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पतंग के चक्कर  में हुई पिटाई

पंकज कपूर

मेरा जन्म लुधियाना में हुआ था, जहां मेरे माता-पिता रहते थे। उस जमाने में लुधियाना छोटा सा शहर था। अब तो बहुत बड़ा हो गया है। छोटे शहरों की जो अच्छाइयां होती हैं, उन सबके साथ मेरा बचपन वहां गुजरा। एक मोहल्ला था। लोग थे। दोस्त-यार थे। बड़ा मासूम सा माहौल था, जिसमें मैं पला-बढ़ा। देश को आजादी मिले ज्यादा वक्त नहीं बीता था। समाज धीरे-धीरे ‘मेच्योर’ हो रहा था। आगे बढ़ रहा था। उसमें तब्दीलियां हो रही थीं। उस जमाने में टीवी नहीं था। मोबाइल और इंटरनेट जैसी चीजों का तो खैर सवाल ही नहीं था। रेडियो भी हर घर में नहीं होता था। मैं बहुत छोटा था, इसलिए आजादी के तुरंत बाद की कोई बात बहुत साफ-साफ तो याद नहीं है, लेकिन यह जरूर याद है कि सब कुछ बहुत सुहाना लगता था।  

मेरे पिता आनंद प्रकाश कपूर डबल एमए थे। उन्होंने अंग्रेजी और इतिहास दोनों से एमए किया था। वह लुधियाना के आर्य कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ाते थे। बाद में वह वहीं से प्रिंसिपल के पद से रिटायर हुए। मेरे पिता कमाल के इंसान थे। कमाल का लिखते भी थे। तपस्वी थे। उन्होंने अपना ध्यान अपनी तपस्या की तरफ रखा। मेरी मां का नाम था कुमुद कपूर। वह घरेलू महिला थीं। पढ़ी-लिखी थीं, लिहाजा उन्हें भी आट्र्स से जुड़ी चीजों का शौक था। वह उपन्यास खूब पढ़ती थीं। मेरे माता-पिता बड़े काबिल लोग थे। बावजूद इसके बेहद सामान्य तरीके से रहते थे। मां बचपन में जो मुझे नाटक कराती थीं, उसका मकसद भी यही था कि हम लोग ‘बिजी’ रहें। शायद उनका अपना शौक भी पूरा होता रहा होगा। पिताजी अंग्रेजी पढ़ाते थे और बचपन में मुझे काफी कहानियां सुनाते थे। उन्होंने शेक्सपीयर से लेकर शर्लक होम्स की कई कहानियां सुनाई हैं। उस वक्त मेरी उम्र छह-सात साल से ज्यादा की नहीं रही होगी। वह बाकायदा इन कहानियों और  उनके किरदारों के बारे में हमें अनुवाद करके बताया करते थे। साथ में छोटा सा किचन था हमारा, उसमें पकौड़े भी बन रहे होते और साथ-साथ कहानियां भी चल रही होती थीं। उस वक्त तो इन बातों का एहसास नहीं था, मगर आज समझ आता है कि बचपन में जो घर का माहौल था, उसने हमें जिंदगी जीने का सलीका सिखाया। जिंदगी की जड़ों को हमेशा जमीन में गड़े रहने देने का पाठ दिया। 

यूं तो मैं बचपन में भी शरारती नहीं था। मतलब शरारत की भी तो पतंगबाजी की। उसके अलावा मुझे याद नहीं आता कि मेरी कोई ऐसी बदमाशी रही हो। एक बार हम घर पर बताए बिना मांझा सुतवाने चले गए थे। ऐसा हमने पहले भी किया था, मगर उस रोज घर में हमारी खोज मची होगी। जब हम मांझा सुतवाकर लौटे, तो हमारी भी सुताई हुई। उस समय हालत ऐसी थी कि पिताजी का देख लेना भर हमारे लिए काफी होता था, पर उस दिन डांट तो पिटी ही, एकाध चपाट भी पड़ गई। बाकी की बदमाशियां करने का मुझे मौका ही नहीं मिला। मार-पिटाई जैसे काम मैंने कभी नहीं किए। मैं नहीं कहता कि मुझे उस बात का कोई अफसोस है। हां, मुझे खेलने का बहुत शौक था। मैं खेलता बहुत था। पतंगबाजी के अलावा बैडमिंटन खेलता था। दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलने जाता था। मैं बहुत अच्छा स्टूडेंट नहीं था। मुझे याद है कि बावजूद इसके मेरे स्कूल के हेडमास्टर मुझे पसंद करते थे। मैं बचपन से ही नाटक करता था, डिबेट में जाता था। इसलिए उन्हें लगता कि यह लड़का जरूर कुछ बनेगा। उनके उस विश्वास ने मुझे बड़ी हिम्मत दी। हिंदी के एक टीचर थे कपूर साहब। उन्होंने हिंदी की ‘डिबेट’ तैयार करने में मेरी बहुत मदद की। इनके अलावा, सचदेवा सर थे, जो ड्रामा तैयार कराते थे। उनका भी मेरे आगे बढ़ने में बड़ा योगदान रहा। 

मुझे याद नहीं कि किसी टीचर ने मुझे इसलिए ‘एक्सट्रा’ नंबर दिए हों कि मैं थिएटर करता था या ‘डिबेट’ में ‘पार्टिसिपेट’ करता था। मुझे इसकी जरूरत भी नहीं पड़ी, क्योंकि इम्तिहान में पास हो जाने भर का सिलसिला मेरा था। अलबत्ता, नाटक, डिबेट जैसी गतिविधियों में भाग लेने की वजह से एक-दो टीचर मेरे प्रति मेहरबान रहते थे। वे हमेशा मेरा उत्साह बढ़ाते कि अगर यह बच्चा इन गतिविधियों में ‘एक्टिव’ है, तो उसे करने दिया जाए। किसी ने कभी इस बात को लेकर नहीं टोका कि पढ़ाई कर लो, आगे पढ़ाई ही काम आएगी, ये नाटक-वाटक से कुछ हासिल नहीं होगा। न स्कूल में ऐसी टोका-टाकी हुई, न ही कॉलेज में। वजह यह भी हो सकती है कि सबको पता था कि मेरे पिता खुद टीचर हैं। शायद उन्हेंलगता रहा हो कि जब पिताजी नहीं टोकते, तो फिर वे मुझे क्यों टोकें? 

(जारी...)

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  • Web Title:meri kahani hindustan column on 8 july