
किताबों से नाता कभी न टूट पाएगा
एक शिकायत मैं पिछले पचास वर्षों से सुनता आ रहा हूं। विद्वत-जन बड़े चिंतित स्वर में घोषित करते रहे हैं कि किताबों के पाठक ही नहीं बचे हैं। अभी मैंने लिखना शुरू ही किया था कि इस तरह के आप्त वचन कानों में पड़ने लगे और कई बार मेरे निराश मन में उथल-पुथल हुई…
विभूति नारायण राय,पूर्व कुलपति व साहित्यकार
एक शिकायत मैं पिछले पचास वर्षों से सुनता आ रहा हूं। विद्वत-जन बड़े चिंतित स्वर में घोषित करते रहे हैं कि किताबों के पाठक ही नहीं बचे हैं। अभी मैंने लिखना शुरू ही किया था कि इस तरह के आप्त वचन कानों में पड़ने लगे और कई बार मेरे निराश मन में उथल-पुथल हुई कि जब कोई पढ़ने वाला ही नहीं है, तो फिर लिखा किसके लिए जाए? गनीमत हुई कि मैंने देख लिया कि जो लेखक दुखी थे कि उन्हें कोई पढ़ता नहीं, वे साल-दर-साल अपनी नई किताबें छपवाते जा रहे थे और जो प्रकाशक रॉयल्टी देते समय किताबें न बिकने का रोना रोते रहते, वे हर साल अपने कैटलॉग में अतिरिक्त पन्ने जोड़ रहे थे। इसलिए मेरा लिखना भी जारी रहा।
सबसे दिलचस्प तो पिछली शताब्दी के अंतिम दशक में हँस के संपादक राजेंद्र यादव की घोषणा थी कि यह समय इतना रचना-विरोधी है कि अब लिखने का कोई कारण नहीं बचा। यह अलग बात है कि भाई लोगों ने न लिखने के कारणों पर ही खूब लिखा। हाल ही में उपन्यासकार, कवि विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास दीवार में खिड़की रहती थी की साल भर की रॉयल्टी तीस लाख रुपये देकर एक प्रकाशक ने यह भ्रम भी तोड़ दिया कि पुस्तकें बिकती नहीं।
इस साल नई दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में प्रवेश के लिए एक किलोमीटर लंबी कतार देखकर मन आश्वस्त हो गया कि न सिर्फ पाठक कम नहीं हुए हैं, बल्कि खरीदकर पढ़ने वालों की संख्या अभी भी अच्छी-खासी है। इतनी भीड़ तो पटना या कोलकाता के पुस्तक मेलों में दिखती है, पर अबकी बार देश की राजधानी में भी दिख रही थी। देश के दूर-दूर के हिस्सों से पुस्तक प्रेमी मेले में आए थे और एक-दूसरे के कंधे से कंधा रगड़ते हुए न सिर्फ किताबें उलट-पुलट रहे थे, बल्कि खरीद भी रहे थे। हर साल की तरह इस बार भी मेरी दिलचस्पी यह जानने की थी कि किस तरह की पुस्तकें बिक रही हैं? बच्चों के स्टॉलों पर हर साल की तरह भीड़ थी। वे अपने अभिभावकों की झिड़कती नजरों की अवहेलना करते हुए किताबें उलट-पलट रहे थे, उन्हें गिरा-पड़ा रहे थे और खरीदवाने की जिद कर रहे थे। दूसरे ज्यादातर स्टॉल भी अपनी क्षमता भर भरे हुए थे।
पिछले कुछ वर्षों से मेले में घूमते समय मेरी दिलचस्पी यह समझने में भी रही है कि किस तरह की पुस्तकें पढ़ी जा रही हैं? मैंने इस बार ज्यादा समय हिंदी पुस्तकों के बीच बिताया और यह देखकर मन प्रसन्न हुआ कि पिछले कुछ वर्षों की तरह इस बार भी ज्यादा मांग कथेतर साहित्य की थी। कंप्यूटर, इंजीनियरिंग, मेडिकल, इतिहास, मीडिया या अंतरराष्ट्रीय संबंध जैसे विषयों पर पुस्तकों की भरमार थी। ज्योतिष, भूत-प्रेत, जादू-टोने की किताबों की भी जबरदस्त मांग थी। एक स्टॉल पर एआई, यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर उपलब्ध किताबों की लूट मची हुई थी। मैं खड़े होकर इन किताबों को एक-एक कर खरीदे जाते देखता रहा। हिंदू, इस्लामी, मसीही या बौद्ध धर्मों की किताबों के स्टॉल भी खचाखच भरे हुए थे। लोगों में ज्ञान की भूख दिख रही थी और वे इसे छपे हुए शब्दों के जरिये हासिल करना चाहते थे।
