DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

यूं ही चलती रहीं मेरी शैतानियां

happy birthday pankaj udhas

मैं बचपन में बहुत शरारती था। पिताजी तो कभी डांटते-मारते नहीं थे, लेकिन मां के हाथों मार कई बार खाई है। तीनों भाइयों में मैं सबसे छोटा था और मैं ही सबसे ज्यादा शरारती भी था। हालांकि मेरी शरारतें किसी को नुकसान पहुंचाने वाली नहीं, बल्कि मौजमस्ती वाली होती थीं। मैं ऊंचे-ऊंचे पेड़ों पर चढ़ जाता था। मां परेशान हो जाती थीं कि किसी दिन मैं गिरा, तो हाथ-पैर टूटेगा। एक आम का पेड़ था। मैं आम के चक्कर में उस पेड़ पर खूब ऊपर तक चढ़ जाता था और मां परेशान होती थीं कि मुझे चोट न लग जाए। छोटी उम्र में शरीर भी ‘फ्लैक्सिबल’ होता था, तो जब तक कोई रोके-टोके, मैं फटाफट पेड़ पर चढ़ जाता था। मैं जिस दौर में बड़ा हुआ, तब टीवी, वीडियो गेम या मोबाइल जैसे मनोरंजन के साधन नहीं थे, तो मैं गुल्ली-डंडा या क्रिकेट खेलता था। इसके अलावा मुझे पतंग उड़ाने का शौक था। गुजरात के राजकोट में, जहां मैं बड़ा हुआ, वहां पतंग उड़ाने में हर किसी की दिलचस्पी होती थी। दिवाली में पटाखों का भी मुझे बहुत शौक था। 

एक बार दिवाली के दिन सुबह का समय था। मेरा एक दोस्त घर आया। हम लोगों ने तय किया कि पटाखे लेकर आते हैं, और हम दोनों घर से निकल पड़े। उस वक्त मेरी उम्र यही कोई छह-सात साल रही होगी। हम लोग घर पर बिना किसी को बताए निकल गए। हम दोनों आपस में बात करते-करते घर से काफी आगे निकल आए। अंदाजन यही कोई चार-पांच किलोमीटर। पटाखे खरीदने के बाद जब हम वापस घर निकलने को हुए, तो चलते-चलते शाम होने लगी। इधर घर में सब परेशान थे कि यह लड़का चला कहां गया? जब कोई जवाब नहीं दे पाया, तो घरवालों ने घबराकर पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी कि बच्चा लापता है। जब हम दोनों घर के पास पहुंचे, तो देखा कि अच्छी-खासी भीड़ जमा है। ऐसा लग रहा था, जैसे पास-पड़ोस का हर व्यक्ति मेरे घर पहुंच गया हो। हमें क्या पता था कि हमारे पीछे क्या-क्या हुआ है? हम दोनों बड़े आराम से बोलते-बतियाते घर तक पहुंच गए। जब अंदर पहुंचे, तो देखा कि मम्मी परेशान होकर रो रही थीं। जैसे ही उन्होंने मुझे देखा और हाथ में पटाखे देखे, तो सबसे पहले गाल पर एक तमाचा जड़ा। उसके बाद बहुत डांटा। दिवाली में पटाखा चलाने में मुझे चोट भी लगी है। मेरे माथे पर एक निशान है, वह  पटाखे की ही देन है। मैंने पटाखा तो चला दिया, पर वह उड़कर मुझे ही लग गया। बावजूद इसके मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता था। बचपन की शैतानियां यूं ही चलती रहती थीं। 

जब मैं स्कूल पहुंचा, तो मेरे अंदर संगीत का शौक पैदा हो चुका था। घर में हर तरफ संगीत का माहौल था, तो उसका असर मेरे ऊपर पड़ना स्वाभाविक ही था। छह-सात साल की उम्र में ही मैंने भी गाना शुरू कर दिया था। मेरा स्कूल मेरे 

घर के बिल्कुल सामने था। बहुत ही नजदीक। मैं पैदल-पैदल स्कूल जाया करता था। सुबह-सुबह जब स्कूल में ‘असेंबली’ होती थी, तो हेडमास्टर साहब 

जोर से बुलाते थे- पंकज, यहां आओ। फिर मैं वहां उनके पास जाता था। वह कहते कि बच्चों को प्रार्थना कराओ। सुबह के वक्त वह प्रार्थना रोजाना होती थी। मुझे लगता है कि संगीत में मेरी भागीदारी वहीं से शुरू हो गई थी। फिर असेंबली में ही कभी-कभी मुझसे भजन या गीत भी सुने जाते थे। कभी मैं कोई भजन 

गाता था, तो कभी कोई गीत। स्टेज पर गाने का सिलसिला देखा जाए, तो वहीं से शुरू हो गया था। 

मेरी इसी गायकी की वजह से पहली क्लास से लेकर बीएससी तक मेरे सारे टीचर मुझ पर मेहरबान रहे। सभी टीचरों का मेरे प्रति एक अलग स्नेह था। बाकी बच्चों के मुकाबले मुझे लेकर जो उनका बर्ताव होता, उसमें एक अलग ‘अप्रोच’ था। सभी को लगता था कि यह बच्चा बहुत प्यारा है। बहुत अच्छा गाता है। लिहाजा स्कूल से लेकर कॉलेज तक मेरी छोटी-मोटी गलतियां यूं ही निकल जाती थीं। राजकोट में संगीत नाटक अकादेमी का बड़ा केंद्र था। उन दिनों संगीत सीखने के लिए राजकोट में वही एक जगह थी। संगीत नाटक अकादेमी के इस तरह के केंद्र देश के कई हिस्सों में थे, जहां बाकायदा संगीत सिखाया जाता था। उन दिनों इन केंद्रों का बड़ा बोलबाला था। एक बड़ी-सी इमारत थी। उसमें प्रिंसिपल थे। टीचर्स थे। संगीत से विषय या शास्त्र के तौर पर मेरा पहला परिचय वहीं हुआ। हालांकि तब मेरे सिर पर तबला बजाने का भूत सवार था। मैं तबला बजा भी लेता था। लिहाजा 13 साल की उम्र में मैं राजकोट की संगीत नाटक अकादेमी से जुड़ा। वहां मैंने तबला सीखना शुरू किया। वहां मेरे एक शिक्षक थे, जिनका नाम मुझे अभी तक याद है, मिस्टर बोरवानी। वह संगीत नाटक अकादेमी के उस केंद्र में मुझे तबला बजाना सिखाया करते थे। 

(जारी...)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Meri Kahani Hindustan Column on 21 april