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पांच साल की उम्र में गाया था सबद 

दलेर मेहंदी प्रसिद्ध पंजाबी गायक

मैं खुद को खुशनसीब मानता हूं कि मेरा जन्म रागियों के परिवार में हुआ, जहां के लोग कई पीढ़ियों से गाना गाते चले आ रहे थे। मेरे नाना की तरफ से तो पिछली 18 पीढ़ियां संगीत से जुड़ी हुई हैं। मेरे नाना के पिताजी का नाम था मौला। उनके  नाम से जालंधर में एक कस्बा है- उसका नाम है रुड़की। वह इतना अच्छा गाते थे, इतने मशहूर थे कि उनके नाम से लोग उस गांव को पुकारते थे ‘मौले दी रुड़की।’ आज भी उस गांव के लोग उन्हें याद करते हैं। ऐसे ही, एक और गांव है बैनापुर, जो नूरमहल के पास है। वहां के सब लोग हमारे नाना को जानते थे। हमारी नानी के पिता से भी उनके गांव की पहचान थी। हमारे परिवार के एक बुजुर्ग छठे सिख गुरु हरगोविंद साहिब की फौज में भी थे। फौज के बाकी काम के साथ-साथ वह गाते भी बहुत अच्छा थे। मैं किसी भी तरफ से बात करूं, चाहे अपने दादा की तरफ से या नाना की तरफ से, हर तरफ संगीत ही संगीत था। खालिस संगीत, जिसमें आजकल की तरह नहीं, बल्कि राग, गाथाएं, वीरगाथाएं और धार्मिक बातें होती थीं। कबीर जी की बात हो रही है। गुरु नानक की बात हो रही है। वे अच्छे सुर और अच्छे बोल वाले संगीत थे। मेरी दादी के पिता भी बहुत अच्छा गाना गाते थे। वह तो अच्छी एक्टिंग भी करते थे। लिहाजा संगीत हमारे खून में है। मैं ऊपर वाले का बहुत शुक्रगुजार हूं कि मुझे बचपन से अच्छे बोल वाला संगीत सुनने को मिला। 
मैंने सुना है कि बंटवारे के पहले परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी। आदमपुर के मुकुंदपुर गांव में हमारे एक बुजुर्ग रहा करते थे। हमने किस्से सुने हैं कि उनके घर में बेशुमार पैसा था, वह भी गायकी की बदौलत। घरवाले  बताया करते थे कि एक बार किसी बात पर कुछ ठन गई। इसके बाद उन्होंने खेतों में जो क्यारियां बनाई जाती हैं पानी छोड़ने के लिए, वैसी ही साफ क्यारियां बनवाईं और उसमें एक पाइप लगाकर गांव के दूसरे घर तक देसी घी भेजा। यह उनकी जिद थी कि मैं अपने घर से तुम्हारे घर के लिए घी भेजूंगा। कहते हैं कि वह बहुत ही कमाल का गाते थे। उनके बेटे हुए भुक्कल शाह, उन्हीं के बेटे हुए लालू शाह, जिसमें हमारे परदादा की पीढ़ी आती है। ऐसे ही भाई शेरू, जो मेरी नानी के पिता थे। उनके बारे में कहते हैं कि जब वह गाना गाकर आते थे, तो उनके यहां पैसे गिने नहीं जाते थे, बल्कि तराजू पर तौले जाते थे। उस जमाने में उनके घर में चौबारा बना हुआ था। तब ‘डबल स्टोरी’ घर होना, बड़े-बड़े दरवाजे होना, बहुत बड़ी बात होती थी। पर ये सारी कहानी 1947 के पहले की है। बंटवारे के बाद हमारे दादा और पिताजी को रुपये-पैसे की किल्लतों का सामना भी करना पड़ा। पर गुरु की कृपा थी, हमें बहुत ज्यादा दिक्कत नहीं हुई। कभी भूखे पेट नहीं सोना पड़ा। मैं भी हमेशा से यही मानता हूं कि जो गुरु के गीत गाते हैं, उन्हें कभी गरीबी नहीं देखनी पड़ती। उनका खान-पान, सब बहुत अच्छा रहता है।  
मैं करीब पांच साल का था, तभी पिताजी ने सबद सिखाने शुरू कर दिए थे। उन्होंने मुझे उसी उम्र में तीन सबद सिखाए और साथ के साथ लोगों के सामने गवा भी दिए। ऐसी ही ट्रेनिंग उन्होंने परिवार के बाकी बच्चों को भी दी थी। किसी ने गाना सीखा, तो किसी ने तबला बजाना। इस बात के लिए मैं अपने माता-पिता का शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने हमें बाहर के गुरुओं से भी संगीत सीखने का मौका दिया। उस उम्र में भी घर में अलग से म्यूजिक की क्लास होती थी। मैंने संगीत को लेकर पिताजी को शिकायत का कोई मौका नहीं दिया। इसीलिए उन्होंने कभी कोई फटकार नहीं लगाई। मेरे पिता उस्ताद अजमेर सिंह खुद एक मंजे हुए कलाकार थे। उन्होंने शास्त्रीय संगीत में प्रभाकर किया था। हमारे बुजुर्गों में खास बात यह रही कि उन्हें सिर्फ ‘प्रैक्टिकल’ यानी सिर्फ गायकी की जानकारी नहीं थी, बल्कि उसका जो ‘थ्योरी’ पार्ट होता है, वह भी उन्हें बहुत अच्छी तरह आता था। क्या राग है, उसे किस समय पर गाते हैं, ये सारी जानकारियां हमारे बुजुर्गों को अच्छी तरह मालूम थीं। मेरे पिताजी ने भी इन बातों को अच्छी तरह से पढ़ा था। वह पंजाब के गुरुद्वारा आनंदपुर साहिब में कीर्तन किया करते थे। 1960 के आसपास उन्होंने वहां ज्वॉइन किया था, जहां गुरु गोविंद सिंह ने सिख धर्म की स्थापना की और खालसा पंथ बनाया। वहां से उन्हें फतेहगढ़ साहिब जाने का मौका मिला। वहां उन्होंने एक साल तक गायन किया। एक तख्त से दूसरे तख्त पर रागियों को भेजा जाता था। इसी तरह, उन्हें फिर पटना साहिब भेजा गया। और फिर हमारा परिवार पंजाब से बिहार पहुंच गया।
            (जारी...)

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  • Web Title:meri kahani hindustan column on 3 february