सिर्फ फास्ट ट्रैक कोर्ट से नहीं बनेगी बात

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बीती 27 जुलाई को फास्ट ट्रैक कोर्ट में पेपर लीक की पहली सुनवाई ही स्थगित करनी पड़ी, क्योंकि सीबीआई के वकील पेश नहीं हुए, जबकि उसी दिन लोकसभा में सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026…

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Faizan Mustafa,Vice Chancellor, Chanakya National Law University

फैजान मुस्तफा,कुलपति, चाणक्य राष्ट्रीय विधि विवि

बीती 27 जुलाई को फास्ट ट्रैक कोर्ट में पेपर लीक की पहली सुनवाई ही स्थगित करनी पड़ी, क्योंकि सीबीआई के वकील पेश नहीं हुए, जबकि उसी दिन लोकसभा में सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 पेश किया गया था। महज दो साल के भीतर इस कानून में संशोधन की जरूरत इसलिए आन पड़ी, क्योंकि पेपर लीक के मामले रुक नहीं रहे हैं।

बहरहाल, नए विधेयक को संसद के दोनों सदनों ने मंजूर कर लिया है और अब इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा। इसमें यह प्रावधान किया गया है कि चार्जशीट दाखिल होने की तारीख से तीन महीने के भीतर त्वरित अदालतों के माध्यम से पेपर लीक संबंधी मामलों का निपटारा किया जाएगा। हालांकि, उत्तराखंड, झारखंड और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में इससे भी ज्यादा कड़े कानून मौजूद हैं, जिनमें उम्र कैद तक की सजा के प्रावधान हैं।

अपने देश में त्वरित मुकदमा चलाने का कानूनन कोई प्रावधान नहीं है, लेकिन हुसैनारा खातून (1979) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि मुकदमे का शीघ्र निपटारा आरोपी का अधिकार है और उसने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत आजादी के अधिकार से जोड़ा था। शीर्ष अदालत ने इसी आधार पर इस हफ्ते ‘यूएपीए’ के दो आरोपियों को जमानत दी है, क्योंकि उनका मुकदमा बीते 12 वर्षों से शुरू नहीं हुआ था। हालांकि, आज आरोपी के अधिकार के तौर पर नहीं, बल्कि पीड़ितों के तेजी से न्याय पाने के अधिकार के रूप में हम इस पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय नागरिक सुरक्षा अधिनियम, 2023 में यह प्रावधान है कि आदर्श रूप में आपराधिक मुकदमे का निपटारा दो साल के भीतर हो जाना चाहिए। हालांकि, कागज पर लिखे कानून और अमल में आने वाले कानून के बीच हमेशा फर्क होता है। एक देश के तौर पर हमें इस फर्क को मिटाना होगा।

प्रधानमंत्री ने खुद जंतर मंतर पर हुए विरोध-प्रदर्शन में दखल दिया था और प्रदर्शनकारियों को आश्वस्त किया था कि पेपर लीक के मामलों में त्वरित अदालतें बनाई जाएंगी। विरोध-प्रदर्शन खत्म होने के बाद केंद्र सरकार ने संशोधन बिल पेश करके अपना यह वायदा निभाया है। संभवत: बहुत कम लोग जानते होंगे कि प्राचीन भारत में भी खास तरह की अदालतें हुआ करती थीं। कौटिल्य की मशहूर किताब अर्थशास्त्र में ‘कंटकशोधन’ अदालतों का जिक्र मिलता है, जो मौर्य काल की विशेष अदालतें थीं और भ्रष्टाचार व आर्थिक अपराधों से जुड़े मामलों का निपटारा करती थीं। गुलाम भारत में बढ़ती राष्ट्रवादी लहर से निपटने के लिए ब्रिटिश सरकार ने भी ‘क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट ऐक्ट, 1908’ के जरिये खास ट्रिब्यूनल बनाए थे, जिनमें सामान्य आपराधिक मामले नहीं सुने जाते थे। यहां तक कि 1937 में मध्य प्रांत में परीक्षा में कदाचार को रोकने के लिए एक कानून बनाया गया था, जो बर्मा के कानून पर आधारित था।

