
सतत बदलाव ही जीवन
सर्दियों की एक सुबह मैं लुधियाना में ओशो ध्यान शिविर करवा रही थी। ध्यान था जिंदगी में होने वाले सतत बदलाव को देखना और स्वीकार करना। बदलाव को महसूस करने के लिए मैंने एक खूबसूरत गुलाब का बगीचा चुना। अलग-अलग रंग और
सर्दियों की एक सुबह मैं लुधियाना में ओशो ध्यान शिविर करवा रही थी। ध्यान था जिंदगी में होने वाले सतत बदलाव को देखना और स्वीकार करना। बदलाव को महसूस करने के लिए मैंने एक खूबसूरत गुलाब का बगीचा चुना। अलग-अलग रंग और शेड्स के गुलाब- गुलाबी से बैंगनी और पीले से सफेद तक। बड़े और छोटे, सभी आकार के। वे जिंदगी के अलग-अलग पड़ाव पर थे, यानी कुछ कलियां थीं, कुछ आधे खिले हुए, कुछ पूरे खिले हुए और कुछ मुरझाए हुए। पत्तियां भी उम्र में अलग-अलग थीं, हरी कोंपलों से लेकर सूखी भूरी-पीली तक। ध्यान करने वाले लोग घूम रहे थे, गुलाब की झाड़ी के हर उस पड़ाव को ध्यान से देख रहे थे, जो जीवन की धारा में बह रहा था। प्रकृति में बदलाव को समझना बहुत आसान है, क्योंकि सभी पड़ाव एक साथ आपकी आंखों के सामने होते हैं।
गुलाबों के बदलाव को समझने के बाद लोग आस-पास टहल रहे लोगों को देखने लगे। क्या वे भी उन्हीं पड़ावों से नहीं गुजर रहे थे? सभी उम्र के लोग : जवान, अधेड़, बूढ़े, मौत की दहलीज पर... और एक दिन वे नहीं रहेंगे! हर इंसान के सामने रुककर, एक-दूसरे की आंखों में देखकर यह अटल सच जोर से उभरकर आया। क्या उनमें और गुलाबों में कोई फर्क था? सभी लोग गुलाब की झाड़ियों के बीच बैठ गए, उन्होंने अपनी आंखें बंद कर लीं और जिंदगी की उन अलग-अलग स्थितियों को देखा, जिनसे वे गुजरे थे- बचपन, किशोरावस्था, जवानी, बुढ़ापा; अपने शरीर, विचारों, भावनाओं, सपनों में बदलाव, और अब जिंदगी के जिस पड़ाव पर वे थे, उन सबको फिर से देखने के लिए कहा। एक दिन वे भी अपने साथी यात्रियों, गुलाबों की तरह मुरझा जाएंगे। कुछ बंद पलकों से आंसू बहने लगे। भीतर से कुछ बोध हुआ। बोध के साथ एक गहरी स्वीकृति आती है कि अगर बदलाव ही जिंदगी का नियम है, तो इसे क्यों न स्वीकार करें?
ध्यान के बाद एक अधेड़ उम्र के सिख कारोबारी मुझसे मिलने आए। उनकी आंखों में अभी भी उस गहरे अनुभव की नमी थी। उन्होंने कहा, ‘यह मेरे लिए आंखें खोलने वाला अनुभव था। मैं बदलाव का विरोध करता था- अपनी फैक्टरी में, घर में। मुझे लगता था कि बदलाव मेरे फैसलों का अपमान है, जैसे यह मेरी हार हो और इसी वजह से मैंने अपने चारों ओर एक सख्त खोल बना लिया था। लोग मुझसे दूर रहते थे। आज पहली बार जब मैंने बाहर और अंदर बदलाव की धारा को देखा, तो मैं अंदर तक हिल गया। मुझे एहसास हुआ कि बदलाव से लड़कर मैं जिंदगी से लड़ रहा था।’
एक बार जब हमें यह एहसास हो जाएगा कि जीने का मतलब ही बदलना है, तो हम बदलाव करने में रिलैक्स महसूस करेंगे और खुद को जिंदगी की धारा में बहने देंगे।
अमृत साधना

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