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मेरे लिए ही लिखी गईं सारी स्क्रिप्ट 

हेमा मालिनी

हम किसी भी अन्य सामान्य परिवार की तरह ही थे। जैसे उन दिनों किसी भी पिता को बेटियों का फिल्मों में काम करना अच्छा नहीं लगता था, उसी तरह मेरा फिल्मों में आना पापा को अच्छा नहीं लगा था। हालांकि परिवार में अन्य किसी सदस्य को इस पर परेशानी नहीं थी, लेकिन पिता असहज थे। वह कहते थे कि लड़की फिल्मों में जा रही है, पता नहीं क्या होगा? लेकिन उनके दिए संस्कारों से मैंने यह साबित किया कि फिल्म इंडस्ट्री इतनी अच्छी है कि अगर हम अच्छे रहेंगे,  तो कोई हमारा नुकसान नहीं कर सकता। मैं शूटिंग पर मम्मी-डैडी के साथ जाती थी। इसलिए नहीं कि मुझे कोई डर था, बल्कि इसलिए कि मैं हमेशा उनकी उम्मीदों पर खरा उतरना चाहती थी।  
आजकल देश के विभिन्न हिस्सों से बहुत सारी लड़कियां घरवालों को बिना कोई जानकारी दिए मुंबई पहुंच जाती हैं और कहती हैं कि वे फिल्मों में काम करने आई हैं। यह देखकर मुझे बड़ा दुख होता है। मैं आश्चर्यचकित होती हूं। उनसे पूछती हूं कि ऐसे कैसे आ गईं, किसके साथ आ गईं? वे अक्सर कहती हैं कि अकेले ही आई हूं। पूछती हूं कि अपने मम्मी-डैडी को नहीं बताया, तो बोलती हैं कि नहीं बोला। सोचती हूं कि यह क्या हो गया है इन लड़कियों को, जो घर छोड़कर अकेले मुंबई तक आ गईं? क्या होगा इनका? ऐसी लड़कियों को वापस घर पहुंचाने के लिए जब कहती हूं कि पुलिस बुला रही हूं, वह आपको घर छोड़कर आएगी, तो लड़कियां पुलिस के नाम से डर जाती हैं। फिल्मों का ऐसा जुनून चढ़ा होता है उन पर। मैं पूछती हूं कि कैसे उनमें हिम्मत हुई कि वे यहां आकर फिल्म स्टार बन जाएंगी? मुझे देखकर या मेरे जैसे कई अन्य आर्टिस्टों को देखकर उन्हें लगता है कि वे भी ऐसी बन जाएंगी। इसीलिए मैं सलाह देती हूं कि किसी को साथ लेकर आओ। तुम्हारी भी सिक्योरिटी रहे, तुम्हें प्रोटेक्ट 
करें। इसके अलावा अपनी क्षमताओं को पहचानें। माता-पिता भी इसमें मदद करें। पता नहीं, कितनी लड़कियों ने मेरी बात मानी और वापस घर लौट गईं? लड़के भी इसी तरह आते हैं, लेकिन लड़कियां ज्यादा आती हैं, यह बात सोचने वाली है।
अगर किसी को फिल्म लाइन में आना है, तो वह इस बारे में पूरी जानकारी कर ले। यह जान ले कि इस लाइन में आने के लिए कितनी मेहनत चाहिए? सुबह-शाम काम करना पड़ता है। हम फिल्म कलाकारों की बहुत ही टफ लाइफ है। हमने जो डेट दिया, तो सुबह मेकअप करके रेडी रहते हैं। इसके बाद प्रोड्यूसर हमें सीन बाई सीन देता है। पहला सीन किया, दूसरा सीन किया, तो जाकर आराम नहीं करना है। जाकर डायलॉग याद करो। मेकअप रूम सोने के लिए नहीं हैं, खाने-पीने और मजा करने के लिए भी नहीं। डायलॉग याद करके आओ, क्योंकि चार-पांच और आर्टिस्ट हैं। उनके सामने आपको परफॉर्म करना है। चलो शॉट हो गया, काम खत्म। नहीं, आज नाइट शिफ्ट होगी। नाइट शूटिंग में भी हम वेट कर रहे हैं, मेकअप रूम में बैठे हैं। अब जब हमारा शॉट रेडी होगा, तभी वह बुलाएगा। भले ही वह रात के तीन बजे के बाद हो। अगर सीन नाइट में ही लिया जाएगा, तो हमें नाइट में काम करना है। हम यह नहीं बोल सकते कि हम इस समय नहीं करेंगे। हम यह नहीं कह सकते कि हमें सोना है। बाहर बहुत ठंड है, कैसे करेंगे, पर करते हैं। यह काम के प्रति समर्पण होता है। केवल एक आर्टिस्ट नहीं, सभी आर्टिस्ट समर्पित भाव से कार्य करते हैं। 
फिल्म रिलीज होने के बाद जब बाहर आते हैं और कोई फिल्म के बारे में गलत कमेंट करता है, तो बड़ा दुख होता है। अच्छे और बुरे, दोनों रिएक्शन आते हैं। लेकिन हमारे अंदर सबको सहने की शक्ति होनी चाहिए। इससे हमें सीख मिलती है। जब कोई तारीफ करता है और कहता है कि वाह, क्या काम किया है, तो हवा में नहीं उड़ना चाहिए। अपने आपको जमीन पर टिकाए रखना पड़ता है। सबको समझते हुए आपको आगे बढ़ना है। यही एक आर्टिस्ट की पहचान है। फिल्म लाइन में मुझे कभी परेशानी नहीं हुई। बहुत अच्छे लोग हैं। इज्जत करते हैं। यह इज्जत हम कैसे बनाए रख सकते हैं, यह आप पर निर्भर करता है।  
मैंने जितनी भी फिल्में कीं, जितने भी रोल किए, सभी की स्क्रिप्ट मुझे देखकर ही बनाई गई। ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी रोल को कोई और करने वाला था और मुझे मिल गया। सीता और गीता, शोले, सत्ते पर सत्ता, एक चादर मैली सी  मुझे पसंद है। लाल पत्थर  भी मुझे बहुत पसंद है, भले ही वह उस समय हिट नहीं हुई। किनारा, खुशबू, धर्मात्मा, रमेश सिप्पी के साथ अंदाज  मुझे बहुत पसंद हैं।
            (जारी...)

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  • Web Title:meri kahani hindustan column on 6 january