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फिल्मों का दौर और नेशनल अवॉर्ड

पंकज कपूर फिल्म अभिनेता

साल 1989 में मुझे पहली बार नेशनल अवॉर्ड मिला था। बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का वह अवॉर्ड मुझे राख  के लिए मिला था। उस फिल्म में मैंने इंस्पेक्टर का रोल किया था। कयामत से कयामत तक  के बाद वह आमिर खान की पहली फिल्म थी, जिसे आदित्य भट्टाचार्य ने डायरेक्ट किया था। इस रोल के लिए मुझे फिल्म फेयर अवॉर्ड में भी ‘नॉमिनेट’ किया गया था। उस अवॉर्ड ने मेरे अंदर एक नया विश्वास पैदा किया। किसी के काम को किसी भी स्तर पर सराहा जाए, तो उसे लगता है कि चलो, मैं जो काम कर रहा हूं, उसमें पहचान मिल रही है। समझदार लोग अगर आपको रिकॉग्नाइज करते हैं, तो लगता है कि काम सही दिशा में है। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। उस दौरान मुझे ऐसे रोल ज्यादा ऑफर किए जा रहे थे, जो मुझे पसंद नहीं थे। मैं उन अभिनेताओं की सराहना करता हूं, जो बिना स्क्रिप्ट पढ़े सेट पर चले जाते हैं और उन्हें जो कहा जाता है, वह फौरन करके दिखा देते हैं, पर मैं ऐसा नहीं कर पाता था। मुझमें यह काबिलियत नहीं थी। 
जब नेशनल अवॉर्ड की घोषणा हुई, तब मुझे इसके मिलने की जानकारी ही नहीं थी। पंजाब में एक जगह है ब्यास, वहां मेरे गुरुजी रहते हैं। रिटायर होने के बाद उस जमाने में मेरे पिताजी भी वहीं रहते थे। मैं उन दिनों वहीं गया हुआ था। सामान्य तौर पर जैसे सुबह के वक्त लोग अखबार पढ़ते हैं, तो मैंने भी एक रोज अखबार उठाया। अखबार में सुर्खियां थीं, ‘नेशनल अवॉड्र्स अनाउन्स्ड’। मैं भी फिल्म से ताल्लुक रखता हूं, तो मुझे लगा कि पढ़ना चाहिए। उस खबर को पढ़ते-पढ़ते उसमें मुझे अपना नाम दिखाई दिया, वह एक अद्भुत किस्म की फीलिंग थी। मेरे तो ख्वाबों में भी नहीं था कि इस तरह का कुछ हो जाएगा। उस नेशनल अवॉर्ड पर मुझसे ज्यादा खुशी शायद मेरे पिता को हुई थी। आस-पड़ोस के लोगों को हुई। लेकिन मुझे भी उस अवॉर्ड से प्रोत्साहन मिला। 
इसके अगले ही साल फिल्म आई एक डॉक्टर की मौत। उस फिल्म को तपन सिन्हा ने डायरेक्ट किया था। उसमें मैंने डॉक्टर दीपांकर रॉय का किरदार निभाया था, जिसे लोगों ने बहुत पसंद किया। नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन की बनाई उस फिल्म के लिए मुझे नेशनल ज्यूरी का नेशनल अवॉर्ड दिया गया। इसके बाद तीसरा नेशनल अवॉर्ड मुझे विशाल भारद्वाज की मकबूल के लिए मिला। मकबूल सब लोग जानते ही हैैं कि विलियम शेक्सपीयर के नाटक मैकबेथ  पर आधारित थी। मकबूल  से पहले विशाल भारद्वाज टेलीविजन के लिए कुछ काम  कर रहे थे। उन्होंने बच्चों को लेकर भी एक फिल्म बनाई थी। यह उनकी अच्छाई है कि उन्होंने उन फिल्मों के लिए भी मुझसे संपर्क किया था। इसी तरह, उन्होंने मुझे मकबूल  के लिए भी एक रोल ऑफर किया, जो अब्बाजी का रोल नहीं था। जो काका का रोल था, उन्होंने मुझे उसकी स्क्रिप्ट दी थी। मैं उस समय एक फिल्म की शूटिंग के लिए न्यूजीलैंड जा रहा था। मैंने जाने से पहले विशाल भारद्वाज से कहा कि मैं स्क्रिप्ट साथ ले जाता हूं और वहीं पर उसे पढ़ूंगा। लेकिन मैं वहीं पर था, जब उन्होंने मुझे फोन करके कहा कि मैं काका का नहीं, बल्कि अब्बाजी का रोल पढ़ूं। यह रोल शायद पहले नसीर साहब करने वाले थे। यह शायद नसीर साहब का ही मशविरा था कि वह दूसरा रोल करेंगे और अब्बाजी वाला रोल मुझे ऑफर किया जाए। काका का रोल बाद में पीयूष मिश्रा ने किया। 
उस स्क्रिप्ट को महीना भर पढ़ने के बाद मैंने विशाल से मीटिंग की। इसके बाद स्क्रिप्ट को लेकर तीन-चार मीटिंग और हुई। फिल्म में मेरे कैरेक्टर को लेकर भी बातचीत हुई। इसे लेकर कई बातें मेरे मन में थीं, जिनके बारे में उनसे बातचीत हुई। उनके साथ इस फिल्म के लेखक अब्बास टायरवाला भी थे। दोनों ने मिलकर फिल्म का स्क्रीन प्ले लिखा था। सारे पहलुओं पर चर्चा के बाद मेरे, विशाल और अब्बास, तीनों के बीच एक सहमति सी बनी, तो इस तरह मकबूल  में मेरी ‘एंट्री’ का सिलसिला हुआ। उस फिल्म में मेरे साथ इरफान भी थे। इरफान और मैंने पहले भी साथ में काम किया है। वह बहुत अच्छे अभिनेता हैैं। अच्छे अभिनेता होने के साथ-साथ उन्होंने अपने करियर को काफी सोच-समझ और सूझ-बूझ के साथ ‘डिजाइन’ किया है। जिस तरह की फिल्मों का उन्होंने चयन किया है या जिस तरह के बाकी काम भी उन्होंने किए हैं, उससे ये बात साबित होती है। आज जिस दौर से वह गुजर रहे हैं, उसमें मेरी तमाम शुभकामनाएं उनके साथ हैं। मैं समझता हूं कि इस मुश्किल वक्त से वह जरूर बाहर आएंगे।
जारी...

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  • Web Title:meri kahani hindustan column on 29 july