
बाहुबलियों में नेता तलाशती पार्टियां
बिहार के विधानसभा चुनावों में दिलचस्पी रखने वाले राजनीतिक पर्यवेक्षक लगातार कामना करते रहे कि इस बार चुनावों में सब कुछ बिहार की दूसरी चारित्रिक विशेषताओं के अनुकूल भले ही हो, पर कम से कम हिंसा न हो…
विभूति नारायण राय,पूर्व आईपीएस अधिकारी
बिहार के विधानसभा चुनावों में दिलचस्पी रखने वाले राजनीतिक पर्यवेक्षक लगातार कामना करते रहे कि इस बार चुनावों में सब कुछ बिहार की दूसरी चारित्रिक विशेषताओं के अनुकूल भले ही हो, पर कम से कम हिंसा न हो। उनकी यह सदिच्छा 30 अक्तूबर की दोपहर धरी की धरी रह गई। इस दिन मोकामा में बिहार की राजनीति के एक पुराने खिलाड़ी और बाहुबली दुलारचंद यादव की हत्या कर दी गई। जिन पर हत्या का आरोप लगा, उनमें शामिल अनंत सिंह भी बिहार के कुख्यात बाहुबलियों में से एक है और इस बार जद-यू के टिकट पर चुनाव लड़ रहा है।
इस विधानसभा सीट पर साल 1990 से सिर्फ एक विधानसभा काल, यानी पांच साल को छोड़कर लगातार अनंत सिंह के परिवार का ही कब्जा रहा है। बिहार में चुनावों के दौरान बूथ कैप्चरिंग, हत्याएं या अपहरण पहले आम बात थी, पर कुछ तो तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन की सख्ती और कुछ लालू यादव के काल को जंगलराज घोषित कर चुनाव लड़ने वाले नीतीश कुमार की नीतियों के चलते साल 2005 के बाद इन घटनाओं में कमी आई थी।
मोकामा की इस राजनीतिक हत्या के बाद स्वाभाविक रूप से यह सवाल पूछा जाने लगा है कि क्या बिहार के चुनावों में हिंसा की वापसी हो रही है? एक घटना से किसी सरलीकृत निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा, पर एक चिंताजनक प्रवृत्ति तो रेखांकित की ही जा सकती है कि सफलता हासिल करने के लिए किसी राजनीतिक दल को अपराधियों की मदद लेने में कोई गुरेज नहीं है। हत्यारोपी बाहुबली को एक ऐसे दल ने टिकट दिया है, जो जंगलराज के खिलाफ आवाज उठाकर सत्ता में आया था और मृतक बाहुबली उस दल (जन सुराज पार्टी) का प्रचार कर रहा था, जो नया बिहार बनाने का सपना दिखा रहा है।
यह भी कम दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है कि दो बाहुबलियों के बीच हुई हिंसा को दो जातियों के मध्य संघर्ष में तब्दील करने की कोशिश की जा रही है। इसे प्रदेश की दो महत्वाकांक्षी जातियों के मध्य सत्ता में बड़ी भागीदारी हासिल करने की कोशिश के तौर पर पेश किया जा रहा है। ऐसा संभवतः इसीलिए संभव हो सका है कि बिहार की जनता के एक बड़े हिस्से में अपराधियों के लिए मन में खास तरह का आदर मिश्रित आकर्षण दिखता है। इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि बौद्धिक और सांस्कृतिक रूप से सचेत बिहारी समाज अपराधियों के बीच अपने नायक तलाशने की कोशिश करे?
