने वाले सभी मतदाता फर्जी नहीं हैं। विडंबना यह है कि हमारे नौजवानों में इस महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति सबसे ज्यादा उदासीनता देखी गई है। देश के 21 करोड़ युवा मतदाताओं में से औसतन सिर्फ 22 प्रतिशत वोट देते हैं।

ऐसे ही, श्रमिकों, खेतिहर मजदूरों व निम्न मध्यवर्ग में भी वोट डालने के प्रति विशेष आकर्षण नहीं है। मतदान के दिन भी वे अपने काम पर होते हैं। ये श्रमिक स्थानीय नहीं होते। वे प्रवासी मजदूर होते हैं। जहां कहीं सस्ते पारिश्रमिक पर वे उपलब्ध होते हैं, ठेकेदार उन्हें बुला लेता है। ईंट भट्ठों व निर्माण स्थलों पर काम करने वाले ऐसे मजदूरों की तादाद बहुत अधिक है। इनके पास कोई दस्तावेज नहीं होता, इसलिए एक बहुत बड़ा वर्ग मतदान से वंचित रहता है। चुनावी दौरों में अक्सर ऐसे इलाके मिल जाते हैं, जहां के मेहनतकश लोगों को प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का नाम तक नहीं पता होता।

यह एसआईआर लगभग दो दशक बाद हो रहा है। जाहिर है, इस बीच स्थिति काफी कुछ बदल चुकी है। बहुत सारे लोग देश या राज्य के दूसरे हिस्से में जा बसे हैं। काफी सारे लोगों का स्वर्गवास हो चुका है।

एक तथ्य यह भी है कि दो दशक पहले देश की राजनीति में ‘बूथ कैप्चरिंग’ का जोर था। मतपेटियां लूट ली जाती थीं। हमने यह नजारा भी देखा है, जब खेत में काम करने वालों से पूछा जाता था, क्या वोट डालने जाओगे और भोला मजदूर प्रश्नकर्ता को ही अपना वोट डाल देने को अधिकृत कर देता था। तमाम नेताओं और पार्टियों ने इन्हीं मजदूरों के नाम पर फर्जी वोट डलवाए। पहले दस्तावेज की ज्यादा औपचारिकता नहीं थी। प्रधान से लेकर पार्षद तक यह काम कर लेता था।

एसआईआर से देश की राजनीति बदलेगी, इसमें संदेह है। इस संदेह के कारण हैं। घुसपैठियों से लेकर धार्मिक और जातिगत आधार पर वोट कटने के आंकड़े तो सामने आएंगे नहीं। लगता है, ज्यादातर वोट निष्क्रिय मतदाताओं के ही कटे हैं। तथ्य यही है, तमाम कोशिशों के बावजूद अभी तक छोटे राज्यों में ही मतदान का स्तर 70-80 प्रतिशत तक पहुंचा है। यूपी जैसे बड़े राज्य में यह आज भी 65 से 67 प्रतिशत रहता है। ऐसे में, सात से 10 प्रतिशत के अंतर से सियासी समीकरण कितना बदलेंगे, कह नहीं सकते, क्योंकि ये तो पहले भी वोट नहीं देते थे, इनके नाम कट गए, तो क्या फर्क पड़ेगा? इंतजार कीजिए। 2027 दूर नहीं है। उत्तर प्रदेश चुनाव के परिणाम तस्वीर को काफी साफ कर देंगे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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