
लोगों तक कैसे पहुंचा मल मिश्रित पानी
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 18 वर्ष व्यतीत हो चुके मैं और दिल्ली, जो भारत की राजधानी है, उसकी जनता अभी भी पीड़ित है। यहां पर अन्न नहीं मिलता है। जो अन्य वस्तुएं मिलती हैं, उनमें मिलावट होती है…
हरि विष्णु कामत,तत्कालीन वरिष्ठ सांसद
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 18 वर्ष व्यतीत हो चुके मैं और दिल्ली, जो भारत की राजधानी है, उसकी जनता अभी भी पीड़ित है। यहां पर अन्न नहीं मिलता है। जो अन्य वस्तुएं मिलती हैं, उनमें मिलावट होती है।
मुझे 1955 की एक घटना अच्छी तरह याद है। उस वर्ष भारत में रूस से दो मेहमान सर्वश्री ख्रुश्चेव तथा बुल्गानिन भारत आए थे। जब वह लौटकर रूस गए, तो ऐसी अफवाह फैली कि उनको पीलिया रोग भारत आने के कारण हो गया, क्योंकि वह रूस पहुंचने के तुरंत बाद ही अस्पताल में दाखिल हो गए थे। इस समय की हमारी स्वास्थ्य मंत्री उस समय दिल्ली की मंत्री थीं। उस समय 1955 में गंदे पानी के बारे में लोकसभा में चर्चा हुई थी, तथा उस समय की स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृत कौर ने सभा में पूरा आश्वासन दिया था कि सभी संभव उपाय किए जाएंगे, जिससे भविष्य में गंदा पानी दिल्ली में पीने के लिए न मिले। परंतु आज आठ साल के बाद भी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है और पीने के पानी की व्यवस्था करने के लिए जिम्मेदार जल-मल बोर्ड अभी भी जल-मल मिश्रित पानी का संभरण दिल्ली में कर रहा है।
मुझे मालूम हुआ है कि पीलिया रोग से एक बालक की मृत्यु हो चुकी है तथा कई बालक अस्पताल में पड़े हैं। मैंने यह भी सुना है कि अस्पतालों में तथा गैर-सरकारी डॉक्टरों के पास भी इतने रोगी हैं कि वे सभी रोगियों की ओर उचित ध्यान देने में असमर्थ हैं। इसी आधार पर मैं यह कहना चाहता हूं कि माननीय स्वास्थ्य मंत्री को उसी प्रकार इस्तीफा दे देना चाहिए, जिस प्रकार श्री लाल बहादुर शास्त्री ने अरियालूर रेल दुर्घटना होने पर इस्तीफा दे दिया था। मैंने 1956 में भी पीने के गंदे पानी के कारण फैले पीलिया रोग के लिए तत्कालीन केंद्रीय मंत्री राजकुमारी अमृत कौर से इस्तीफा देने की मांग की थी।
हाल में ही पीने के पानी के बारे में सभा में एक प्रश्न था। उसके संबंध में मैंने एक अनुपूरक प्रश्न पूछा था कि आज जो यह स्थिति है, वह 1955 की तुलना में किस प्रकार की है? अच्छी है अथवा बुरी है? मंत्री महोदय ने उत्तर दिया कि यह स्थिति उस समय से भिन्न है। ...उन्होंने कहा है कि उसकी तुलना में स्थिति अच्छी है। मैं चाहता हूं कि कृपा करके वह इस बात को स्पष्ट करें कि स्थिति अच्छी किस प्रकार है? इन आठ वर्षों में स्थिति सुधारने की परियोजना पर कितने करोड़ रुपये व्यय किए गए हैं? अंत में, मैं यह कहना चाहता हूं कि इसकी जांच के लिए एक संसदीय आयोग नियुक्त किया जाना चाहिए, जो दोषी व्यक्तियों का पता लगाए और आवश्यक दंड दिलाए।
