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मिठाई की दुकान और दूसरे अरमान

मेरे दादा और पिताजी हिमाचल प्रदेश के रहने वाले थे। हिमाचल प्रदेश में हमीरपुर में बडसर एक जगह है। वह वहीं रहा करते थे। पिताजी बाद में अमृतसर आ गए। अमृतसर पुलिस लाइन में जहां जवानों के लिए खाना पकता था, वह वहीं नौकरी करते थे। वहीं नौकरी करते-करते उन्होंने कुछ पैसे जोड़े। उन पैसों से उन्होंने मिठाई की एक दुकान खोली। यह करीब आज से सत्तर साल पहले की बात होगी। उन दिनों अमृतसर में मिठाई की जो कुछ अच्छी दुकानें होती थीं, उनमें से एक दुकान मेरे पिताजी की थी। वह दुकान अब भी अमृतसर में है। मेरी मां भी हिमाचल से ही थीं। मेरे भाई-बहन अब भी हिमाचल में ही रहते हैं। उनकी अगली पीढ़ी भी हिमाचल में ही है। मेरे पिताजी पढ़ाई को बहुत महत्व देते थे। वह नहीं चाहते थे कि उनके बच्चे दुकान पर आएं। उन्हें लगता था कि बच्चों का भविष्य दुकान में नहीं, बल्कि पढ़ाई-लिखाई में है। इसीलिए उन्होंने हम सभी भाई-बहनों को अच्छी तरह पढ़ाया। मेरे भाई ‘साइंस’ और ‘मैथ्स’ जैसे विषयों के अच्छे ‘स्टूडेंट’ थे। मैं ‘स्पोट्र्स’ में आ गया। सबसे छोटा भाई अब अमृतसर की दुकान देखता है। 
मेरा बचपन आर्थिक कठिनाइयों में बीता। यह भी सच है कि हम लोगों की ‘डिमांड’ भी बहुत कम होती थी। एक खाकी पैंट थी, जिससे हम गुजारा कर लिया करते थे। एक साइकिल थी, जो पहले बड़े भाई के पास थी। फिर दूसरे को मिलती थी और फिर वही साइकिल धीरे-धीरे तीसरे-चौथे भाई तक पहुंचती थी। हमारा छोटा-सा घर था। दो कमरे के उस छोटे से घर में हम सात-आठ लोग रहते थे। लेकिन यह ‘स्ट्रगल’ हमें कभी ज्यादा महसूस नहीं होने दिया गया। बच्चों की जिंदगी तो वैसे भी बचपने में निकल जाती है। गलियों में दौड़ते-भागते। स्कूल में बदमाशियां करते। लेकिन पिताजी का संघर्ष मुझे याद है। वह बहुत मेहनत करते थे। वह काम करने के लिए दो जगह जाते थे। सुबह भी और शाम को भी। सुबह मिठाई की दुकान पर जाते थे और बाद में उन्होंने राशन का डिपो खोल लिया था। ऐसे में, हमें खाने-पीने की कोई बहुत परेशानी नहीं हुई। कभी-कभी ऐसा जरूर हुआ कि हमने सिर्फ दाल-रोटी खाई। वैसे भी हमारा परिवार शाकाहारी था। जो भी मिलता था, हम खा लेते थे। दूध-दही भी मिल ही जाता था। 
पिताजी को लगता था कि बाद में हम चारों भाई दुकान पर बैठने लगे, तो उससे चारों का परिवार कैसे चलेगा। उनकी सोच थी कि मुझे अपने बच्चों को पढ़ाना है। दुकान तो थी ही। मेरे अंदर और मेरे सभी भाइयों में भी यही सोच शुरू से थी कि हमें अपने आप कुछ करना है। यह नहीं कि पिताजी की दुकान तो है ही, यहीं आकर बैठ जाएंगे। हममें से किसी भाई ने अपने भविष्य के लिए दुकान की तरफ नहीं देखा कि यहां से पैसे आएंगे। अमृतसर छोटा-सा शहर था। हम भाइयों को ऐसा भी कोई शौक नहीं था कि फिल्म देखनी है या घूमने जाना है। पॉकेट मनी का कल्चर था नहीं। मैंने अपनी जिंदगी की पहली फिल्म 20-22 साल की उम्र में देखी होगी। वह भी तब, जब ऐसी कोई मनाही घरवालों की तरफ से नहीं थी। बाकी के भाई अपनी पढ़ाई में लगे रहते थे और मैं खेल-कूद में। ऐसे में, हम लोगों का मनोरंजन कुछ था, तो छुट्टियों में गांव जाना। वहां बस से उतरने के बाद हमें कोई 10 किलोमीटर पैदल चलकर अपने गांव जाना होता था। कई बार अटैची अपने सिर पर रखकर हम लोग चल देते थे। कभी-कभी दादाजी किसी को लेकर आते थे, जो अटैची उठाने में हमारी मदद कर दिया करता था। 10 किलोमीटर का रास्ता हम लोग रुक-रुककर तय करते थे। जहां रुकते थे, वहां पानी पीते थे। हर दो-तीन किलोमीटर के बाद ऐसा होता था। कहीं रुके, पानी पीया, थोड़ी गप मारी और फिर आगे बढ़ गए। उस समय समाज में प्रेमभाव बहुत था। सभी को पता होता था कि पंडित संतराम के पोते आए हैं। पिताजी हम लोगों को यही सारी बातें देखने के लिए गांव भेजते भी थे कि हम जाएं और देखें कि हमारी जड़ें कहां हैं। हम लोग गांव जाते, तो वहां के रंग में ढल जाते। वहां के तमाम कामकाज में हाथ बंटाते थे। कभी-कभी पानी के दो-दो घड़े भरकर हम लोग तीन-चार किलोमीटर से लाते थे। फिर दादी हमारे खाने के लिए अपने सिर पर कुछ ढककर लाती थीं। वहां दूध-दही खूब मिलता था। गन्ने का रस पीने को मिलता था। शक्कर बनते देखते थे। आम के पेड़ थे। गांव के लड़कों के साथ पेड़ों से आम तोड़ने का खेल चलता था। गांव के बच्चों को लगता था कि हम शहरी बच्चे हैं और यह सब नहीं कर पाएंगे, लेकिन हम लोग सब मौज-मस्ती करते थे। दो महीने का वह समय जिंदगी भर याद रहेगा। जब मैं गांव से लौटता था, तो सेहत ऐसी हो जाती थी कि लोग पूछते थे- अरे, कहां से आ रहे हो? वह माहौल आज नहीं है। 
(जारी)

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  • Web Title:meri kahani Hindustan Column on 19 may