आजाद भारत के शुरुआती तीन दशकों में विशेष अदालतों को लेकर कानून थे, जैसे विशेष दंड न्यायालय (अधिकारिता) अधिनियम, 1950 और आपराधिक विधि (संशोधन) विधेयक, 1952। ये विशेष अदालतें रिश्वत और भ्रष्टाचार के मामलों का निपटारा करती थीं। साल 1952 में अनवर अली सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल तेजी से सुनवाई के लिए विशेष अदालतें गठित नहीं की जा सकतीं। बाद में, शीर्ष अदालत की सात जजों की पीठ ने इसकी स्थापना की अनुमति दी, लेकिन पी रामचंद्र राव (2002) मामले में कहा कि आपराधिक मुकदमे के निस्तारण के लिए कोई समय-सीमा तय नहीं की जा सकती। हालांकि, 1982 से 2015 के बीच ऐसे 25 कानून बनाए गए, जिनमें विशेष अदालतों का प्रावधान था। ये अदालतें मुख्य रूप से भ्रष्टाचार, आतंकी अपराधों व आर्थिक मामलों से जुड़ी थीं। सामान्य अदालतों के जजों को ही विशेष अदालतों में जिम्मेदारी सौंपी गई, जिसका नतीजा यह रहा कि न तो भ्रष्टाचार कम हुआ और न ही हम आतंकी व आर्थिक अपराधों से बेहतर निपट पाए। साल 2000 में 11वें वित्त आयोग ने फास्ट ट्रैक कोर्ट पर जोर दिया और ऐसी 1,734 अदालतें बनाने का प्रस्ताव रखा। 14वें वित्त आयोग ने भी ऐसी अदालतों पर बल दिया।

साल 2019 में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वत: संज्ञान लेकर दिए गए निर्देश के आलोक में ‘फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट’ संबंधी योजना शुरू की, जिसके तहत मार्च 2026 तक 790 त्वरित अदालतें गठित की जानी थीं। इसके लिए 1952.23 करोड़ रुपये आवंटित भी किए गए। इन अदालतों का गठन बलात्कार और पोक्सो ऐक्ट 2012 से जुड़े लंबित मामलों की तय समय-सीमा में सुनवाई के लिए किया गया है। हालांकि, इस योजना को दो बार बढ़ाया गया है; आखिरी बार इसे सितंबर 2026 तक बढ़ाया गया, ताकि निर्धारित 790 कोर्ट गठित हो सकें।

मौजूदा तारीख में देश भर में 774 त्वरित अदालतें काम कर रही हैं, जिनमें 392 पोक्सो के मामलों को सुन रही हैं। इनमें अब तक 3,34,213 मुकदमों का निपटारा किया जा चुका है। सामान्य अदालतों में जहां बलात्कार व पोक्सो मामलों के निपटारे की औसत दर प्रति कोर्ट प्रति माह 3.26 है, वहीं त्वरित अदालतों में यह दर 9.51 है। माना गया था कि साल भर में हर अदालत 165 मामलों को निपटाएगी, लेकिन 2023 में त्वरित अदालतों के पास करीब दो लाख मामले लंबित थे, वहीं 2025 में यह संख्या बढ़कर तकरीबन 2.45 लाख हो गई। जैसे-जैसे लंबित मामलों की संख्या बढ़ेगी, तेजी से न्याय मिलने का लक्ष्य और भी दूर होता चला जाएगा।

कहते है, देर से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर ही होता है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जल्दबाजी में किया गया न्याय, न्याय का गला घोंटने जैसा है। सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार यह कहा है कि विशेष या त्वरित अदालतों के जरिये समानता के अधिकार को कमजोर नहीं किया जा सकता। पेपर लीक की समस्या का समाधान किसी कानून या फास्ट ट्रैक कोर्ट में नहीं है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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