अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

सिनेमा, टेलीविजन और वापस सिनेमा

पंकज कपूर

रंजीत कपूर और सतीश कौशिक फिल्म जाने भी दो यारों  के संवाद लिख रहे थे। कुंदन शाह को अभिनेताओं की तलाश थी। रंजीत के साथ मैंने कई नाटक किए थे। सतीश कौशिक भी मुझे जानते ही थे। मुझे लगता है कि सतीश कौशिक ने मेरा नाम ‘रिकमेंड’ किया था। पहले मैं उस फिल्म में कोई और रोल करने वाला था। जो रोल ओमपुरी जी ने किया, वह पहले मुझे ऑफर किया गया था। फिर उन्हें तरनेजा के रोल के लिए कोई शायद मिला नहीं, तो उन्होंने मुझे वह करने को कहा। मैंने कहा कि यदि आप लोगों को मुनासिब लगता है कि मैं तरनेजा वाला रोल करूं, तो मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है। 

इन चंद फिल्मों से इतर जब मैं बम्बई आया, तो जिस तरह का काम मुझे फिल्मों में मिल रहा था, उसे मैं करना नहीं चाह रहा था। उस वक्त मुझे जो रोल मिल रहे थे, वे अमूमन हीरो का दोस्त या हीरोइन का भाई जैसे होते थे। इससे अलग विलेन का चमचा टाइप के रोल भी मिल रहे थे। ऐसे में, जब पंकज पराशर साहब ने मुझे ‘अप्रोच’ किया और कहा कि टेलीविजन का एक सीरियल बनाने जा रहा हूं और चाहता हूं कि आप इसमें काम करें, तो सबसे पहले मैंने उनसे कह दिया कि मैं टेलीविजन में काम नहीं करूंगा। बाद में, जब हम लोगों की दोस्ती हो गई, तो उन्होंने मुझे बताया कि मेरे जवाब देने के तरीके से वह अपसेट हो गए थे। फिर उन्होंने दोबारा मुझसे जब कहा, तो मैंने रियलाइज किया कि मेरे पास बंबई में सर्वाइव करने के लिए पैसे-वैसे तो हैं नहीं, इसलिए मैंने उनसे कहा कि आप स्क्रिप्ट का इंतजाम करें। जब मैंने स्क्रिप्ट पढ़ी, तो वह रेडियो प्ले की तरह थी। इसके बाद मैंने अपने एक मित्र अनिल चौधरी के साथ मिलकर उस पर काम किया। पंकज पराशर भी साथ बैठे, तब जाकर स्क्रिप्ट तैयार हुई। इस तरह वह कैरेक्टर तैयार हुआ। उसके लिए कुछ ऑडिशंस भी हुए।  

तब मुझे एहसास हुआ कि मैं टीवी में अलग-अलग तरह के किरदार निभा सकता हूं। बजाय फिल्मों की, जहां उस वक्त तक मेरे पास लिमिटेड किस्म की च्वॉइस थी। इसके बाद टेलीविजन में मुझे तरह-तरह के किरदार करने का मौका मिला। जैसे करमचंद  के बाद फटीचर, फिर कब तक पुकारूं  में सुखराम का रोल हुआ। नीम का पेड़ में बुधई का रोल हुआ। नीम का पेड़  जब नेशनल टीवी पर आया, तो वह ‘पॉपुलैरिटी रेटिंग’ में नंबर एक था। करमचंद  और ऑफिस ऑफिस  भी टॉप पर हुआ करते थे। इसके अलावा सतीश कौशिक और मेरा एक और सीरियल था- जुबान संभाल के।  वहां हम सभी परिवार से हो गए थे। सब साथ में खाना खाते थे। ऐसे भी दिन मुझे याद हैं, जब कोई एक अपने घर से सभी के लिए खाना बनवाकर लाता था। करमचंद  में हमारा मन होता था, तो हम विलेन ‘चेंज’ कर देते थे। मैं और पंकज पराशर बैठ जाते थे और कहानी पर मेहनत करके तब्दीलियां कर लिया करते थे।

इनके अलावा विजया मेहता के साथ जो लाइफ लाइन  किया, वह भी कमाल का काम था। वह कमाल की डायरेक्टर हैं। उनके साथ मैंने बतौर अभिनेता कई सारी मीटिंग की थी। अपने काम को लेकर जिस तरह की उनकी अप्रोच थी, उससे मैंने बहुत कुछ सीखा। फिर सीरियल ऑफिस ऑफिस  हुआ। कई काम करते चले गए। अभिनेता के तौर पर यह सब करना काफी संतोषजनक था, बजाय इसके कि मैं किसी फिल्म में तीन-चार सीन का रोल करूं। फिर अचानक बहुत थकान होने लगी। एक ही तरह का काम करते-करते ऐसा लगने लगा था कि ‘क्रिएटिविटी’ के लिहाज से मामला किसी दीवार तक पहुंच गया है। सब कुछ बार-बार दोहराने जैसा लगता था। उस समय टेलीविजन का ‘फॉर्मेट’ बदल रहा था। जिस तरह की आजादी के साथ हम लोग काम करते थे, वह आजादी टूटती सी दिख रही थी। सारी चीजें मार्केटिंग ओरिएंटेड होती जा रही थीं। 

इसे ऊपर वाले का करम ही समझिए कि लगभग उसी वक्त हिन्दुस्तान के सिनेमा की शक्ल बदलनी शुरू हुई। ऐसे सिनेमा आने लगे, जिसका आप बड़े फख्र के साथ हिस्सा होना चाह भी रहे थे, और हो भी गए। अच्छे फिल्ममेकर्स सामने आए। अच्छी कहानियां सामने आईं। इसमें मेरे लायक भी कुछ काम निकलने लगा। जैसे रूई का बोझ, करम, हल्लाबोल, राख और भी कई ऐसी फिल्में बनने लगीं। ऐसा काम मिलने से, जो आप कर रहे थे, जिसका नाम अभिनय है, वह टेलीविजन से निकलकर सिनेमा में आ गया। इसके बाद सिनेमा में मेरी भागीदारी बढ़ती चली गई और फिर टेलीविजन का काम मैंने बंद कर दिया।

(जारी...)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:meri kahani hindustan column on 22 july