ऑपरेशन सिंदूर हमेशा याद किया जाएगा

May 06, 2026 11:21 pm ISTHindustan लाइव हिन्दुस्तान
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ऑपरेशन सिंदूर की वर्षगांठ केवल एक तारीख नहीं है, यह भारत की रणनीतिक सोच में निर्णायक बदलाव पर विचार करने का क्षण है। 7 मई, 2025 की घटनाएं एक सफल सैन्य अभियान से कहीं अधिक थीं…

ऑपरेशन सिंदूर हमेशा याद किया जाएगा

सैयद अता हसनैन,राज्यपाल, बिहार

ऑपरेशन सिंदूर की वर्षगांठ केवल एक तारीख नहीं है, यह भारत की रणनीतिक सोच में निर्णायक बदलाव पर विचार करने का क्षण है। 7 मई, 2025 की घटनाएं एक सफल सैन्य अभियान से कहीं अधिक थीं। इन घटनाओं ने राजनीतिक इच्छाशक्ति, सैन्य तैयारी, तकनीकी क्षमता और राष्ट्रीय संकल्प के समन्वय को देश-दुनिया के सामने रेखांकित किया। कई मायनों में ऑपरेशन सिंदूर को भविष्य के संघर्ष संचालन के एक सटीक प्रारूप के रूप में याद किया जाएगा।

दशकों तक सीमा-पार की उकसावे की घटनाओं पर भारत की प्रतिक्रिया अक्सर स्व-निर्धारित संयम में सीमित रहती थी। ऑपरेशन सिंदूर ने संयम त्यागने का नहीं, बल्कि इसके परिष्कार को रेखांकित किया। इसने भारत की संवेदनशीलता के साथ बल-प्रयोग करने की क्षमता को प्रदर्शित किया। राजनीतिक नेतृत्व ने न केवल कार्रवाई का मजबूत इरादा दिखाया, बल्कि उद्देश्य की स्पष्टता गति, सटीकता और सामंजस्य में बदल गई। ये तीन विशेषताएं ही सफल आधुनिक सैन्य अभियानों को परिभाषित करती हैं।

आज के युद्ध केवल धरती, समुद्र और हवा तक सीमित नहीं रहे; ये साइबर, अंतरिक्ष और विद्युत चुंबकीय आयाम तक फैल गए हैं। ऑपरेशन सिंदूर ने इन क्षेत्रों में भारत की बढ़ती दक्षता को प्रदर्शित किया। उन सटीक हमलों में साइबर संचालन ने महत्वपूर्ण पूरक भूमिका निभाई। इसने विरोधियों की संचार और लॉजिस्टिक्स व्यवस्था को बाधित किया। इस अभियान ने संयुक्त कार्यक्षमता में हमारी परिपक्वता दिखाई- समन्वय से आगे बढ़कर वास्तविक एकीकरण तक।

यहीं नागरिक-सेना एकीकरण की भूमिका पर भी विशेष ध्यान देने की जरूरत है। ऑपरेशन सिंदूर सिर्फ सैन्य अभियान नहीं था, बल्कि यह पूरे राष्ट्र का प्रयास था। खुफिया एजेंसियों, तकनीकी संस्थाओं और नागरिक नेतृत्व ने सशस्त्र बलों के साथ मिलकर काम किया। स्वदेशी तकनीक ने निगरानी प्रणाली से लेकर सटीक हथियारों तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो आत्मनिर्भर बनने के हमारे प्रयासों में सतत निवेश के लाभ को उजागर करती है। अभियान से पहले और उसके दौरान रणनीतिक दूरदर्शिता दिखी। कूटनीतिक संवादों ने सुनिश्चित किया कि भारत की कार्रवाई को वैश्विक स्तर पर सही संदर्भ में समझा जाए- सटीक, आवश्यक और समानुपाती।

दूसरी ओर, पाकिस्तान सैन्य दृष्टि से सुसंगत जवाब देने के लिए संघर्ष करता रहा, क्षमता की कमी और आश्चर्य के तत्व, दोनों ने उसकी जवाबी प्रतिक्रिया की सीमाएं उजागर कर दीं। कूटनीतिक रूप से उसने स्थिति को अंतरराष्ट्रीय रूप देने का प्रयास किया, पर उसे सीमित सफलता मिली। हालांकि, उसकी प्रतिक्रिया का सबसे स्पष्ट पहलू सूचना क्षेत्र में था। वास्तविक हालात को छिपाने के प्रयास में गलत जानकारियों की चालाकी से बौछार की गई, पर वास्तविक समय पर जानकारी व वैश्विक निगरानी के युग में ऐसी कहानियां जल्द ही बेनकाब हो जाती हैं।

