DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

मेरे तो गिरधर गोपाल

हेमा मालिनी

साल 1999 में आम चुनाव के दौरान पंजाब की गुरदासपुर लोकसभा सीट से उम्मीदवार और फिल्म अभिनेता विनोद खन्ना के लिए प्रचार किया। तब राजनीति को काफी करीब से देखा। इसके पहले मैं सिर्फ अभिनेत्री थी। लोगों से जुड़ने का जरिया सिर्फ सिनेमा था। राजनीति में आई, तब देश को, यहां के लोगों को करीब से जानने का मौका मिला। तब मैंने समाज सेवा की अहमियत समझी। इसके बाद मेरा राजनीतिक सफर शुरू हुआ। मैं फरवरी 2004 में आधिकारिक तौर पर भाजपा में शामिल हुई। वर्ष 2009 तक राज्यसभा की सदस्य रही। इस दौरान कई खट्टे-मीठे अनुभव हुए। काफी कुछ सीखने का मौका मिला। वर्ष 2010 में भाजपा की महासचिव बनाई गई। पार्टी ने 2014 में मुझे मथुरा संसदीय क्षेत्र से लोकसभा का टिकट दिया। यह मेरी दिली इच्छा थी कि अगर पार्टी चुनाव लड़ाए, तो मुझे मथुरा से टिकट मिले। मथुरा मेरे आराध्य श्रीकृष्ण की जन्मस्थली है। गिरधर गोपाल की मैं हमेशा से पूजा करती हूं। मुझे ब्रज से प्रेम है। मथुरा की सांसद के तौर पर काम करके मुझे काफी अच्छा लगा। खैर, धीरे-धीरे राजनीति की राह आसान होती गई।  
जब मैं राजनीति में आई, तो शुरुआत में मुझे कैंपेन करने को कहा गया। इधर जाओ, उधर जाओ। वहां सभा करो। शुरुआत में राजनीतिक शोरशराबा देखकर मैं हक्की-बक्की रह गई। लगा, कहां फिल्मी दुनिया और फिर अचानक राजनीति! कहां तो मेरी एक झलक देखने को लोग घंटों इंतजार करते हैं, पर राजनीति में लाखों लोगों के सामने मुझे भाषण देने को कह दिया गया। शुरू-शुरू में मुझे भाषण देना नहीं आता था। मैं सोचती थी कि क्या कहूं, क्या बोलूं? दोनों दुनिया एकदम उलट थी। लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी। मैंने सोचा कि मुझे देखने लोग आते हैं। देखकर खुश होते हैं। एक स्टार को देखकर अच्छा लगता है उनको, उनकी आंखों में मैं वह खुशी महसूस कर सकती हूं। यह प्यार, मान-सम्मान कहां मिलेगा? 
पब्लिक से मिलना, जो जरूरतमंद हैं, उनकी तकलीफें क्या हैं, यह मुझे सांसद बनने के बाद समझने को मिला। राज्यसभा में ज्यादा पब्लिक टच नहीं था, लेकिन  लोकसभा के लिए चुने जाने के बाद लोगों की समस्या को देखने-समझने का करीब से मौका मिला। गांव-देहात के भारत को मैंने समझा। जब भी मथुरा में रहती हूं, एक जगह नहीं बैठती। गांवों में जाकर लोगों से मिलती हूं। उनकी पीड़ा समझती हूं। उसे दूर करने की कोशिश करती हूं।  मैं यहां के लिए बहुत कुछ करना चाहती हूं। मथुरा को अच्छा बनाने के प्रयास कर रही हूं। जितना संभव होता है, काम कराती हूं। लोगों से मुझे बहुत प्यार मिला है। जब मैं गांवों में जाती हूं, तो महिलाएं घर से बाहर निकल आती हैं। मुझे देखना चाहती हैं। क्षेत्र में जाने पर कई बार गंदगी देखकर मन दुखी होता है। ऐसी छोटी-छोटी गलियां विदेशों में भी देखी हैं। उदाहरण देती हूं माल्टा का। फिल्म चरस  की शूटिंग के दौरान माल्टा में भी ऐसी छोटी-छोटी गलियां थीं। बिल्कुल वृंदावन की गलियों की तरह। लेकिन वे बिल्कुल साफ-सुथरी थीं। कागज का टुकड़ा तक सड़क पर नहीं दिखता था। जब वहां सफाई रह सकती है, तो हम यहां क्यों साफ-सुथरा नहीं रख सकते? 
राजनीति इतनी गंदी नहीं है। लोगों को काम करते रहना चाहिए। मन में निराशा नहीं लानी चाहिए। यह नहीं सोचना चाहिए कि अब तो थक गए। अब आराम करना चाहिए। चलते रहिए, काम करते रहिए। देखिए, मैं 70 साल की हूं, लेकिन मैं लगातार काम करती हूं। अपने को फिट बनाए रखने और हमेशा काम करते रहने के लिए कठिन मेहनत करती हूं। इसके लिए मैं नृत्य भी करती हूं। इस तरह से आप अपने को जवान भी रख सकते हैं और अन्य लोगों के लिए रोल मॉडल भी बन सकते हैं। यह सोचते हुए कार्य करें कि अपने लिए, अपने शरीर के लिए काम कर रहे हैं। इसके लिए अनुशासित रहना चाहिए। 
विश्व दृष्टि दिवस के अवसर पर 2007 में भुवनेश्वर में दृष्टि दोष से बचने के लिए लोगों को जागरूक करते हुए मैंने कहा था कि हमें हर साल दो लाख लोगों के लिए आंखें चाहिए, जबकि हमें तब लगभग 30 हजार आंखें ही दान में मिल रही थीं। मुझे लगा कि इस कार्य में मेरी भी भागीदारी होनी चाहिए, इसलिए वर्ष 2007 में अपनी आंखों को मैंने दान करने का संकल्प लिया था। हर सेलिब्रिटी समाजसेवा से जुड़े ऐसा जरूरी नहीं। इसके लिए जज्बा-जुनून होना चाहिए।  राजनीति में आकर भारत के दूर-दराज के इलाकों में गई। तब जाकर मुझे एहसास हुआ कि हमारे देश के लोगों के लिए बहुत कुछ करने की जरूरत है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:meri kahani hindustan column on 27 january