कहीं ज्यादा आक्रामक न हो जाए ईरान

Mar 03, 2026 10:16 pm ISTHindustan लाइव हिन्दुस्तान
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अमेरिका और इजरायल ने साझा हवाई हमले करके ईरान की उस धार्मिक सत्ता-व्यवस्था को पूरी तरह से खत्म कर दिया, जो दशकों से चली आ रही थी। ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ नामक इस कार्रवाई में 37 वर्षों तक ईरान के सर्वोच्च नेता रहे अयातुल्ला अली खामेनेई…

कहीं ज्यादा आक्रामक न हो जाए ईरान

औसाफ सईद, पूर्व सचिव, विदेश मंत्रालय

अमेरिका और इजरायल ने साझा हवाई हमले करके ईरान की उस धार्मिक सत्ता-व्यवस्था को पूरी तरह से खत्म कर दिया, जो दशकों से चली आ रही थी। ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ नामक इस कार्रवाई में 37 वर्षों तक ईरान के सर्वोच्च नेता रहे अयातुल्ला अली खामेनेई अपने अनेक शीर्ष सैन्य कमांडरों के साथ मारे गए। यह ईरान में मात्र नेतृत्व का परिवर्तन नहीं है, बल्कि सन् 1979 से कायम भू-राजनीतिक व्यवस्था का हिंसक रूप से खत्म होना भी है।

खामेनेई ने कभी अपने उत्तराधिकारी का नाम सार्वजनिक तौर पर नहीं लिया। यह जान-बूझकर लिया गया फैसला था, लेकिन इसने ईरान के मौजूदा परिदृश्य में एक सांविधानिक संकट पैदा कर दिया है। हालांकि, वहां की 88 सदस्यीय ‘असेंबली ऑफ एक्सपर्ट’, यानी विशेषज्ञ सभा के पास अगले सर्वोच्च नेता को चुनने की सांविधानिक ताकत है, लेकिन अंतरिम नेतृत्व अब तीन सदस्यीय परिषद के हाथों में है, जिसमें सुधारवादी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान, कट्टरपंथी न्यायपालिका के प्रमुख गुलाम हुसैन मोहसेनी-एजेई और गार्जियन कौंसिल के अयातुल्ला अलीरेजा अराफी शामिल हैं।

दिवंगत सर्वोच्च नेता खामेनेई के 56 वर्षीय दूसरे बेटे अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई को उनका दावेदार माना जा रहा है। हालांकि, वंशवाद से जुड़ी चिंताएं उनकी उम्मीदवारी को जटिल बना सकती हैं, जिससे आंतरिक सत्ता-संघर्ष छिड़ सकता है। ऐसा लग रहा है कि यह देश एक धार्मिक तंत्र से सैन्य नेतृत्व वाली ‘शासन व्यवस्था’ में बदलने जा रहा है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) सत्ता व्यवस्था सीधे अपने हाथों में ले सकती है, क्योंकि वह ईरानी अर्थव्यवस्था के लगभग 60 फीसदी हिस्से को नियंत्रित करती है। अगर ऐसा हुआ, तो ईरान अधिक आक्रामक, कम कूटनीतिक कुशल और कहीं ज्यादा खतरनाक बन सकता है।

अमेरिकी सैन्य अभियान संकेत है कि उसकी रणनीति बदल चुकी है। उसका उद्देश्य न सिर्फ ईरान में सत्ता परिवर्तन है, बल्कि क्षेत्र में इजरायली दबदबे को स्थापित करना भी है। ईरानी नेतृत्व को खत्म करके, उसके परमाणु व मिसाइल कार्यक्रमों को निष्क्रिय करके, वाशिंगटन व तेल अवीव एक ‘निर्णायक बढ़त’ हासिल करने की जुगत में हैं। इजरायल ने ट्रंप प्रशासन पर यह सुनिश्चित करने का दबाव डाला है कि हिज्बुल्ला व हूती जैसे विद्रोही गुटों को ईरान समर्थन देना पूरी तरह बंद कर दे। इसीलिए यह दांव खेला जा रहा है कि अत्यधिक बल प्रयोग से क्षेत्रीय शून्य पैदा हो और इजरायल एकमात्र ताकतवर देश बन जाए।

‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ का समय खास तौर से चौंकाने वाला है। यह हमला दावोस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शांति बोर्ड की पहली बैठक के ठीक 10 दिनों बाद किया गया। गाजा की सुरक्षा और पुनर्निर्माण का आधिकारिक दायित्व सौंपे जाने के बावजूद यह बोर्ड ‘झांसा देने वाला तंत्र’ माना जा रहा है, क्योंकि इसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के बरअक्स खड़ा किया गया है, जिस पर सिर्फ राष्ट्रपति ट्रंप का नियंत्रण रहेगा। शांति बोर्ड जहां ट्रंप प्रशासन को गाजा में ‘विसैन्यीकरण व विशेषज्ञों वाली शासन व्यवस्था’ लागू करने की इजाजत देता है, वहीं तेहरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के राजनीतिक बहाने भी देता है। ट्रंप ने एक मोर्चे पर शांति के वायदे का इस्तेमाल दूसरे मोर्चे पर युद्ध को उचित ठहराने के लिए किया है।

जाहिर है, पश्चिम एशिया अब कई मोर्चों पर तनाव के कगार पर खड़ा है। ईरान की इस्लामी फौज ने बहरीन, कतर, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, इराक और जॉर्डन स्थित कई अमेरिकी सैन्य ठिकानों के साथ-साथ इजरायल के रिहायशी इलाकों को निशाना बनाया है। ईरान ने ओमान के दुक्म बंदरगाह पर भी हमला किया, जबकि मस्कट की मध्यस्थ की भूमिका जगजाहिर है। सबसे भयावह स्थिति होर्मुज जलडमरूमध्य का प्रभावित होना है, जहां से विश्व के 20 से 25 प्रतिशत तेल व गैस ढोने वाले जहाज गुजरते हैं। हालांकि, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के पास ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन (50 लाख बैरल प्रतिदिन क्षमता) और फुजैरा टर्मिनल (15 लाख बैरल प्रतिदिन) जैसी वैकल्पिक सुविधाएं उपलब्ध हैं, पर पूर्ण नाकेबंदी की स्थिति में ये पूरी तरह कारगर नहीं हो सकतीं। विश्लेषकों का मानना है कि यदि तेल-आपूर्ति में रुकावटें पैदा होती हैं, तो वैश्विक तेल की कीमतें 120 से 150 डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ सकती हैं।

भारत इससे खास तौर से प्रभावित हो सकता है, क्योंकि उसके मासिक तेल आयात का करीब 50 से 52 प्रतिशत हिस्सा (करीब 26 लाख बैरल प्रतिदिन) होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है। लंबे समय तक रुकावट से हमारा आयात खर्च बढ़ सकता है, जिससे चालू खाता घाटा बढ़ेगा और रुपये पर भारी दबाव पड़ेगा। इसी तरह, खाड़ी देशों में रहने वाले करीब एक करोड़ प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा भी उतनी ही अहम है। वित्त वर्ष 2025 में ‘रेमिटेंस’ के रूप में 135 अरब डॉलर की रिकॉर्ड राशि भारत भेजी गई है, जिसकी हमारे लिए काफी अहमियत है। इसी तरह, चाबहार बंदरगाह परियोजना लगभग ठप है, क्योंकि अमेरिका द्वारा ईरान पर फिर से प्रतिबंध लगाने और ट्रंप द्वारा ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी के बाद नई दिल्ली ने इस बंदरगाह के लिए धन देना बंद कर दिया है।

मॉस्को और बीजिंग ने इस युद्ध की निंदा की है। रूस ने कहा कि मध्यस्थता के दौरान ईरान को ‘पीठ में छुरा मारा गया’, जबकि चीन ने अमेरिका को साम्राज्यवादी आक्रमणकारी बताया है। दोनों ने इस हमले का समर्थन करने वाले अमेरिका समर्थित प्रस्ताव को वीटो कर दिया है। उधर अमेरिका में ट्रंप समर्थकों में भी इस मसले पर अलग-अलग राय है। ट्रंप अपनी विरासत को युद्ध के कारण दांव पर लगा रहे हैं, क्योंकि कोई जंग न शुरू करने का उन्होंने वायदा किया था। अब वह कह रहे हैं कि निर्णायक जीत आलोचकों को चुप करा देगी।

अली खामेनेई की मृत्यु से ईरान का संकट हल नहीं हुआ है, बल्कि इसने इसे अंतरराष्ट्रीय रूप दे दिया है। दुनिया अब 9.3 करोड़ की आबादी वाले एक राष्ट्र, हथियार संपन्न और नेतृत्वहीन रिवोल्यूशनरी गार्ड और एक संकीर्ण समुद्री मार्ग पर अटकी वैश्विक अर्थव्यवस्था को चिंता से देख रही है। 1979 के बाद की व्यवस्था तो तेहरान के मलबे में दब गई है, लेकिन जो नई व्यवस्था यहां पैदा हुई है, वह पिछली व्यवस्था से कहीं अधिक अस्थिर साबित हो सकती है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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