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कैफी आजमी 99वीं जयंती: बेटी शबाना को समझ में नहीं आता था अब्बा का काम

शबाना आजमी, प्रसिद्ध अभिनेत्री

जब मैं छोटी थी, लगभग तीन साल उम्र रही होगी, तो मुझे लगता था कि बाकी बच्चों के पापा तो पैंट-शर्ट पहनते हैं, जबकि अब्बा हमेशा सफेद कुरता-पायजामा पहनते थे। मुझे उनकी यह बात अच्छी नहीं लगती थी। दूसरी बात मुझे यह भी नहीं समझ आती थी कि अब्बा हमेशा घर पर बैठकर लिखते क्यों रहते हैं, वह कभी ऑफिस क्यों नहीं जाते? बाकी बच्चों के पापा तैयार होकर सुबह ऑफिस जाते थे और शाम को लौटते थे, जबकि अब्बा को मैंने जब भी देखा, वह घर पर या तो लिखते रहते थे या कुछ पढ़ते रहते थे। मुझे लगता था कि मेरे अब्बा तो कोई काम ही नहीं करते। जब थोड़ी बड़ी हुई, कुछ शायरों को पढ़ना-समझना शुरू किया, तो समझ आया कि शायर होता क्या है? एक बार दोस्तों ने अब्बा की तस्वीर पेपर में दिखाई, तब समझ में आया कि अब्बा की शख्सीयत क्या है? इसके बाद तो मैं बड़े फख्र से कहती थी कि मैं कैफी आजमी की बेटी हूं। 

जब मैं छोटी थी, तो अब्बा ने मुझे एक उर्दू स्कूल में डाल दिया। मैं उस स्कूल में जाने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी। मैं बार-बार मना करती थी और गुस्सा दिखाने के लिए पैर घिसना शुरू कर देती थी। एक रोज मम्मी ने कहा कि मेरी बेटी बेवकूफ नहीं है, वह विरोध कर रही है, उस स्कूल में नहीं जाना चाहती है। उस वक्त क्वींस मेरी इंग्लिश स्कूल था। उसकी फीस 30 रुपये थी, अब्बा के पास कुल 40 रुपये होते थे। फिर भी उन्होंने मुझे उस स्कूल में पढ़ने के लिए भेजा। उन्होंने कभी मुझे डांटा नहीं। कभी तेज आवाज में बात तक नहीं की। बचपन से ही गंगा-जमुनी तहजीब हमारे रग-रग में थी। हम होली, दिवाली, ईद, क्रिसमस सब मनाते थे। बड़े-बड़े शायरों का हमारे घर आना-जाना था। फिराक गोरखपुरी, जोश मलीहाबादी, फैज अहमद फैज, साहिर लुधियानवी, मजरूह साहब। इसके अलावा मदन मोहन, बेगम अख्तर, एसडी बर्मन, ये जब भी आते थे, तो हमारे यहां ही ठहरते थे।'

एक रोज अब्बा ने मुझे एक काली गुड़िया लाकर दी। मगर मुझे बाकी लड़कियों की तरह भूरे बालों और नीली आंखों वाली गुड़िया चाहिए थी। उस रोज अब्बा ने मुझे समझाया था कि ‘ब्लैक इस ब्यूटीफुल टू’। यह उनकी और मम्मी की परवरिश का ही नतीजा था कि हम उस बात को समझ पाए। जिस तरह का लिटरेचर हमने उस जमाने में पढ़ा, उसका असर हमेशा रहा। आज मैं जो कुछ हूं, वह उसी विचारधारा का नतीजा है। अब्बा के जिन 40 रुपयों का मैंने जिक्र किया, उसका फसाना दरअसल यह है कि  कि हमारे पास पैसे नहीं होते थे। अब्बा के पास जो भी पैसे होते थ, वह कम्युनिस्ट पार्टी को दे देते थे। अपने लिए वह सिर्फ 40 रुपये रखते थे। जब भाई आ गए, तो जाहिर है कि पैसे की किल्लत होने लगी। ऐसे में, मम्मी ने ऑल इंडिया रेडियो में काम किया। फिर पृथ्वी थिएटर ज्वॉइन किया। एक बार तो मम्मी को कहीं टूर पर जाना था और उनकी चप्पल टूट गई। उन्होंने नाराज होकर अब्बा से कहा कि मैं हमेशा यही सुनती हूं कि मेरे पास पैसे नहीं हैं, अब बताओ मैं क्या करूं? अब्बा ने उनकी चप्पल ली। उसे अपनी आस्तीन में छिपाकर ले गए और थोड़ी देर में जब वापस लौटे, तो उनके हाथ में मरम्मत की हुई चप्पल के साथ-साथ पचास रुपये भी थे। अम्मी खुश हो गईं और चली गईं। जब उन्होंने अपना कार्यक्रम खत्म करने के बाद आयोजकों से पैसा मांगा, तो आयोजकों ने कहा कि पैसा तो कैफी साहब उनसे पहले ही लेकर जा चुके हैं। यानी अब्बा ने अम्मी का पैसा लाकर ही अम्मी को दे दिया। पैसे भले न हों, पर अब्बा ने विचारों ने हमें बहुत अमीर बनाया।   

अब्बा के लिखने का अंदाज भी अलग था। मान लीजिए, किसी गाने को लिखने की डेडलाइन है, तो उस दिन उन्हें घर के तमाम दूसरे काम याद आने लगते थे। वह अपनी लिखने की मेज साफ करने लगते थे। लंबे समय से जिन्हें खत नहीं लिख पाए थे, उन्हें खत लिखने बैठ जाया करते। लगातार इस कोशिश में रहते  कि लिखना कैसे टाला जाए। लेकिन उस पूरी प्रक्रिया में उनकी क्रिएटिवटी अंदर-अंदर चलती रहती थी। एक बार चेतन आनंद ने अब्बा से अपनी फिल्म के लिए गाना लिखने को कहा। उन दिनों चेतन आनंद की फिल्में कुछ अच्छी नहीं चल रही थीं। अब्बा बोले- क्यों मेरे से लिखवा रहे हैं? हम दोनों के सितारे आजकल गर्दिश में हैं। चेतन आनंद ने कहा, क्या पता कि इसके बाद ही सितारे चमक जाएं! और फिर हकीकत  फिल्म बनी। एक बार मैं आजमगढ़ के उस गांव में गई, जहां अब्बा का जन्म हुआ था। 1980 के आस-पास की बात है। मैं मिजवां गई थी। आजमगढ़ के उस गांव में पहुंचकर मैं बिलकुल हैरान रह गई। वहां बिजली-पानी जैसी बुनियादी सहूलियतें तक नहीं थीं। तब मैंने सोचा कि अब्बा ने वहां से निकलकर दुनिया में अपनी पहचान बनाई थी। (जारी...)

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  • Web Title:Shabana Azmi article in Hindustan on 14 January