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जब बिग बी का फोन आया

दलेर मेहंदी प्रसिद्ध पंजाबी गायक

मैं गोरखपुर से भागकर वापस घर आया, तो घरवालों की आंखों में आंसू थे। कुछ समय बाद ही मेरे बड़े भाई ने मुझे कार्यक्रम करने के लिए कैलिफोर्निया बुलाया। जब मुझे कैलिफोर्निया का न्योता मिला, तो मैं वापस अपने गुरुजी से मिलने गोरखपुर गया। उन्होंने मुझे देखा, तो भावुक हो गए। मैंने जब उन्हें बताया कि कार्यक्रम करने के लिए कैलिफोर्निया जा रहा हूं, तो उन्होंने अपने कुछ दोस्तों को मेरा गाना सुनाने के लिए बुलाया। उनके सारे दोस्त संगीत के एक से बढ़कर एक जानकार थे। उन लोगों के सामने मैंने उस्ताद गुलाम अली की कई गजलें गाईं। खूब तारीफ मिली। साथ ही गुरुजी ने यह भी कहा कि अपना भी कुछ तैयार करो। खैर, बाद में अपनी बनाई जाने कितनी चीजें मैंने दुनिया भर में गाईं। उन्हीं दिनों मुझे दिल्ली की एक बर्थडे पार्टी में फिल्मी गाने सुनाने थे। मुझे उस दौर के बड़े-बड़े अभिनेताओं के हिट गानों का कैसेट दे दिया गया। मैंने सोचा, दो घंटे में इतने सारे गाने कैसे गाऊंगा? लिहाजा मैंने एक ही लड़ी में उन सारे गानों को गाया। जो आइडिया बाद में कई कलाकारों ने आजमाया।
फिल्मों में और फिल्मी गीतों में मेरी दिलचस्पी शुरू से थी। बचपन में कई बार तो ऐसा होता था कि हम किसी को गाना सुनाकर फिल्म दिखाने को कहते थे, या कुछ खिलाने को कहते थे। गाना सुनाया और फिर समोसा खाने को मिला। घर से स्कूल जाने के लिए निकले और रास्ते में किसी को गाना-वाना सुनाकर कहा, चलिए, अब फिल्म दिखाइए। बचपन में कई फिल्मों के ‘फस्र्ट डे-फस्र्ट शो’ मैंने ऐसे ही देखे हैं। इन बातों के लिए मैंने कभी घर से पैसा नहीं लिया। जब कोई ऐसा जुगाड़ नहीं होता था, तो हम लोग सीधे सिनेमा हॉल चले जाते थे। वहां का गेटकीपर हमें बुला लिया करता था। दो गाने सुनता था और उसके बाद बिना टिकट अंदर जाने देता। कोई ऐसी-वैसी नहीं, हॉल की सबसे अच्छी सीट दिलवाता था। बीच-बीच में पापड़ और मूंगफली भी खाने के लिए भेजता था। उस वक्त मेरी उम्र दस साल भी नहीं थी। यह सब 1975-76 के आसपास की बात होगी। उस दौर में धर्मेंद्र की फिल्में देखना बड़ा पसंद था। फिरोज खान, विनोद खन्ना इन सभी की फिल्में देखने में बड़ा मजा आता था। फिर बच्चन साहब की एंट्री हुई। बचपन से ही उनके फैन हो गए। ये लोग लगते थे कि हीरो हैं। एकाध बार तो मेरे मन में भी एक्टिंग करने का लालच आया, पर इस बारे में ज्यादा सोच नहीं पाया। सरदार था, पगड़ी बांधता था, छोटे-छोटे केश थे, इसलिए एक्टिंग के बारे में कभी सोचा नहीं। वैसे भी मैं बाल कटाने की सोच नहीं सकता था। घर में हमेशा रहता था कि बाल नहीं कटाने, बाल नहीं कटाने। कई बार मन तो करता था कि हीरो बनेंगे, लेकिन मन मारना पड़ता था। 
मेरा एक गाना बहुत हिट हुआ था। उसके बोल थे- बोलो तारा रा रा।  वह गाना एक दिन मैंने अपनी मां को गुनगुनाते सुना था। मैंने उनसे पूछा कि मैं यह गा सकता हूं? उन्होंने कहा, क्यों नहीं गा सकते हो। मेरी मां ने भी यह गाना बचपन में अपनी नानी से सुना था। तो बस यह गाना बन गया। वह कहते हैं न कि मां ने जन्म भी दिया और साथ में तकदीर भी दे दी। जन्म तो कई माएं देती हैं, लेकिन बच्चे अपनी किस्मत की लड़ाई अकेले लड़ते हैं। मैं खुशनसीब था कि मां ने मुझे जन्म देने के साथ-साथ भाग्य भी दे दिया। गाना जबर्दस्त हिट हुआ। लोग मुझे पॉप स्टार बुलाने लगे। घरवाले खूब खुश हुए। यह तब की बात है, जब मुझे लगता था कि जाने कब मुझे बड़ी जगहों से गाने का मौका मिलेगा? जाने कब मेरा नाम होगा? पिताजी तो खैर हमेशा बहुत तारीफ करते थे। यह अलग बात है कि उन्होंने मुंह के सामने तारीफ न के बराबर की। इसी तरह उस्ताद जी कहते थे, तू जहां भी कदम रखेगा, मौला तेरे साथ है। तू रब का बंदा है। यही वजह है कि मुझे नुसरत फतेह अली खां साहब, मेहंदी हसन साहब, उस्ताद गुलाम अली, आशा जी जैसे बड़े कलाकारों ने हमेशा बहुत प्यार दिया। आशा जी ने कोलकाता में एक कार्यक्रम के दौरान स्टेज से कहा कि दलेर जब भी गाते हैं, बहुत सुर में गाते हैं। यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी। 
1996-97 के आसपास की बात होगी। मेरे एक दोस्त ने एक दिन मुझसे पूछा कि तू मुंबई कब जाएगा, तो मेरे मुंह से निकला- जब पाजी बुलाएंगे। दोस्त ने पूछा- कौन धर्मेंद्र? मैंने कहा- नहीं, बच्चन पाजी। वह मंद-मंद मुस्कराया। उसने इस बात के लिए मेरी खिल्ली भी उड़ाई। उसने फिर से पूछा कि वह तुझे क्यों बुलाएंगे? मैंने कहा- देखना, वह मुझे जरूर बुलाएंगे। इस बात को दो महीने ही बीते होंगे कि बच्चन साहब का फोन आ गया।        (जारी...)

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  • Web Title:meri kahani hindustan column on 17 february