समान नागरिक संहिता आज की बड़ी जरूरत

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समान नागरिक संहिता (यूसीसी) फिर खबरों में है। 6 अप्रैल को भारतीय जनता पार्टी के 46वें स्थापना दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ के साथ-साथ इस अधूरे वायदे की भी चर्चा की…

समान नागरिक संहिता आज की बड़ी जरूरत

शेषाद्रि चारी,पूर्व संपादक, ऑर्गेनाइजर

समान नागरिक संहिता (यूसीसी) फिर खबरों में है। 6 अप्रैल को भारतीय जनता पार्टी के 46वें स्थापना दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ के साथ-साथ इस अधूरे वायदे की भी चर्चा की। उन्होंने बताया कि इस पर गंभीर और सकारात्मक बातचीत चल रही है। साल 2023 में भी प्रधानमंत्री ने संकेत दिया था कि सरकार यूसीसी पर गंभीरता से काम कर रही है। 22वें विधि आयोग ने भी इस बाबत सार्वजनिक और धार्मिक संस्थानों सहित तमाम साझेदारों से सुझाव मांगे थे।

इसे तैयार किया जाना चाहिए। इसकी चर्चा संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के रूप में तो है ही, सर्वोच्च न्यायालय ने भी इसका समर्थन किया है। उसने कहा था- समान नागरिक संहिता परस्पर विरोधी विचारधाराओं वाली विभिन्न निष्ठाओं को दूर करके राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देगी। निस्संदेह, समान नागरिक संहिता भारतीय संविधान के मूल सिद्धांत धर्मनिरपेक्षता को मजबूत करने का एक अनिवार्य प्रयास है, फिर भी इसे हमेशा धार्मिक चश्मे से देखा जाता है। इस पर बहस आजादी से पहले से चली आ रही है।

मैं यहां अक्तूबर 1840 की लेक्स लोकी रिपोर्ट का ज्यादा जिक्र नहीं करना चाहता, जिसने अपराधों, साक्ष्यों और अनुबंधों के लिए एकरूपता के महत्व पर जोर दिया। मगर 1941 में गठित बीएन राव समिति ने भी, जिसे उस समय हिंदू विधि समिति के नाम से जाना जाता था, सिफारिश की थी कि भारत सरकार अपने सभी नागरिकों के लिए एक ‘समान नागरिक संहिता’ अपनाए। उसका तर्क था कि इससे सभी नागरिकों के बीच, चाहे उनका धर्म कोई भी हो, राष्ट्रीय एकता और समानता को बढ़ावा मिलने में मदद मिलेगी। समिति ने यह भी सुझाव दिया था कि भारत के विभिन्न धार्मिक समुदायों के ‘व्यक्तिगत कानून’ प्राय: महिलाओं और अन्य कमजोर वर्गों के प्रति भेदभावपूर्ण रवैया रखते हैं।

प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी प्रत्येक धर्म के लिए अलग-अलग कानून की अवधारणा को खारिज करते हुए समान नागरिक कानून की वकालत किया करते थे, मगर विभाजन के बाद तीव्र धार्मिक ध्रुवीकरण को देखते हुए उन्होंने केवल हिंदू समाज के लिए समान कानून लाना उचित समझा। उन्होंने बीएन राव समिति की रिपोर्ट को हिंदू संहिता विधेयक के नाम पर लागू किया, जो केवल हिंदू समुदाय पर लागू होता था। इस कवायद का कई हिंदू नेताओं ने विरोध किया, जिनमें तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद, कांग्रेस अध्यक्ष व गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक गुरुजी गोलवलकर शामिल थे। उनके तर्क थे कि व्यक्तिगत कानूनों में सुधार धार्मिक समूहों द्वारा ही बढ़ाया जाना चाहिए, वह भी बाहरी कानूनों के बजाय आंतरिक सामाजिक सुधारों के माध्यम से।

यह समझना चाहिए कि यूसीसी का उद्देश्य उन विभिन्न कानूनों की जगह लेना है, जो एक-दूसरे के साथ बेमेल हैं और वर्तमान में विभिन्न धार्मिक समूहों पर लागू हैं। यह सभी के लिए एकसमान कानूनी ढांचा होगा। इन कानूनों में हिंदू विवाह अधिनियम, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम, भारतीय तलाक अधिनियम, पारसी विवाह और तलाक अधिनियम शामिल हैं। सच यही है कि शरिया (इस्लामी कानून) जैसे कुछ कानून अब तक संहिताबद्ध नहीं किए जा सके हैं, और वे पूरी तरह से मजहबी किताबों की मौलवियों द्वारा की गई व्यक्तिगत व्याख्या पर ही आधारित हैं।

यूसीसी में जो प्रस्ताव है, उनमें एक-विवाह, बेटे और बेटी को पैतृक संपत्ति में समान उत्तराधिकार, लैंगिक न्याय और वसीयत, दान, धार्मिक मामलों, अभिभावकत्व और बच्चों की कस्टडी साझा करने से जुड़े कानून होंगे, जो लैंगिक भेदभाव से परे और धर्म-निरपेक्ष होंगे। ‘ईसाई’ पश्चिमी देश, ‘कट्टर’ इस्लामी मुल्क और ‘उदार’ यूरोपीय राष्ट्रों के विपरीत, भारत धर्मों को परस्पर विरोधी नहीं मानता, बल्कि सभी का समान भाव से सम्मान करता है। हिंदू समाज ने बदलावों को स्वीकार किया है, अन्य धार्मिक समूहों को भी समय के साथ बदलना चाहिए। ऐसे बदलावों को ‘इस्लामोफोबिया’ के रूप में देखना गलत होगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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