महोदय, 1955 में स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृत कौर ने एक बहुत बहादुरी भरा वादा किया था कि इन सभी मामलों पर ध्यान दिया जा रहा है, और सदन को आश्वासन दिया था कि बहुत जल्द सब कुछ ठीक हो जाएगा। जब यह सवाल पूछा गया कि कौन जिम्मेदार है और लापरवाही करने वालों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जा रही है, तो उन्होंने जिम्मेदारी दूसरों पर डालने की जानी-पहचानी तकनीक अपनाई। उस समय, दिल्ली राज्य के मुख्य आयुक्त या मुख्यमंत्री संयुक्त जल और सीवेज बोर्ड के लिए जिम्मेदार थे। मैं सरकार को एक बात के लिए सलाम करता हूं कि सीवेज बोर्ड को खत्म करने के आठ साल बाद भी जल और सीवेज बोर्ड दिल्ली के नागरिकों को जल-मल देकर अपने नाम के अनुरूप काम कर रहा है।
यहां जल-मल का एक नमूना है, जिसे शायद मेरे माननीय मित्र ने मेज पर रखा है। अगर आप बस इसका ढक्कन खोलें और थोड़ी दूरी से ही इसे नाक के पास ले जाएं, बहुत करीब नहीं, तो आपको बदबू आएगी, उल्टी जैसा महसूस होगा। मुझे उम्मीद है कि उसके बाद और कुछ नहीं होगा।
यह हंसने की बात नहीं है। एक बच्चे की मौत हो गई है। मैंने अभी एक और दोस्त से सुना कि कई और बच्चे अस्पताल में बीमार हैं, और डॉक्टर- निजी डॉक्टर और कुछ सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर- पीलिया या संक्रामक हेपेटाइटिस से पीड़ित मरीजों की भीड़ को संभालने में मुश्किल महसूस कर रहे हैं। यह पीलिया का शुरुआती लक्षण हो सकता है, जैसे गैस्ट्रो-एंटेराइटिस। यह सरकार की तरफ से धोखा है कि लोग भूख से नहीं, बल्कि गैस्ट्रो-एंटेराइटिस से मरते हैं। आखिरकार, भूख से कोई बीमारी होती है? भूख से मौत नहीं हो सकती है, लेकिन इससे गैस्ट्रो-एंटेराइटिस या शायद हेपेटाइटिस और शायद टाइफाइड या हैजा या ऐसा कुछ हो सकता है। ...अगर तथ्यों को देखें, तो यह बड़ी शर्म की बात है। ...
अगर राजधानी में हालात ऐसे हैं, तो यह सोचकर ही रूह कांप जाती है कि दूर-दराज के गांवों में क्या हो रहा होगा? शायद वहां पटवारी और हेड-कांस्टेबल राज कर रहे हैं और जो मन में आता है, वही कर रहे हैं। चाहे वहां लोगों का पीने के लिए साफ पानी मिल रहा हो या कीचड़ या धूल या गंदगी, मैला और बदबूदार मलयुक्त जल मिल रहा हो, मुझे नहीं पता कि उन्हें वहां क्या मिल रहा है? इसलिए मैं यह मांग करता हूं कि यह सदन मेरे इस प्रस्ताव को मंजूरी दे कि इस मामले की जांच के लिए एक संसदीय आयोग नियुक्त किया जाए और जो भी इसके लिए जिम्मेदार है, उसे सजा दी जाए और उसे कानून के कठघरे में लाया जाए। साल 1956 में जो हुआ था, उसे दोहराया न जाए, जब एक इंजीनियर को सिर्फ मौखिक चेतावनी देकर छोड़ दिया गया था, जबकि सैकड़ों लोग सड़कों पर पीलिया से मर गए थे।...
दूसरी ओर, अगर संसद इस मामले पर सख्त कार्रवाई नहीं करती है, तो देश की राजधानी में, और शायद भारत में भी कहीं, और बड़े पैमाने पर पीलिया जनित हत्या की इस त्रासदी को दोहराया जा सकता है। इससे पहले कि और बुरा घटित हो, मैं यह मांग करता हूं कि तुरंत कार्रवाई की जाए और अपराधियों को बिना देरी के कानून के कठघरे में लाया जाए और अगर जरूरी हो, तो उन्हें मौत की सजा दी जाए।
(लोकसभा में दिए गए उद्बोधन से)

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