इसीलिए सड़क पर नमाज पढ़ने से बचना चाहिए

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सड़क पर नमाज पढ़ने को लेकर बहस एक बार फिर पुरगर्म हो चली है। कुछ मुसलमान तर्क दे रहे हैं कि सड़क रोककर कांवड़ यात्राएं चलती हैं, वह भी फुल डीजे के साथ…

इसीलिए सड़क पर नमाज पढ़ने से बचना चाहिए

आसिफ आजमी, चेयरमैन, द पेन फाउंडेशन

सड़क पर नमाज पढ़ने को लेकर बहस एक बार फिर पुरगर्म हो चली है। कुछ मुसलमान तर्क दे रहे हैं कि सड़क रोककर कांवड़ यात्राएं चलती हैं, वह भी फुल डीजे के साथ; जगराते सड़कों पर आयोजित होते हैं, उनसे भी कई नियम टूटते हैं, परंतु पुलिस उन पर कृपा बरसाती है। अन्य धर्मों की शोभा-यात्राएं भी सामान्य बात है, जिनके चलते घंटों ट्रैफिक रुका रहता है। ऐसे में, चंद मिनटों के लिए हम नमाज क्यों नहीं पढ़ सकते?

सड़क पर नमाज नहीं पढ़ सकते, क्योंकि इस्लामी शिक्षा में चालू रास्ते पर नमाज का न कोई औचित्य है और न ही इसमें पुण्य है। यह इस्लामी इबादत व सामाजिक मूल्यों- अखलाक और हुकूल-उल-इबाद, दोनों के विरुद्ध है। रास्ते रोकना इस्लाम में मना है। जिनके बताए अनुसार नमाज पढ़ी जाती है, यानी पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम, उन्होंने सात जगहों पर नमाज पढ़ने को नाजायज बताया है। उनमें रास्ता शामिल है। (हदीस; तिरमिजी 346, इब्ने माजा 746) इस्लाम में रास्तों को खाली व चौड़ा रखने के साफ निर्देश दिए गए हैं। जिस युग में घोड़े और ऊंट सवारी थे, उस समय उन्होंने रास्ते की चौड़ाई सात हाथ, यानी लगभग दस फीट रखने का आदेश दिया (हदीस; सहीह मुस्लिम 4139)। इसी प्रकार, नबी स. ने रास्ते से कांटा हटाने या उसे साफ रखने को ‘सदका’ बताया है।

पवित्र कुरान का उसूल है- ला युकिल्लफुल्लाहु नफ्सन इल्ला वुसअहा, यानी अल्लाह किसी पर उसकी ताकत से ज्यादा बोझ नहीं डालता। अगर मस्जिद वाकई न मिले और वक्त निकल रहा हो, तो इस्लाम में खुले में नमाज जायज है, मगर जान-बूझकर हर जुमे को सड़क चुनना मजबूरी नहीं, आदत और दिखावा है। इस्लामी शिक्षा के अनुसार, नमाज, रोजा, हज, जकात सब अल्लाह के लिए है। अगर न कर पाए, तो उनसे क्षमा-प्रार्थी हों, वह माफ कर देंगे, परंतु सामाजिक व जन-व्यवहार के कार्यों में अगर त्रुटि रह गई, तो अल्लाह ने अपनी माफी की परिधि से उसे बाहर रखा है।

गौर कीजिए, इस्लामी दिशा-निर्देशों का तीन-चौथाई भाग आपसी अधिकार और सामाजिक आचरण पर आधारित है, जिसमें धोखा देना, गाली देना, लूट-मार करना, हानि पहुंचाना मना है। अगर ऐसा कुछ भी किया, तो उसकी माफी केवल पीड़ित पक्ष दे सकता है। सहीह मुस्लिम में दर्ज है- नबी ने पूछा, ‘क्या तुम जानते हो निर्धन कौन है?’ साथियों ने कहा- ‘जिसके पास दिरहम-दीनार न हो।’ आपने कहा- ‘मेरी उम्मत का निर्धन वह है, जो कयामत में नमाज, रोजा, जकात लेकर आएगा, पर उसने किसी को गाली दी होगी, किसी का माल खाया होगा, किसी का खून बहाया होगा। फिर उसके पुण्य उन लोगों को दे दिए जाएंगे।’ रास्ता रोकना भी लोगों का हक मारना है। ऐसे में, अगर नमाज न पढ़ी, तो हो सकता है कि अल्लाह माफ कर दे, परंतु रास्ता रोककर पढ़ने से अगर किसी को तकलीफ पहुंची, तो कोई क्षमा नहीं।

इस्लाम ने अपने पड़ोसियों के साथ अच्छा व्यवहार करने का आदेश दिया है। कुरान; सूरह निसा 4:36 में जहां माता-पिता, रिश्तेदार, यतीम, निर्धन के साथ अच्छा व्यवहार करने को कहा गया है, वहीं करीबी व दूर के पड़ोसी, दोनों को रेखांकित करके अच्छे व्यवहार का आदेश दिया गया है। पैगंबर मुहम्मद स. ने यहां तक कहा है कि पड़ोसी को हानि पहुंचाने वाला मोमिन नहीं हो सकता, यानी उसका ईमान ही संदेह के दायरे में है। रास्ते पर नमाज पढ़कर हम खुल्लम-खुल्ला कुरान और हदीस की शिक्षा को नकारकर पड़ोसियों, मुहल्लेदारों व दूर के राहगीरों को तकलीफ पहुंचा रहे हैं।

एक मस्जिद-प्रांगण में नमाज की कई जमातें हो सकती हैं। संगठन और व्यवस्था बनाने की आवश्यकता है। इससे जीवन में सभ्यता तो आएगी ही, साथी नमाजियों का कुशलक्षेम जानना अधिक आसान होगा। अगर कई पारियों से भी बात न बने, तो वक्फ बोर्ड खाली प्लॉट में अस्थायी टेंट लगाने का प्रावधान कर सकता है। समय आ गया है कि सारे धर्मगुरु सही शिक्षा लोगों तक पहुंचाएं और कानून के हाथ मजबूत किए जाएं, ताकि जो लोग धर्म और व्यवस्था, दोनों की अवहेलना कर रहे हैं, उनसे कड़ाई से निपटा जाए। कानून पुलिस वाले तोड़ें या किसी धर्म को मानने वाले, छूट किसी को नहीं मिलनी चाहिए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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