यह सीधे-सीधे परीक्षा तंत्र की विफलता

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आखिरकार वही हुआ, जिसका अंदेशा था। एक बार फिर मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए 3 मई को संपन्न नीट (यूजी) परीक्षा प्रश्न-पत्र लीक होने की वजह से रद्द हो गई। यह घटना दुखद है और इससे सरकार की बदनामी हुई है…

यह सीधे-सीधे परीक्षा तंत्र की विफलता

आखिरकार वही हुआ, जिसका अंदेशा था। एक बार फिर मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए 3 मई को संपन्न नीट (यूजी) परीक्षा प्रश्न-पत्र लीक होने की वजह से रद्द हो गई। यह घटना दुखद है और इससे सरकार की बदनामी हुई है, क्योंकि लगभग 23 लाख परीक्षार्थी उस अपराध की सजा भुगतने को अभिशप्त हैं, जो उन्होंने किया ही नहीं। उनके महीनों-बरसों के परिश्रम और उम्मीदों पर फिलहाल पानी फिर गया है। यह पूरी तरह से तंत्र की नाकामी है। साल 2024 में भी इसी तरह पेपर लीक की घटना हुई थी और उसके दोषियों का क्या हुआ, किसी को कुछ पता नहीं है। सीबीआई चार्जशीट दायर करने में आखिर इतना समय क्यों लेती है कि अरोपी अदालत से जमानत पा लेते हैं? पेपर लीक करना एक संगठित अपराध है, जिसमें पैसा और पावर, दोनों काम करता है, इसलिए ऐसी घटनाओं के बार-बार होने का मतलब यही निकलता है कि इसमें रसूखदार लोग शामिल होंगे। ऐसे में, बेहतर यही होगा कि एनटीए की जगह यूपीएससी नीट परीक्षा का आयोजन करे। कम से कम इससे सरकार को शर्मिंदा होने की नौबत तो नहीं आएगी।

हर्ष वर्द्धन कुमार, टिप्पणीकार

नीट परीक्षा 3 मई को हुई थी और अब उसे रद्द कर दिया गया है, मानो यह परीक्षा न होकर कोई मजाक बन गई हो। किसी भी नीट परीक्षार्थी से पूछ लें, उसकी मानसिक स्थिति का पता चल जाएगा कि वह किस तनाव से गुजर रहा है। एक-दो दिन नहीं, बल्कि पूरे तीन 365 दिन, सारे त्योहार, पारिवारिक समारोहों को त्यागकर एक नीट परीक्षार्थी परीक्षा की तैयारी करता है। अगर वह घर के बाहर रहकर तैयारी कर रहा है, तो उसे खाने-पीने की समस्या भी झेलनी पड़ती है। बावजूद इसके वह पूरी ईमानदारी से यह परीक्षा देता है, लेकिन पेपर लीक के कारण उसे रद्द कर दिया जाता है। इतनी महत्वपूर्ण परीक्षा में चूक का पता एनटीए को समय-पूर्व क्यों नहीं चला? गेस पेपर से मिलता-जुलता नीट परीक्षा का प्रश्न-पत्र पहले ही बिकने लगा था, तो उसकी जांच-पड़ताल क्यों नहीं हुई? परीक्षा रद्द करने की घोषणा करना आसान है, किंतु जिनके लिए परीक्षा आयोजित की जाती है, उनके लिए तो यह एक मानसिक प्रताड़ना की स्थिति बन जाती है। ऐसी सूरत में बच्चों द्वारा हताशा में कोई गलत कदम भी उठाया जा सकता है।

साफ है, सरकार और तंत्र को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। नीट परीक्षा बच्चों का भविष्य-निर्माण करती है, लेकिन अभी के हालात को देखते हुए यही लगता है कि यह बच्चों का भविष्य क्या बनाएगी, उनका वर्तमान बिगाड़ रही है।

शैलबाला कुमारी, गृहिणी

बेईमानी करने वाले कैसा डॉक्टर बनेंगे

एक और बड़ी परीक्षा पेपर लीक के कारण रद्द कर दी गई। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने नीट (यूजी) परीक्षा, जो इस वर्ष 3 मई को हुई थी, रद्द कर दी है। पेपर लीक की जांच सीबीआई से कराने के आदेश भी दिए गए हैं। इन सबके कारण एक बार फिर मेहनती और ईमानदार परीक्षार्थियों के साथ धोखा हो गया है। इस मामले की सच्चाई क्या है, यह तो उचित और निष्पक्ष जांच से ही पता चल सकेगा, लेकिन यह सवाल जरूर है कि जब ‘लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024’ लागू है, तब पेपर लीक कैसे हो गए? देश-समाज के विकास में पढ़े-लिखे नागरिकों का योगदान सर्वोपरि माना जाता है, लेकिन पढ़े-लिखे होने का मतलब नकल करके या अनुचित तरीके से डिग्री हासिल करना नहीं, बल्कि किताबों के ज्ञान को दिमाग में अच्छी तरह उतारना होता है। अफसोस, हमारे देश में लोग किसी भी तरीके से डिग्री हासिल कर लेना चाहते है, जिससे नकल की व्यवस्था को प्रोत्साहन मिलता है।

जिस देश की प्रतियोगिताओं और परीक्षाओं में दोष आ जाए, उस देश की पूरी व्यवस्था में ही गड़बड़ी आ जाती है। इससे वह देश बर्बादी की तरफ बढ़ने लगता है। जब हेराफेरी, बेईमानी और जालसाजी से डॉक्टर, वकील, शिक्षक, इंजीनियर या अन्य पेशे के लोग तैयार होंगे, तब क्या वे अपने पेशे के प्रति ईमानदार रह पाएंगे? क्या ऐसे लोग देश-सेवा और समाज-सेवा कर सकेंगे? कदापि नहीं। एक चीज और, इस मुद्दे पर कोई भी राजनेता राजनीति न करे, बल्कि जांच-पड़ताल में सरकार का सहयोग करे, क्योंकि जब किसी मुद्दे पर राजनीति शुरू हो जाती है, तब गलत करने वालों और भ्रष्ट अधिकारियों को प्रोत्साहन मिलता है। परीक्षाओं के पेपर लीक होना शत-प्रतिशत भ्रष्ट व्यवस्था का नतीजा है। अगर पूर्व की सरकारों ने इस बीमारी के इलाज में रुचि दिखाई होती, तो आज पेपर लीक की बीमारी मेहनतकश युवाओं के लिए मुसीबत न बनती, उनके सपने चकनाचूर न करती। साफ है, जब तक ऐसे गलत काम करने वाले लोगों में नैतिकता की भावना का विकास नहीं होगा, तब तक कागज पर लिखे सख्त कानून ऐसी धोखाधड़ी नहीं रोक सकेंगे। कोई भी कानून तभी कामयाब होता है, जब उसके रखवाले खुद उस पर अमल करें।

जाहिर है, हमें अपनी परीक्षा प्रणाली में बदलाव करने की जरूरत है। संभव हो, तो एआई का अधिकाधिक इस्तेमाल किया जाए, ताकि यह पता चल सके कि किस स्तर पर गड़बड़ी हो रही है। जब तक हम इस व्यवस्था में मौजूद छिद्रों को बंद नहीं करेंगे, परीक्षा में गड़बड़ियों को रोकना मुश्किल होगा। उम्मीद है, सरकार की तरफ से इस दिशा में काम होगा।

राजेश कुमार चौहान, टिप्पणीकार

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