यह एक अच्छी बात है कि अब हिंदी सिर्फ कहानी, कविता या नाटक की ही भाषा नहीं रह गई है। ज्ञान के विभिन्न अनुशासनों तक रसाई इसके माध्यम से हो सकती है। कुछ दशक पूर्व शुरू हुई यह प्रक्रिया अब परवान चढ़ गई प्रतीत होती है। वर्षों पूर्व जब मैं हिंदी विश्वविद्यालय में था, तब मैंने कुछ छात्रों से हिंदी प्रकाशकों के कैटलॉग का अध्ययन कराया। इस अध्ययन से यह दिलचस्प तथ्य उजागर हुआ कि उनमें सिर्फ 27 प्रतिशत पुस्तकें उस श्रेणी की थीं, जिनको हम रचनात्मक साहित्य कहते हैं। शेष पुस्तकें कथेतर विधाओं में थीं।
उन दिनों कंप्यूटर का सबसे ज्यादा शोर था, अत: सबसे अधिक पुस्तकें भी उसी पर थीं। आज एआई में उत्सुकता बढ़ी है, इसलिए स्टॉलों पर उससे जुड़ी पुस्तकों की भरमार थी। मेरी नजर में एक अच्छी बात यह थी कि इन पुस्तकों में आमफहम भाषा का इस्तेमाल हो रहा था। अधिकतर लेखक डॉ रघुबीर की पारिभाषिक शब्दावली से बच रहे थे और जहां किसी मुश्किल हिंदी तकनीकी शब्द का प्रयोग हुआ भी, वहीं उसके साथ अंग्रेजी पर्याय भी मिला। पुस्तकों को उलटने-पुलटने से यह जरूर लगा कि वे मुख्य रूप से अंग्रेजी किताबों का भाषांतर हैं, पर यह भी माना जा सकता है कि इन्हीं पुस्तकों से अर्जित ज्ञान से मौलिक पुस्तकें रची जा सकेंगी। हमारे सामने डॉ गुणाकर मुले का उदाहरण है ही।
इस साल के पुस्तक मेले में घूमते हुए मुझे पिछले कुछ दिनों से सबसे ज्यादा दिए जाने वाले इस तर्क की व्यर्थता भी समझ में आई कि इंटरनेट ने पुस्तकों को अप्रासंगिक बना दिया है। 19वीं शताब्दी में अखबारों के आने के बाद इंग्लैंड में कहा गया कि अब पाठकों को जीवन से जुड़ी वास्तविक कहानियां पढ़ने को मिलेंगी, तो फिक्शन या कथा साहित्य कौन पढ़ेगा? हालांकि, हुआ कुछ ऐसा कि अखबारों को अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए डिकेंस के उपन्यास धारावाहिक छापने पड़े। कुछ-कुछ ऐसा ही इंटरनेट आने के बाद आज पुस्तकों के साथ हो रहा है। आज उनको बेशुमार पाठक ऑनलाइन मिल रहे हैं। पुस्तकें वही हैं, केवल उनका फॉर्मेट बदला है। ऑफसेट प्रिंटिंग के बाद पुस्तक प्रकाशन की दुनिया में सबसे बड़ी क्रांति है यह। एक छोटे से लैपटॉप पर आप पूरा पुस्तकालय लेकर चल सकते हैं। नतीजे में आप यात्रा करते समय पहले से अधिक सहयात्रियों को पढ़ने में डूबा पाते हैं। वे छपे नहीं, मगर स्क्रीन पर चमकते शब्द पढ़ रहे होते हैं।
स्क्रीन पर अपार पाठ्य सामग्री उपलब्ध होने के बावजूद पुस्तक मेलों में इतनी भीड़ क्यों आ रही है? छपे हुए शब्द केवल ज्ञान, जिज्ञासा और मनोरंजन की विशाल दुनिया के कपाट नहीं खोलते, वे हमें गंध, स्पर्श और अनुभूति की अनिर्वचनीय भूल-भुलैया में भी ले जाते हैं। इन दिनों मित्र लेखक भारत भारद्वाज काफी हद तक अशक्त बिस्तर पर लेटे-लेटे अपने बुक शेल्फ को निहारते हैं और बीच-बीच में किसी किताब को पास मंगवाकर छूते हैं। वह किताबों को पढ़ नहीं सकते, पर उनका स्पर्श ही काफी है, उनकी गंध नथुनों में भरकर चैन से सो सकते हैं। जब तक उनके जैसे पुस्तक प्रेमी मौजूद हैं, पुस्तक मेलों में इसी तरह भीड़ आती रहेगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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