राजनीति असहमतियों का दमन चिंताजनक
भारत में कवियों, लेखकों व पत्रकारों के खिलाफ अक्सर एफआईआर दर्ज कराई जाती है, जिनमें आस्था को ठेस पहुंचाने या सामाजिक विभेद पैदा करने के आरोप लगाए जाते हैं। यहां तक कि राजनेताओं के खिलाफ बोलने पर भी उत्पीड़न की कार्रवाई कर दी जाती है…

भारत में कवियों, लेखकों व पत्रकारों के खिलाफ अक्सर एफआईआर दर्ज कराई जाती है, जिनमें आस्था को ठेस पहुंचाने या सामाजिक विभेद पैदा करने के आरोप लगाए जाते हैं। यहां तक कि राजनेताओं के खिलाफ बोलने पर भी उत्पीड़न की कार्रवाई कर दी जाती है।
पंजाब से आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद और सदन में उपनेता राघव चड्ढा के खिलाफ पार्टी की ओर से ही अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई है। ‘आप’ ने राज्यसभा सचिवालय को पत्र लिखकर कहा है कि चड्ढा को पद से हटा दिया गया है और उन्हें सदन में बोलने के लिए पार्टी की ओर से समय न दिया जाए। उन पर आरोप लगाया गया है कि वह पार्टी का पक्ष जोर-शोर से नहीं रख रहे थे। बस, इतनी सी बात पर पार्टी ने अपनी सर्वोच्च शक्ति का इस्तेमाल कर दिया। यह आप द्वारा अपने ही सदस्य की अभिव्यक्ति की आजादी का दमन माना जाएगा।
एक मामला कांग्रेस नेता पवन खेड़ा से जुड़ा हुआ है। हाल ही में चुनाव प्रचार के दौरान गुवाहाटी में असम के मुख्यमंत्री पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने के कारण उन पर संगीन धाराओं में केस दर्ज करा दिया गया, जिसमें उन पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है, जबकि यह मामला पूरी तरह सियासी आलोचना का है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दुरुपयोग के आरोप में एक कवयित्री को निशाना बनाया गया है। उक्त कवयित्री की एक पीड़ाजन्य, ईमानदार और मार्मिक कविता के विरुद्ध किसी अज्ञात कुलशील ने एफआईआर दर्ज करवाई है। जाहिर है, उसकी भी भावनाएं आहत हुई है इस कविता से। अगर कोई कविता की पंक्तियों से सहमत नहीं है, तो उसे लेखन का जवाब अपनी कलम से देना चाहिए। पुलिस के पास रपट लिखवाना फिर मामले को अदालत तक लेकर जाना न सिर्फ रचनाकारों को डराना, धमकाना है, बल्कि न्यायपालिका का भी बोझ बढ़ाना है। वैसे भी, इन दिनों कई तरह के गिरोह भावनाओं के आहत होने के अभियान में लगे हुए हैं। पुलिस भी इन दिनों भावनाओं की इतनी खैरख्वाह हो गई है कि वह एफआईआर दर्ज करने में देर नहीं लगाती,भले असली मामलों को वह दर्ज करने में आनाकानी करती हो।
साफ है, राजनीति ही नहीं, कला- साहित्य, पत्रकारिता के क्षेत्र में छोटी-छोटी बातों को लेकर असहमति जताने भर से बदले की कार्रवाई शुरू हो जाती है। इसे स्वस्थ लोकतंत्र के लक्षण नहीं कहे जा सकते हैं। इसके स्रोत हमारे असहिष्णु होते समाज में निहित हैं, तो इसका लौटता असर पूरे देश को अधिक असहिष्णु बनाता है। इस प्रवृत्ति को हतोत्साहित करने में ही देश-समाज का भला है।
मुकेश प्रसाद ठाकुर, अधिवक्ता
अपनी कथनी की कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी
पिछले दिनों आम आदमी पार्टी ने राघव चड्ढा को सदन में उप-नेता के पद से हटाकर उनकी जगह अशोक मित्तल को नियुक्त कर दिया है। कभी केजरीवाल के बेहद करीबी माने जाने वाले चड्ढा के बारे में कहा जा रहा है कि पिछले कुछ समय से ‘आप’नेतृत्व से उनके संबंध अच्छे नहीं चल रहे हैं। इससे पहले असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में होने वाले आगामी चुनावों के लिए पार्टी के ‘स्टार प्रचारकों’ में चड्ढा का नाम शामिल नहीं किया गया है। पिछले कई महीनों से पार्टी के भीतर चड्ढा की भूमिका को लेकर लगातार अटकलें लगाई जा रही थीं।
राघव चड्ढा चाहे कुछ भी सफाई दें, वह एक राजनीतिज्ञ हैं। इसलिए राज्यसभा में उन्हें जोमैटो और मोबाइल रिचार्ज के मुद्दों से अलग हटकर ज्वलंत राजनीतिक मुद्दों को उठाना चाहिए था। सबसे बड़ी बात यह देखने में आ रही है कि सितंबर 2023 में, जब से उन्होंने परिणीति चोपड़ा के साथ विवाह किया है, तब से उनका अपने पार्टी के प्रति उतना लगाव नहीं देखा जा रहा है। खासकर, जब पार्टी के वरिष्ठ नेताओं, अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया व संजय सिंह को गिरफ्तार किया गया था, तब उन्होंने उस विषय पर कोई सार्वजनिक बयान तक नहीं दिया है। कहीं ऐसा तो नहीं कि उनकी जीवनसाथी को ‘आप’ की विचारधारा न पसंद हो और शायद उन्हें ‘हिंदुत्व’ से ज्यादा लगाव हो? चड्ढा जी पार्टी बदलने के लिए रास्ता तलाश कर रहे हों? इसकी पुष्टि तो तभी होगी, जब वह अगले कुछ दिनों में नई पार्टी में विधिवत शामिल हो जाएंगे। वैसे आम आदमी पार्टी का गठन करके अरविंद केजरीवाल ने किसी से बगावत ही किया था, क्योंकि 2013 में रामलीला मैदान में, जो कांग्रेस और मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन किया गया, वह सब एक साजिश थी। उस साजिश में शामिल होने वालों में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, कुमार विश्वास, अन्ना हजारे, किरण बेदी जैसे लोग थे। बाकी को तो उस साजिश के कामयाब हो जाने का फल मिला, मगर केजरीवाल ने अपने कुछ लोगों को अलग करके बगावत करते हुए ‘आप’ पार्टी का गठन कर लिया था।
राघव चड्ढा भी ‘आप’ में शामिल हो गए थे, लेकिन उनका मन यहां नहीं लगता था। शरीर से तो वह इस पार्टी में हैं, लेकिन मन उनका कहीं और उचाट रहता था। ऐसे में, अगर ‘आप’ पार्टी उनसे छुटकारा पाने की प्रक्रिया में, तो यह उसके साफ और स्पष्ट दृष्टिकोण का ही असर है। ऐसे ‘विषकुम्भम् पयोमुखम’ साथी से दूर रहना ही बेहतर है, और ‘आप’ वही सही काम कर रही है।
जंग बहादुर सिंह, टिप्पणीकार
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