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मेरी परेशानी और फिल्म की कहानी

मैरीकॉम

मैरीकॉम  फिल्म में दिखाया गया था कि मैं विदेश गई हूं और मेरे पति ने मुझे फोन पर मेरे बेटे की सर्जरी के बारे में बताया। मैं रोती हूं और फिर रोने के बार्द ंरग में उतरती हूं। जबकि सच्चाई यह है कि मेरे विदेश जाने से पहले ही मुझे अपने बेटे की ‘प्रॉब्लम’ पता चल गई थी। इम्फाल में उसके सारे टेस्ट और इन्वेस्टिगेशन हो गए थे। वहां सुविधाएं पूरी नहीं थीं, तो बच्चे को लेकर बाहर गए। मैं पटियाला में थी। मैंने छोड़ दिया। मैंने सोच लिया कि अब मैं कॉम्पिटिशन में नहीं जाऊंगी। मुझे लगा कि खेल ज्यादा अहम नहीं, बल्कि मेरा बेटा ज्यादा अहम है। लेकिन जब पति को यह बात मैंने कही, तो वह कहने लगे कि जब देश की तरफ से चुनी गई हो, तो खेलने जाना ही पड़ेगा। उन्होंने यह भी कहा कि बच्चे की देखभाल तो वह करते ही हैं, आगे भी करेंगे। तुम जाओ और जीतकर आओ। मैं यहां सारी देखभाल कर लूंगा। इन सारी बातों के बाद भी मैं मानने को तैयार नहीं थी। मेरा दिल नहीं मान रहा था कि मैं अपने बच्चे को छोड़कर चली जाऊं। मुझे लग रहा था कि कॉम्पिटिशन तो जीवन में आगे भी खेल लूंगी। जब तक मेरा जीवन है, तब तक कभी भी मैं खेल सकती हूं। इस मुश्किल वक्त में मैं अपने बेटे के साथ रहना चाहती थी। इस बात को लेकर मेरा अपने पति से झगड़ा भी हुआ। 

डॉक्टरों ने काफी इन्वेस्टिगेशन किए थे। सर्जरी की तारीख तय नहीं थी। इसी वजह से मैंने अपना दिमाग बदला। मुझे लगा कि अभी सर्जरी की तारीख तय नहीं है। ऐसे में, मैं अगर नहीं जाती हूं तो मुझे इम्बैरेसमेंट भी होगा। आखिरी मिनट में टीम कैसे बनेगी? यही सब सोचकर मैं चली गई। उस समय मेरी मानसिक हालत अच्छी नहीं थी। मेरी तैयारी भी अच्छी नहीं चल रही थी। मैं वहां से लगातार अपने पति के साथ संपर्क में थी। लगातार बेटे के बारे में पूछती रहती थी। वह भी मुझे सब बताते रहते थे। कॉम्पिटिशन खत्म हो गया, मैंने गोल्ड मेडल भी जीत लिया, लेकिन सर्जरी की तारीख तय नहीं हो पाई। मैं वापस भारत आ गई। जब मेरा जहाज लैंड किया, तो मैंने अपने पति को फोन किया। उस समय ही उन्होंने बताया कि डॉक्टरों ने अगले दिन सर्जरी की डेट दी है। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं एयरपोर्ट से सीधे चंडीगढ़ चली आऊं। मैंने यही किया। असली कहानी यह है, जबकि मैरीकॉम  फिल्म में इस कहानी को अलग तरीके से दिखाया गया है। फिल्म में दिखाया गया है कि मैं कॉम्पिटीशन के लिए चली गई हूं और वहां मुझे मेरे बेटे के बारे में पता चलता है। निश्चित तौर पर डायरेक्टर ने कहानी को और इमोशनल बनाने के लिए यह बदलाव किया होगा। जब मैंने फिल्म में वह सीन देखा, तो मेरे दिमाग में सारी बातें ताजा हो गईं। मैं अपने आप को रोक नहीं पाई और रोने लगी। वह बहुत दर्दनाक था। एक मां होने के नाते मेरे लिए वह बहुत कठिन समय था। वह सीन दोबारा देखूंगी, तो फिर से रोने लगूंगी। खैर, फिल्म बहुत हिट हुई। लोगों ने बहुत तारीफ की। फिल्म की वजह से मुझे वे लोग भी जान गए, जिनकी खेलों में दिलचस्पी नहीं है। फिल्म को बहुत सारे इनाम भी मिले, जिसमें नेशनल अवॉर्ड भी शामिल है। मेरे जानने वाले बहुत से लोगों ने फिल्म देखी और फोन करके मुझे बधाई दी। मेरे लिए उन बातों पर भरोसा करना वाकई मुश्किल है।  

मेरा बेटा प्रिंस 2014 में बहुत छोटा था। तब भी मेरा ज्यादा समय ट्रेनिंग में बीत रहा था। 2014 में मुझे एशियन गेम्स में हिस्सा लेना था। मैंने वहां गोल्ड मेडल जीता। 2016 में मैं ओलंपिक्स में खेलना चाहती थी, लेकिन मैं क्वालीफाई नहीं कर पाई। मुझे बड़ा अफसोस भी हुआ। बीच में थोड़ा ब्रेक भी लगा। अब मेरी जिंदगी वापस बॉक्सिंर्ग ंरग में लौट आई है। पति का ‘सपोर्ट’ मुझे बहुत प्रेरित करता है। पिछले साल मैंने फिर से वल्र्ड चैंपियनशिप जीती। अब मेरे पास छह वल्र्ड चैंपियनशिप गोल्ड हैं। पिछले साल मुझे महसूस हुआ कि हाल के दिनों में बहुत अच्छे बॉक्सर्र्स ंरग में आए हैं। वे क्विक हैं। स्मार्ट हैं। लेकिन मेरे पास जो अनुभव है, वह मुझे फायदा पहुंचाता है। मैं जानती हूं कि मुर्झे ंरग के अंदर हालात को कैसे काबू में करना है? इसलिए मैं उनसे ज्यादा स्मार्ट हूं। इसीलिए अब भी जीत रही हूं। अब मेरा फिर से टारगेट है कि अपना ओलंपिक गोल्ड मेडल जीतने का सपना 2020 में पूरा करूं। इस साल से मैं फिर से 51 किलो की कैटेगरी में अपनी तैयारी शुरू कर रही हूं। पिछले दिनों इसी ट्रेनिंग के लिए मैं जर्मनी भी गई थी। जहां मैंने 10 दिन की ट्रेनिंग की। मैं अपने प्रैक्टिस सेशन में बहुत मेहनत कर रही हूं। मेरी तरफ से तो मैं एक बार फिर पूरी कोशिश करूंगी कि गोल्ड मेडल जीतूं। फिलहाल पहली चुनौती है कि मैं 2020 ओलंपिक्स के लिए क्वालीफाई करूं, जिसके बाद फिर जबर्दस्त मेहनत करनी होगी। 

(जारी...)

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  • Web Title:meri kahani hindustan column on 31 march