इस झूठे प्रचार का स्पष्टता व आत्मविश्वास के साथ खंडन करना आवश्यक है। ऑपरेशन सिंदूर हमारी आक्रामकता नहीं थी, बल्कि यह पाकिस्तानी उकसावे पर संतुलित प्रतिक्रिया थी। इसके उद्देश्यों में सटीकता थी, इसके लक्ष्य वैध थे, और इसका क्रियान्वयन अनुशासित था। भारत की कार्रवाई ने आनुपातिकता और आवश्यकता के सिद्धांतों का पालन किया, जो संयम के विशेष लक्षण हैं। भारत ने पूरी प्रक्रिया में सूचना की सत्यनिष्ठा बनाए रखी। पूरी पारदर्शिता बनाए रखकर भारत ने आख्यान को तोड़ने-मरोड़ने के पाकिस्तानी प्रयासों को नाकाम कर दिया।

ऑपरेशन सिंदूर से कई सबक मिले, जो भविष्य के लिए मूल्यवान मार्गदर्शन प्रदान करेंगे। सबसे पहले, राजनीतिक इच्छाशक्ति की भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता। रणनीतिक अस्पष्टता विरोधियों का हौसला बढ़ाती है, स्पष्टता उन्हें हतोत्साहित करती है। दूसरा, बहु-क्षेत्रीय एकीकरण का विकास लगातार जारी रहना चाहिए। बढ़त बनाए रखने के लिए साइबर, अंतरिक्ष व कृत्रिम बुद्धिमत्ता में निवेश महत्वपूर्ण है। तीसरा, नागरिक-सैन्य समन्वय को और अधिक संस्थागत रूप दिया जाना चाहिए, ताकि राष्ट्र-शक्ति का समन्वित तरीके से उपयोग सुनिश्चित हो सके।

एक अन्य महत्वपूर्ण सबक सूचना-युद्ध के लिए है। धारणा की लड़ाई सतत और सीमाहीन होती है। भारत को गलत जानकारी का पता लगाने, उसका मुकाबला करने और पूर्व-कार्रवाई की अपनी क्षमताओं को मजबूत करना चाहिए। त्वरित व विश्वसनीय संचार में तकनीकी उपकरण ही नहीं, बल्कि संस्थागत तंत्र को शामिल करना अहम है। आख्यान को जीतना रणनीतिक सफलता को बनाए रखने के लिए जरूरी है।

ऑपरेशन सिंदूर ने रक्षा क्षमताओं में आत्मनिर्भरता के महत्व को भी रेखांकित किया। स्वदेशी रक्षा प्रणालियों ने अपनी योग्यता साबित की, जिससे बाहरी स्रोतों पर निर्भरता कम हुई और संचालन से जुड़ी स्वायत्तता बढ़ी। अनुसंधान, विकास और नवाचार में निरंतर निवेश के जरिये इस गति को बनाए रखा जाना चाहिए। इस प्रयास में सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के बीच तालमेल महत्वपूर्ण होगा।

आज जब देश ऑपरेशन सिंदूर की सफलता की वर्षगांठ मना रहा है, तो यह संदेश बिल्कुल स्पष्ट है कि भारत के पास अपने हितों की रक्षा करने की निर्णायक क्षमता और इच्छाशक्ति, दोनों है। इसने यह दर्शाया कि संयम अपनाना एक विकल्प है, अनिवार्यता नहीं। आने वाले वर्षों में, ऑपरेशन सिंदूर का अध्ययन बहुक्षेत्रीय प्रभावी अभियानों के उदाहरण के रूप में किया जाएगा। इसने अपेक्षाओं को फिर से परिभाषित किया है- भारत के भीतर भी और देश के बाहर भी। इसने इस सरल, लेकिन शक्तिशाली सिद्धांत को सुदृढ़ किया है कि जब राष्ट्रीय संकल्प का क्षमता के साथ संयोजन होता है, तो परिणाम निर्णायक होते हैं।

ऑपरेशन सिंदूर की विरासत इसकी तात्कालिक सफलता तक सीमित नहीं है, यह उस आत्मविश्वास में निहित है, जो इसने पैदा किया है। यह उन सबमें निहित है, जो इसने आत्मसात किए हैं और उस मार्ग में निहित है, जो इसने भारत के सामरिक भविष्य के लिए निर्धारित किया है। अनसुलझे संघर्ष भारत की परीक्षा लेते रहेंगे- विभिन्न क्षेत्रों में और विकसित होते प्रारूपों में भी। फिर भी, जब तक राष्ट्र के राजनीतिक, सैन्य और संस्थागत प्रभाग एक साथ कार्य करेंगे, स्पष्टता और उद्देश्य के साथ अपनी क्षमताओं को एकीकृत करेंगे, प्रभाव का संतुलन हमेशा भारत के पक्ष में रहेगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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