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जब मां ने कर दी थी मेरी पिटाई 

annu kapoor

मेरे पिताजी एक ऐसे परिवार से थे, जहां नाटक-वाटक सब बकवास माना जाता था। पिताजी थिएटर मालिक थे। उनको नाटक का शौक कैसे चढ़ा, नहीं पता। न तो वह कलाकार थे, न अभिनेता, न निर्देशक, न संगीतकार, फिर भी न जाने क्यों उन्हें लोकनाट्य मंडली चलाने का शौक हुआ। इसी वजह से सुना है कि मेरी दादी ने उनको घर से निकाल दिया था। उनके इस शौक की वजह से हमारे बचपन में कई तरह की समस्याएं व तकलीफें भी आईं। हम सब इन समस्याओं से जूझते रहे, लेकिन अपने उसूलों से कभी समझौता नहीं किया। इतने संघर्षों के बावजूद, भूख सहने के बावजूद मां-पिताजी ने कभी भी गलत रास्ते पर चलने की सीख नहीं दी।

मैंने कभी भी बचपन के अपने संघर्षों या गरीबी को ‘ग्लोरीफाई’ करने की कोशिश नहीं की। मेरी मां ब्राह्मण थीं। पिताजी ने उन्हें उर्दू सीखने के लिए प्रेरित किया। नतीजा यह हुआ कि मेरी मां ने उर्दू, पर्शियन और अरबी भाषाएं सीखीं। और वह भाषाविद् बन गईं। मां जितनी अच्छी उर्दू बोलती थीं, उतनी ही अच्छी पंजाबी, मराठी या मारवाड़ी बोल लेती थीं। किसी-किसी को ईश्वर यह काबिलियत देता है। शायद वहां से मेरे अंदर भी कुछ  गुण आए हैं। मां को अलग-अलग धर्मों को जानने-समझने का बहुत शौक था। उन्होंने हमें भी प्रेरित किया कि पढ़ो। उन्हें  साहित्य का शौक था, तो उन्होंने हमें भी पढ़ते रहने को कहा। इसीलिए मैंने न सिर्फ वेद, बल्कि उपनिषदों का भी अध्ययन किया। कुरान  पढ़ी। बाइबिल  पढ़ी। साहित्य में हमने मीर को पढ़ा, गालिब को भी पढ़ा, सूर, तुलसी, संत ज्ञानेश्वर से लेकर चाल्र्स डिकेंस तक को पढ़ा। इस बात का श्रेय मेरी मां को जाता है। हमारे संस्कार, हमारा विवेक, हमारी आर्थिक स्थिति के मुकाबले बिल्कुल अलग था। आज भी है। 

मेरा बचपन आम बच्चों से काफी अलग था। कई घाट का पानी पीना पड़ा। उत्तर प्रदेश और राजस्थान में कई जगहों पर हमें रहना पड़ा। बचपन में कई शरारतें तो ऐसी हुईं, जिन्हें हम शरारत मानते ही नहीं थे, दूसरों को शरारत लगती थी। पिताजी से तो कभी मार नहीं पड़ी, सिवाय एक बार। दरअसल, उन्होंने 29 का पहाड़ा सुनाने को कहा और मैं नहीं सुना पाया, तो उन्होंने गाल पर चपत लगाते हुए कहा कि ओए, सीख इसको। बस इतना ही। लेकिन मां ‘स्ट्रिक्ट’ थीं। उन दिनों एक फिल्म आई थी धरती, उस फिल्म में राजेंद्र कुमार थे, वहीदा रहमान और बलराज साहनी, अजीत जैसे कलाकार भी थे। धरती टाइटिल बड़ा ‘पैट्रियोटिक’ लगा उनको। वहीदा रहमान उनको बहुत अच्छी लगती थीं। मैंने उनसे कहा कि मां धरती  फिल्म है, देशभक्ति की फिल्म है। तो वह देखने चली गईं। उसमें हुआ यूं कि एक गाना था- खुदा भी आसमां से जब जमीं पर देखता होगा, मेरे महबूब को किसने बनाया सोचता होगा, इस गाने का ‘पिक्चराइजेशन’ कुछ यूं था कि मां को पसंद नहीं आया।

वह मेरी मां की संवेदना से ‘मैच’ नहीं खाया। उनको वह अश्लील लगा। घर आईं और उस रोज तो मेरी जबर्दस्त पिटाई हुई। इस बात पर पिटाई हुई कि उनकी ‘सेंसिबिलिटी’ के हिसाब से वह फिल्म ठीक नहीं थी। ऐसे ही 1964 में संगम  फिल्म आई थी, मां ने सिर्फ इतना कहा कि यह फिल्म तुम्हारे लिए नहीं है। वह फिल्म मैंने आज तक नहीं देखी। हमेशा दिमाग के एक कोने में यह बात रही कि इस फिल्म को देखने के लिए मां ने मना किया था। मेरी जेनरेशन के लोगों को आप बेवकूफ बोल सकते हैं, लेकिन यही संस्कार हैं, जिनके बीच हमारी परवरिश हुई। पिताजी ने, मां ने जो बोल दिया, उसे मान लिया, वहां पर शान-पट्टी करनेकी कोशिश हमने नहीं की। मुझे इस बात का कोई अफसोस या दुख नहीं है कि मैंने कुछ ‘मिस’ कर दिया।

मेरी मां ने तो 40 रुपये की नौकरी की है। साढ़े सात किलोमीटर पैदल जाती थीं, और पैदल ही वापस आतीं। बालवाड़ी जाती थीं। मेरी मां के पास दो साड़ियां थीं और एक जोड़ी चप्पल। हम बच्चों के लिए खाना भी बनाकर जाती थीं, क्योंकि पिताजी का प्रोफेशन यानी उनकी नाटक मंडली का काम कभी चलता था, कभी नहीं चलता था। एक परिवार को चलाने के लिए एक नियमित आय जरूरी होती है। इन चुनौतियों के बावजूद मैंने अपने माता-पिता को कभी लड़ते नहीं देखा। मेरी मां ने कभी शिकायत नहीं की। इतना प्रेम था दोनों के बीच में, इतना आदर-सम्मान था। यही आदर-सम्मान की परंपरा मुझमें आई है। मैं आज अपनी पत्नी और बच्चों को न सिर्फ प्यार करता हूं, बल्कि उन्हें आदर और सम्मान भी देता हूं। मैं खुशकिस्मत हूं कि मेरे बच्चे भी मुझे उतना ही आदर-सम्मान देते हैं। 
            (जारी...)

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  • Web Title:meri kahani hindustan column on 25 march