पृथ्वी के प्रति सजग बनाने वाला दिन

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दुनिया भर में आज (22 अप्रैल) पृथ्वी दिवस मनाया जा रहा है। सन् 1970 में पृथ्वी संरक्षण के उद्देश्य से इस दिवस को मनाने का निर्णय लिया गया था। यह वह दिन है, जब धरती के प्रति लोगों को जागरूक किया जाता है…

पृथ्वी के प्रति सजग बनाने वाला दिन

दुनिया भर में आज (22 अप्रैल) पृथ्वी दिवस मनाया जा रहा है। सन् 1970 में पृथ्वी संरक्षण के उद्देश्य से इस दिवस को मनाने का निर्णय लिया गया था। यह वह दिन है, जब धरती के प्रति लोगों को जागरूक किया जाता है। इस बाबत कई आयोजन किए जाते हैं, ताकि हर कोई पृथ्वी के महत्व को समझ सके। ऐसा करना जरूरी भी है, क्योंकि पृथ्वी के बिना मानव जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है।

ऐसा माना जाता है कि पृथ्वी पर लगभग 3,00,000 वनस्पति और जीव-जंतु रहे हैं, लेकिन इंसान ने अपने स्वार्थ के लिए पर्यावरण को इस कदर बिगाड़ दिया कि इनमें से बहुत से जीव-जंतु लुप्त हो गए, और कुछ लुप्त होने के कगार पर हैं। हम जिस थाली में खाएं, उसी में छेद करना शुरू कर दें, तो यह हमारी सबसे बड़ी नासमझी होगी। पृथ्वी हमें नि:स्वार्थ भाव से जीने के लिए सब कुछ देती है, लेकिन हम नासमझी बरतते हुए इसे ही नुकसान पहुंचाने में लगे हैं। महात्मा गांधी ने पर्यावरण और सतत विकास को लेकर कहा था कि आधुनिक शहरी औद्योगिक सभ्यता में ही उसके विनाश के बीज निहित हैं। इंसान ने अपने हाथों ही प्रकृति की नाक में दम करके अपने और अन्य जीवों के विनाश का रास्ता तैयार कर लिया है। अब जिस तरह पूरा विश्व ‘ग्लबोल वार्मिंग’ जैसे खतरे को लेकर चिंताएं जताने लगा है, उससे उम्मीद है कि पृथ्वी दिवस की सार्थकता और बढ़ जाएगी।

इस दिवस ने दुनिया भर में लोगों को जागरूक किया है और माना जा रहा है कि जो लोग अब तक पृथ्वी की चुनौतियों के प्रति कुंभकर्णी निद्रा में सो रहे हैं, उनको भी जगाना अब आसान हो जाएगा। लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने की सख्त जरूरत है, जिसमें पृथ्वी दिवस हमारी मदद कर रहा है।

इंसान हर क्षेत्र में चाहे जितनी मर्जी तरक्की कर ले, लेकिन शुद्ध आबोहवा के बिना वह अपना जीवन खुशहाली से नहीं जी सकता। आज पृथ्वी पर जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण इत्यादि इस कदर बढ़ता जा रहा है कि धरती शायद यही पुकार कर रही होगी कि हे मानव, अगर तुमने मुझ पर जुल्म करना बंद नहीं किया, तो वह दिन दूर नहीं, जब तेरा मुझ पर (पृथ्वी) रहना नामुमकिन हो जाएगा। पृथ्वी को सुरक्षित रखने के लिए सभी को प्रयास करना ही चाहिए, तभी यह स्वर्ग बन सकती है, अन्यथा यहां पर रहना नरक से बदतर हो जाएगा, और एक दिन ऐसा भी आ सकता है, जब पृथ्वी पर प्राणी जाति का अस्तित्व ही खत्म हो जाए। कोई नामलेवा न बचेगा। उस दिन को रोकना है, जो हमें अभी से जागना होगा।

राजेश कुमार चौहान, टिप्पणीकार

इस रस्म अदायगी से धरती का भला न होगा

क्या माता की जरूरत हमें एक दिन के लिए ही है? पर्यावरण की अग्रिमता को समझते हुए 1970 में 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस मनाना शुरू हुआ, जिसमें आज विश्व के 192 देशों के नागरिक भाग ले रहे है। इस वर्ष की थीम है- हमारी शक्ति, हमारा ग्रह। यह थीम अक्षय ऊर्जा, जलवायु कार्रवाई और पर्यावरण संरक्षण में सामुदायिक भागीदारी पर केंद्रित है, जिसका मकसद स्वच्छ, टिकाऊ और सुरक्षित भविष्य का निर्माण करना है। किंतु, हम भारतीय तो वेद की संतानें हैं, प्रकृति पूजक हैं। धरती को हम माता मानते हैं। क्या उसकी पूजा वर्ष में केवल एक ही दिन करेंगे और बाकी के दिवस जमकर उसका दोहन करेंगे? क्या यह पाप नहीं है? क्या जवाब देंगे हम अपने ईश्वर को? इसलिए पृथ्वी दिवस को सिर्फ एक दिन का आयोजन नहीं समझें। इसे पूरा साल मनाएं। वास्तव में, पृथ्वी दिवस नहीं, ‘पृथ्वी जीवन’ मनाने का यह वक्त है। हमें हर दिन पृथ्वी रूपी अपनी माता का ख्याल रखना चाहिए, तभी हम अपना जीवन साकार कर सकते हैं।

दिव्यदर्शन पुरोहित, टिप्पणीकार

पृथ्वी दिवस का वाकई खास महत्व है। यह सालाना आयोजन पर्यावरण जागरूकता पर बल देता है। किंतु महज एक दिन की जागरूकता से हमें कुछ लाभ नहीं होगा। अभी होता यही है कि कुछ कार्यक्रम और आयोजन करके हम इस दिवस को गुजार देते हैं, यानी ठोस प्रयास किए जाने के बजाय सतही काम ही अधिक किए जाते हैं। कई लोगों को तो इसके बारे में पता भी नहीं चल पाता। इन सबसे यह दिवस निर्रथक साबित हो जाता है। इसका औचित्य यदि साबित करना है, तो हमें इसे हर दिन मनाना चाहिए। इसके लिए हमें कोई जलसा करने की जरूरत नहीं होगी, बल्कि हम चाहें, तो अपने आसपास प्रकृति के हित में कुछ काम करके इस दिवस को खास बना सकते हैं। हम बागवानी कर सकते हैं, नदी-ताल-तालाब आदि का संरक्षण कर सकते हैं, प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा कर सकते हैं। इस बार की थीम भी यही कहती है कि हमारा ग्रह हमारी सबसे बड़ी ताकत है, इसलिए हमें अपनी इस ताकत की रक्षा करनी चाहिए और किसी एक दिवस में इसे बांधने से बचना चाहिए। अगर हम रोज अपनी धरती के बारे में सोचेंगे, तो इसे कहीं अधिक हरा-भरा और इंसानों के अनुकूल बना सकेंगे। ऐसा करना जरूरी भी है, क्योंकि पृथ्वी है, तभी हम हैं। अगर आज पृथ्वी को नुकसान पहुंचा, तो हमारा वजूद खतरे में आ जाएगा। सुरक्षित धरती के बिना मानव जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती।

स्वाति कुमारी, छात्रा

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