इंसाफ के लिए जवाबदेही जरूरी

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देश के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) पद की शपथ लेने से कुछ ही दिनों पहले न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने सभी उच्च न्यायालयों से कहा था कि वे सुरक्षित फैसलों को सुनाने में लगने वाले समय और दूसरी जानकारियां सार्वजनिक करें…

Chief Editor, India Justice Report

माजा दारूवाला,चीफ एडिटर, इंडिया जस्टिस रिपोर्ट

देश के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) पद की शपथ लेने से कुछ ही दिनों पहले न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने सभी उच्च न्यायालयों से कहा था कि वे सुरक्षित फैसलों को सुनाने में लगने वाले समय और दूसरी जानकारियां सार्वजनिक करें। उनके इस निर्देश के पीछे दरअसल झारखंड का एक मामला था, जिसमें आजीवन कारावास की सजा पाए चार कैदियों को अपनी आपराधिक अपील पर सुनवाई पूरी होने के बाद लगभग तीन साल से इंतजार करना पड़ रहा था और अंतिम फैसला अधर में लटका था।

यह कोई पहली घटना नहीं है, जब शीर्ष अदालत को सुरक्षित फैसलों को लेकर चिंता जतानी पड़ी है। बड़ी संख्या में फैसलों को सुरक्षित रखे जाने की प्रवृत्ति पर हैरानी जताते हुए शीर्ष न्यायालय ने न्यायाधीशों से आपराधिक व सिविल मामलों की अपील को निपटाने के लिए छुट्टियों का सदुपयोग करने और मृत्युदंड व उम्रकैद से जुड़े मामलों में निरंतर सार्वजनिक घोषणा करने पर जोर दिया था। कहने की जरूरत नहीं कि यह अकेला झारखंड का मामला नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और दिल्ली में बड़ी संख्या में सुरक्षित रखे गए फैसलों ने पूरे न्याय-तंत्र पर सवाल खड़ा कर दिया है। ऐसे में, सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश पूरी तरह से जायज है कि उच्च न्यायालयों को स्थगन, देरी के कारण और फैसले अपलोड करने में लगने वाले समय का खुलासा करना चाहिए। ऐसा कोई कारण नहीं दिखता कि कारणों को उन्हीं लोगों से छिपाया जाए, जो इसके भुक्तभोगी हैं।

न्याय-तंत्र में पारदर्शिता और समय को लेकर न्यायमूर्ति सूर्यकांत की टिप्पणी लंबे समय से चली आ रही दिक्कतों की ओर इशारा करती हैं। उनके पास प्रधान न्यायाधीश के रूप में एक साल से कुछ ज्यादा समय है। जितना काम बचा है, उसे देखते हुए यह समय उनके लिए कम पड़ जाएगा। हालात यह हैं कि 2025 खत्म होने को आ गया और देश में जिला जजों के लगभग 25 प्रतिशत पद खाली हैं। हाईकोर्ट की हालत तो और भी खराब है, जहां लगभग 33 प्रतिशत पद रिक्त हैं। झारखंड के हाईकोर्ट में 40 प्रतिशत और जिला अदालतों में लगभग 50 प्रतिशत पद खाली हैं। सबसे ज्यादा प्रभावित इलाहाबाद, पटना, राजस्थान, ओडिशा, तेलंगाना के हाईकोर्ट हैं, जहां खाली पदों की संख्या 40 प्रतिशत से ज्यादा है। बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश की जिला अदालतों में 50 प्रतिशत से ज्यादा पद रिक्त हैं और वहां आधे से ज्यादा मामले तीन साल से लंबित हैं। देश भर में पिछले पांच सालों में लंबित मुकदमों में 20 से 30 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।

निस्संदेह, हर लिहाज से हमारे जजों पर काम का बहुत ज्यादा बोझ है। हाईकोर्ट के हरेक जज के जिम्मे लगभग 7,000 से 10,000 केस हैं। ये मामले लगभग तीन सालों से लंबित हैं। प्रत्येक जज को 2,500 से 3,500 तक सिर्फ आपराधिक मामले निपटाने पड़ते हैं। जिला न्यायाधीशों के पास लगभग 2,200 से 4,000 मुकदमे हैं, जिसमें आपराधिक मामले 1,500 से 2,500 के बीच होते हैं। यदि मुकदमा निपटाने की मौजूदा गति से हिसाब लगाएं, तो उच्च न्यायालयों को मौजूदा मामलों को निपटाने में 10-15 वर्ष लग जाएंगे।

