सराहनीय मतदान

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असम, केरलम और पुडुचेरी में मतदान की सफलता सुखद व अनुकरणीय है। कुल मतदान के आंकड़े बाद में आएंगे, लेकिन गुरुवार शाम पांच बजे तक असम में 84.42 और केरलम में 75.01 प्रतिशत मतदान हो चुका था…

सराहनीय मतदान

असम, केरलम और पुडुचेरी में मतदान की सफलता सुखद व अनुकरणीय है। कुल मतदान के आंकड़े बाद में आएंगे, लेकिन गुरुवार शाम पांच बजे तक असम में 84.42 और केरलम में 75.01 प्रतिशत मतदान हो चुका था। पुडुचेरी केंद्रशासित प्रदेश में मतदान दोपहर एक बजे ही 72.40 प्रतिशत पर पहुंच गया था। सराहनीय मतदान का श्रेय वास्तव में चुनाव आयोग और उसकी तैयारियों को देना चाहिए। चूंकि मतदाताओं की सुविधाओं का ज्यादा से ज्यादा ध्यान रखा जा रहा है, इसलिए मतदान में सफलता मिल रही है। यहां यह दोहरा दिया जाए कि असम की 126, केरलम की 140 और पुडुचेरी की 30 सीटों पर एक साथ ही मतदान हुआ है। सबसे बड़ी बात कि तीनों राज्यों या केंद्रशासित प्रदेश में मतदान के दौरान किसी बड़ी गड़बड़ी या हिंसा की सूचना नहीं है। इससे पता चलता है कि पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने भी अपने काम को मुस्तैदी से अंजाम दिया है। ध्यान रहे, असम में पिछली बार तीन चरणों में मतदान हुआ था, इस बार केवल एक चरण में हुआ मतदान इस राज्य की तरक्की का ही एक पहलू है।

असम में बीते दस वर्ष से भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार है और इस बार भी भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन की स्थिति कमजोर नहीं है। असम में भाजपा के साथ स्थानीय पार्टियां एजीपी और बीपीएफ भी हैं, जिससे उसे लाभ की उम्मीद है। यहां भाजपा के गठबंधन का मुकाबला कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन से है। यहां राजनीति के ध्रुवीकरण से कोई इनकार नहीं कर सकता। पिछले चुनाव के बाद यहां परिसीमन हुआ है, 15 नए निर्वाचन क्षेत्र बने हैं। माना जा रहा है कि निर्णायक मुस्लिम वोट वाले क्षेत्रों की संख्या 35 से घटकर 23 हो गई है। इसी से जुड़ा एक पहलू यह भी है कि पिछली बार भाजपा ने नौ मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था, केवल एक को जीत मिली थी और उस एक को भी इस बार पार्टी ने टिकट नहीं दिया है। असम भारतीय राजनीति की एक प्रयोगशाला है। वहां अगर घोषित ध्रुवीकरण और सबके समान विकास की राजनीति कामयाब होती है, तो असर अन्य राज्यों पर पड़ सकता है। पिछले चुनावों के मुकाबले कांग्रेस मजबूत है, लेकिन क्या उसे बहुमत लायक वोट मिले हैं? इस सवाल का जवाब उन वोटिंग मशीनों में दर्ज हो गया है, जो 4 मई को खोली जाएंगी।

असम की तरह ही केरलम में भी कांग्रेस की साख दांव पर है। यहां वाम मोर्चा लगातार तीसरी बार जीतने के लिए जोर लगा रहा है। देश में वामपंथियों के लिए केरलम एकमात्र गढ़ है। अगर यहां वामपंथी हारे, तो देश में वामपंथ के एक युग का पटाक्षेप हो जाएगा। बंगाल में वामपंथी बहुत कमजोर हो गए हैं, तो केवल केरलम बचा है। एक बार वाम, तो अगली बार कांग्रेस के जीतने का सिलसिला पिछले विधानसभा चुनाव 2021 में ही टूट गया था। तब मुख्यमंत्री कॉमरेड पिनराई विजयन के नेतृत्व में एलडीएफ को 99 सीटें हासिल हुई थीं, इस बार सीटें घटने की संभावना है, पर क्या एलडीएफ की सीटें इतनी घटेंगी कि कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ सत्ता में आ जाए? भाजपा यहां ठीकठाक शुरुआत भी कर ले, तो संतोष कर सकती है। बेशक, केरलम में भाजपा ठीक उसी तरह मजबूत हो रही है, जैसे तमिलनाडु में, पर हकीकत यही है कि इन अपेक्षाकृत विकसित राज्यों में भाजपा मंजिल से काफी दूर है। रही बात पुडुचेरी की, तो यहां भाजपा सत्तारूढ़ गठजोड़ का हिस्सा है, जिसे द्रमुक व कांग्रेस के गठजोड़ से टक्कर मिल रही है। खैर, जीत का सेहरा किसके सिर बंधेगा, यह पूरा देश जानना चाहेगा।

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