यह एक गंभीर समाजशास्त्रीय अध्ययन का विषय हो सकता है कि क्या सिर्फ शिक्षा की बदहाली, रोजगार के अवसरों में कमी या बदहाल आधारभूत संरचनाएं ही बिहारी समाज में बाहुबलियों के प्रति दुर्निवार आकर्षण का कारण हैं या और भी बहुत कुछ है, जो इसकी अंतश्चेतना को इस तरह से छूता है कि वह समाजद्रोहियों को ही अपना नायक मानने लगता है। ये किसी ऐसे सिंघम की तरह दिखते हैं, जो अपनी जातियों के लिए कुछ भी हासिल कर सकते हैं। जातियां बिहार के चुनावों में कितनी गहरी पैठी हैं, इसका अंदाज डॉ राजेंद्र प्रसाद की आत्मकथा में उल्लिखित एक तथ्य से लगाया जा सकता है। उन्होंने दुख के साथ यह स्वीकारोक्ति की थी कि सन् 1937 में हुए आम चुनाव में टिकट बांटते समय कांग्रेस पार्टी ने निर्वाचन क्षेत्रों की जातियों को ध्यान में रखा था, जबकि उन चुनावों में मतदाता सूची में नाम होने का मुख्य आधार शिक्षा और संपत्ति था।
देश के कुछ राज्यों में हिंसा चुनावों का अविभाज्य हिस्सा रही है। खास तौर से बिहार और बंगाल इस मामले में खासे बदनाम रहे हैं। एक दौर में इन्हीं के चलते भाषा को ‘बूथ लुटेरा’ जैसा शब्द मिला था। मुझे याद है कि जिन दिनों मतपेटियों में वोट डाले जाते थे, राज्यों में पुलिस बल कम होते थे और चुनाव आयोग काफी हद तक नख-दंत विहीन सिंह की तरह होता था। यह एक सामान्य दृश्य हो सकता था कि मतदान केंद्र के पास किसी अमराई या खेत में बैठकर कुछ दबंग ठप्पा लगा रहे हों। यह भी संभव था कि शुरू के कुछ घंटों के बाद ही घोषित कर दिया जाता कि मतदान खत्म हो गया है और शेष मतदाता घर जा सकते हैं।
सन् 1967 के चुनावों से शेषन युग (1990-96) की शुरुआत तक चुनावी अराजकता बढ़ती ही गई। मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन की सख्ती के चलते, जो कई मामलों में ज्यादती में तब्दील हो जाती थी, भारतीय चुनावों में कुछ हद तक शुचिता कायम हो सकी। बाद के तमाम चुनाव आयोग सिर्फ शेषन की राह पर, गिरते पड़ते ही सही, चलते रहे और चुनावों की प्रतिष्ठा कुछ हद तक बची रह सकी।
इन दिनों चुनावों में दिख सकने वाली शुचिता के बावजूद राजनीतिक दलों के मन में यह इच्छा कहीं न कहीं हमेशा बनी रही कि किसी भी तरह से सफलता हासिल की जाए, भले ही इसके लिए हिंसा का सहारा क्यों न लेना पड़े। बिहार और पश्चिम बंगाल दुर्भाग्य से ऐसी ही दो प्रयोगशालाएं रही हैं, जहां विभिन्न दल बाहुबली समर्थकों और उम्मीदवारों के जरिये चुनावी वैतरणी पार करने का प्रयास करते दिखते हैं। बंगाल में तो पिछले पचास वर्षों में हिंसा के बिना किसी चुनाव के हो सकने की कल्पना भी मुश्किल हो गई है। बूथ कैप्चरिंग से बढ़कर वहां स्थितियां गांव कैप्चरिंग तक पहुंच गई हैं। वहां के मतदाताओं की यह बेचारगी मीडिया में उनकी प्रतिक्रियाओं में साफ झलकती है कि चुनाव आयोग का प्रशासनिक नियंत्रण तो सिर्फ चुनावी प्रक्रिया के दौरान रहता है, बाद में तो उन्हें अपनी सरकारी मशीनरी की दया पर ही रहना है।
दुलारचंद यादव की हत्या को किसी अपवाद की तरह नहीं लेना चाहिए। यह हमारी सामाजिक सरंचना में किसी छिपे हुए फोड़े जैसी है, जो कभी भी फूट पड़ने को बेकरार रहता है। जरा सी उत्तेजना इसे फूटने का कारण प्रदान कर सकती है। इसका इलाज एक निष्पक्ष और प्रभावी चुनाव आयोग तो है ही, इसके साथ मूल्यों के स्तर पर भी समाज में बड़ी उथल-पुथल की जरूरत है। बिहार के तमाम पिछड़ेपन का कारण शिक्षा या चिकित्सा जैसी आधारभूत संरचनाओं की कमी के साथ ये मूल्य भी हैं और जब तक ये आम मतदाता के निर्णय को प्रभावित करते रहेंगे, तब तक राजनीतिक दलों की भी मजबूरी होगी कि वे चुनावी प्रक्रिया में बाहुबलियों को महत्व दें।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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