शुल्क संग्राम के मायने

शुल्क संग्राम के मायने

संक्षेप:

अंतत: भारत दुनिया के उन चंद देशों में शामिल कर लिया गया, जिन पर अमेरिका ने सबसे ज्यादा टैरिफ या सीमा शुल्क थोप रखा है। अनेक उत्पादों पर 50 प्रतिशत या उससे भी ज्यादा शुल्क के साथ भारत अब अमेरिका के लिए सबसे प्रतिकूल तीन देशों में…

Aug 27, 2025 10:34 pm ISTHindustan लाइव हिन्दुस्तान
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अंतत: भारत दुनिया के उन चंद देशों में शामिल कर लिया गया, जिन पर अमेरिका ने सबसे ज्यादा टैरिफ या सीमा शुल्क थोप रखा है। अनेक उत्पादों पर 50 प्रतिशत या उससे भी ज्यादा शुल्क के साथ भारत अब अमेरिका के लिए सबसे प्रतिकूल तीन देशों में एक हो गया है। फिलहाल, ब्राजील और लेसोथो ही दो ऐसे देश हैं, जिनके निर्यात पर 50 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ लागू है। वियतनाम पर 46 प्रतिशत शुल्क है, जबकि चीन पर मात्र 30 प्रतिशत। वैसे म्यांमार और श्रीलंका पर भी अमेरिका ने 44 प्रतिशत शुल्क लगा रखा है। ज्यादा चुभने वाली बात यह है कि भारत पर 25 प्रतिशत शुल्क दंड स्वरूप लगाया गया है। यह दंड रूस से तेल आयात की वजह से थोपा गया है। इसमें कुतर्क की बात यह है कि चीन तेल आयात में भारत से आगे है, पर चीन पर ऐसा कोई जुर्माना नहीं लगा है। यह भी एक त्रासद विडंबना है कि चीन से मुकाबले के लिए ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को फिर महान बनाने की एकतरफा महत्वाकांक्षी योजना घोषित की थी, पर आज वह चीन और चीनियों को तरजीह दे रहे हैं। अमेरिकी कूटनीति का यह खोखलापन निस्संदेह इतिहास में दर्ज हो रहा है।

विशेषज्ञों ने पहले ही बता दिया है कि अमेरिकी शुल्क और जुर्माने का असर अमेरिका भेजे जाने वाले 55 प्रतिशत से ज्यादा भारतीय सामान पर पड़ेगा। कपड़ा व आभूषण जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों को ज्यादा नुकसान की आशंका है। औषधि या दवा, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर्स, एनर्जी प्रोडक्ट्स, दुर्लभ खनिज जैसे क्षेत्रों में भारतीय निर्यात पर कोई शुल्क नहीं लगा है, अत: करीब 45 प्रतिशत भारतीय निर्यात पर कोई असर नहीं पड़ेगा। अमेरिकी कंपनियां भारत में अपने इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पाद बनाकर फायदे में रहेंगी। सबसे ज्यादा प्रभाव भारतीय डेयरी उत्पादों के निर्यात पर पड़ेगा, क्योंकि ऐसे उत्पादों पर अब 55 प्रतिशत से लेकर करीब 82 प्रतिशत तक शुल्क लद जाएगा। हां, जिन वस्तुओं के निर्यात में कमी आएगी, उन उद्योगों को अलग बाजार की तलाश में जुटना होगा। इन उद्योगों को सरकार की ओर से भी मदद की उम्मीद रहेगी। भारत सरकार के पास इतनी मजबूती है कि वह अपने निर्यातकों को नुकसान से बचा सकती है। थोड़े से प्रयास से इन उद्योगों में छंटनी को रोका जा सकता है। भारत सरकार को तैयार रहना चाहिए, ताकि भारतीय उद्योगों को कम से कम नुकसान हो।

अब यह इतिहास में दर्ज हो गया है कि भारत अपनी ओर से अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता शुरू करने वाले पहले देशों में शुमार था, पर डेयरी और कृषि क्षेत्र पर वार्ता ठहर गई। अमेरिका यही कहेगा कि भारत की संरक्षणवादी नीतियों की वजह से वार्ता नाकाम हुई है, पर वास्तविकता यह है कि ट्रंप प्रशासन भारत की जमीनी स्थितियों और सांस्कृतिक विवशताओं को समझने में नाकाम रहा। ट्रंप किसी भी तरह से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को उबारने या नंबर वन बनाए रखने के प्रयास में अपने देश की उदारवादी या समझदार नीतियों से मुंह मोड़ चुके हैं। अब आगे भारत सरकार को और दृढ़ रहना होगा। निस्संदेह, आंतरिक रूप से राजनीतिक स्तर पर उसकी आलोचना होगी, उसकी विदेश नीति को नाकाम बताया जाएगा। वाकई, ट्रंप ने निराश और नाराज किया है, पर इसका अर्थ यह नहीं कि भारत अपने किसानों-मजदूरों के हित से समझौता कर ले। यह हिम्मत और एकजुटता से काम लेने का समय है। भारत को अपनी संप्रभुता और स्वतंत्र नीतियों के अनुरूप समाधान के हरसंभव प्रयास जारी रखने चाहिए।