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शाहिद को भी बिन मांगे सलाह नहीं

पंकज कपूर फिल्म अभिनेता

शाहिद कपूर मेरे पुत्र हैं, इसलिए ‘एक्टिंग’ को लेकर घर पर उनसे थोड़ी-बहुत बातचीत होती ही रहती थी। मुझे ठीक से याद नहीं कि तब तक उनका करियर शुरू हो चुका था या होने वाला था, तभी उन्होंने मुझसे इसरार किया था कि मैं उनके लिए एक वर्कशॉप करूं। लिहाजा बहुत छोटे से ‘लेवल’ पर सामान्य सी एक वर्कशॉप मैंने की, जिसमें 10-12 लड़के-लड़कियां थे, जिनका हिस्सा शाहिद भी थे। वह एक हफ्ते भर का ‘बेसिक लेवल’ का काम उन्होंने मेरे साथ किया था। मेरे मशविरे पर वह नसीर साहब के साथ कुछ समय के लिए जुड़े। ये सब उनकी बुनियादी तैयारी का हिस्सा था। औपचारिक तौर पर तो शाहिद ने मेरे साथ सिर्फ एक हफ्ते काम किया है। हां, अनौपचारिक तौर पर एक ही परिवार है, तो अगर उनका कोई सवाल होगा, तो उसका जवाब दिया ही जाएगा। आज उन्हें भी फिल्म इंडस्ट्री में काफी समय हो गया है, लेकिन हमारे बीच ‘जनरल’ बातचीत होती है। फिल्मों को लेकर उनके फैसले पूरी तरह उन्हीं के लिए हुए होते हैं। मेरे तीन बच्चे हैं और तीनों को मैंने जो तालीम दी है, वह यही दी है कि वे जीवन में जो कुछ भी करना चाह रहे हैं, उसके लिए जिम्मेदारी भी महसूस करें। काम अच्छा हो, तो ‘क्रेडिट’ तुम्हारे खाते में जाए, बुरा हो तो यह एहसास रहे कि मुझसे गलती हो गई। यही तालीम मेरे पिताजी ने मुझे दी थी। 
मैंने शाहिद के साथ फिल्म की थी मौसम। मौसम  मेरी बहुत चहेती फिल्म है। हां, उस फिल्म में कुछ गलतियां हुई हैं। आज जब मैं उस फिल्म को बतौर डायरेक्टर देखता हूं, तो मुझे लगता है कि कुछ जगहों पर सुधार हो सकता था। बावजूद इसके वह मेरे दिल के बहुत करीब की फिल्म है। उस फिल्म को सोचने से लेकर ‘एग्जीक्यूट’ करने तक में चार साल का वक्त लगा था। वह चार साल का सफर कई जगहों पर बड़ा सुखदाई था और कई जगहों पर बड़ा तकलीफदेह। मगर यही ‘क्रिएटिविटी’ की एक ‘प्रॉसेस’ है। जिस तरह से मां एक बच्चे को जन्म देती है, तो उसका आनंद और उसकी तकलीफ, दोनों होती है। वही आनंद और तकलीफें उस फिल्म को बनाने में भी थीं। इन सब चीजों से गुजरने का हिस्सा ही फिल्म मेकिंग है। जब आप अभिनय भी करते हैं, किसी डायरेक्टर के साथ काम करते हैं, किसी प्रोड्यूसर के साथ काम करते हैं, को-एक्टर के साथ काम करते हैं, तो अभिनय भी एक प्रॉसेस ही होता है। हर चीज जैसी आप चाहते हैं, वैसी होती नहीं और चीजें जैसी होती हैं, उन्हीं के बीच से निकालकर आपको अपना काम करना होता है। मौसम  भी एक ऐसा ही तजुर्बा दे गई। अगर उसे बनाने में मुझे थोड़ा समय और मिल गया होता, तो मैं दर्शकों के लिए और बेहतर फिल्म निकालकर ला सकता था। 
मौसम  को बनाना मुश्किल इसलिए भी था, क्योंकि तीन-चार साल तक मैंने अभिनय नहीं किया, जबकि अभिनय मेरा पहला प्यार है। तीन-चार साल तक सब कुछ छोड़कर मैंने फिल्म निर्देशक का काम किया। उस दौरान अभिनय न कर पाने का एक खालीपन भी था। उस फिल्म की रिलीज को लेकर भी कुछ समस्याएं थीं। मौसम  के प्रचार और प्रिंट्स को लेकर भी कुछ बात थी, फिर कुछ प्रोड्यूसर्स का फैसला था कि फिल्म कब रिलीज होनी चाहिए, मैं सिर्फ फिल्म का डायरेक्टर था, इसलिए उन बातों पर मेरा कोई कंट्रोल नहीं था। फिल्म का ‘क्रिएटिव प्रॉसेस’ मेरा था, कारोबारी दूसरों का। मौसम  के अलावा भी लोग मुझसे अक्सर पूछते हैं कि क्या मैंने कोई ऐसा रोल भी किया, जिसको लेकर मुझे पछतावा हुआ हो? इस सवाल का जवाब देना मैं ठीक नहीं समझता। इक्का-दुक्का रोल ऐसे हो सकते हैं, मगर मैं कह नहीं सकता, क्योंकि अगर मैं कहूंगा, तो जिन लोगों के साथ मैंने काम किया था, उन्हें अच्छा नहीं लगेगा। इसलिए मैं किसी ऐसे काम का जिक्र नहीं करता, जो मैंने किसी ‘सिचुएशन’ में किसी मजबूरी के तहत कर दिया। मैं उन सभी लोगों का सम्मान करता हूं, जिनके साथ मैंने वह काम किया था। इसी का नाम जिंदगी है। आप जिंदगी में जब काम करने निकलते हैं, तो सब कुछ वैसा नहीं हो जाता, जैसा आप चाहते हैं। इन सारी बातों के बाद मैं यही दोहराऊंगा कि मौसम  मेरे दिल के बहुत करीब थी। 
फिल्मी दुनिया से अलग आजकल मेरे ‘ग्रैंड चिल्ड्रेन’ मेरे दिल के करीब हैं। वैसे यह बड़ी सामान्य सी बात है। यह तो परमात्मा ने एक सिलसिला बनाया है। पुरानी कहावत है कि मूल से ब्याज प्यारा होता है। आपका जो ‘ग्रैंड चाइल्ड’ होता है, वह बहुत ही अलग चीज होता है। उसको बयान नहीं किया जा सकता है, सिर्फ महसूस किया जा सकता है। आजकल मैं यह महसूस कर रहा हूं।

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  • Web Title:meri kahani hindustan column on 4 august