दिसंबर 2024 में संसद में सरकार द्वारा दिए गए एक जवाब में प्रति 10 लाख की आबादी पर 21 जजों का अनुपात बताया गया था। यह अनुपात दशकों पहले स्वीकृत प्रति 10 लाख आबादी पर 50 जजों की संख्या के आधे से भी कम है। हालांकि, ‘इंडिया जस्टिस रिपोर्ट’ के आंकड़े बताते हैं कि वास्तव में देश में प्रति 10 लाख आबादी पर सिर्फ 15 जज काम कर रहे हैं। ऐसे में, जांच व सुनवाई की मुश्किल प्रक्रिया के आगे बढ़ने का इंतजार कर रहे लोगों की संख्या बढ़ रही है। देश की 1,360 जेलों में 75 प्रतिशत से ज्यादा कैदी विचाराधीन हैं। विचाराधीन कैदियों में से 30 फीसदी से भी कम दोषी सिद्ध हो पा रहे हैं। कैदियों के विचाराधीन रहने का औसत समय बढ़ गया है। साल 2019 में जहां यह समय तीन महीने का था, वहीं 2025 में बढ़कर 10 महीने से ज्यादा हो गया है। इनमें से एक बड़ा हिस्सा इससे भी ज्यादा समय से विचाराधीन है। कोर्ट की माथापच्ची और लगातार निगरानी के बावजूद, हालात बदलने के आसार नजर नहीं आ रहे।

रिक्तियों को भरकर हालात बदलने की कोशिश हो सकती है, मगर इतना ही काफी नहीं होगा। इसका कारण है कि भर्ती प्रक्रिया में लंबा समय लगता है। इसके अलावा अदालती पेचीदगियां और अफसरशाही से टकराव के कारण यह प्रक्रिया बाधित होती है। अगर जजों की सभी रिक्तियां रातों-रात भर भी दी जाएं, तो कोर्ट रूम व स्टाफ की कमी आड़े आ जाएंगी। एक भी रजिस्ट्रार, क्लर्क, स्टेनो या डाटा एंट्री ऑपरेटर के न होने से पूरी व्यवस्था ठप हो सकती है। फिर वही तारीख पर तारीख का चक्कर। आज जितने मामले लंबित हैं, उनमें चेक बाउंस व मोटर वाहन संबंधी 10-12 प्रतिशत मुकदमे हैं। इनमें भी 43 लाख तो केवल चेक बाउंस के मामले हैं। संक्षिप्त सुनवाई, फास्ट-ट्रैक कोर्ट, डिजिटल समन, ‘स्ट्रक्चर्ड कंप्लेंट फॉर्मेट’ जैसे उपायों को पायलट तौर पर अपनाकर ऐसे 40 प्रतिशत मुकदमों को पांच साल के अंदर कम किया जा सकता है।

न्यायिक रफ्तार उसकी सबसे सुस्त कड़ी से ही तय होती है और इसके मु्ख्य कारक हैं वकील। साल 2017 के एक अध्ययन में पाया गया कि दिल्ली में लगभग 80 प्रतिशत मामलों में बार-बार सुनवाई स्थगन, गैरहाजिरी और देर से ‘फाइलिंग’ की वजह से देरी होती है, इसके लिए ज्यादातर वकील जिम्मेदार होते हैं। उनकी इस आदत को दूर करने का एक तरीका जुर्माना लगाने में सख्ती बरतना हो सकता है। बदली हुई नागरिक सुरक्षा संहिता (सीआरपीसी) में सुनवाई स्थगन को सीमित करने और जुर्माना लगाने की कोर्ट की शक्तियों को स्पष्ट व मजबूत किया गया है। अगर जजों को प्रशिक्षण दिया जाए, तो कोर्ट का बोझ कम किया जा सकता है।

हम अक्सर न्यायपालिका की आलोचना करते हैं, लेकिन ‘कानून के राज’ में अदालतों के प्रति सम्मान बेहद जरूरी है। इसके लिए उनको भी दो सावधानियां बरतनी होंगी- पारदर्शिता और जवाबदेही। जजों को पूरी तरह पाक-साफ दिखना होगा। अगर प्रधान न्यायाधीश के निर्देश का असर होता है, तो यह देश के लिए मिसाल बनेगा। सुरक्षित फैसलों और केस निपटाने में लगने वाले समय के कारणों को सार्वजनिक करना एक छोटा काम है, जिसके गहरे सकारात्मक असर होंगे। हर सुधार ‘लीडर’ का अनुसरण करता है।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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