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गांधी फिल्म से निकला रास्ता

पंकज कपूर फिल्म अभिनेता

माता-पिता की मौजूदगी, उनका जिंदगी जीने का ढंग हमारे सामने एक उदाहरण था। जब मैं दस-बारह साल का था, तभी मैंने तय कर लिया था कि मुझे एक्टिंग करनी है। यह अलग बात है कि इस उम्र में न तो कोई अपनी बात किसी से कहता है और न ही उसे ‘सीरियसली’ लिया जाता है। जब मैं 18 साल का हुआ, तो मैंने यह बात अपनी मां को बताई। मां बहुत रोईं। अगली सुबह उन्होंने पिताजी को नाश्ते की टेबल पर बता दिया कि यह लड़का तो कह रहा है कि अभिनेता बनना चाहता है और उसके लिए भाग जाएगा। मुझे लगा कि आज मेरी बहुत पिटाई होगी। लेकिन उन्होंने कहा कि मुझे बहुत खुशी है कि मेरे बच्चे ने 18 साल की उम्र में यह तय कर लिया कि वह क्या करना चाहता है? उन्होंने मुझसे मुखातिब होकर कहा- क्या वाकई तुम्हारे अंदर काबिलियत है, माद्दा है इस चीज को आगे बढ़ाने का? और अगर है, तो इसमें तालीम हासिल करो। मेरे इस फैसले के पीछे मेरी अपनी वह तस्वीर थी, जो मैंने बचपन में देखी थी। उस जमाने में भी मैं बचपन में ड्रामा किया करता था। आज के स्कूल-कॉलेज की तरह उस समय उस ‘लेवल’ पर ‘सीरियस’ थिएटर की गुंजाइश तो थी नहीं। उस जमाने में तो जो हमारे टीचर्स करा दिया करते थे, हम कर लेते थे। उनमें से कुछ नाटक तो टीचरों के ही लिखे हुए होते थे। एक मंकीज पॉ  नाम का नाटक था, जो मुझे याद है कि बड़ा मशहूर था। यह मैंने ग्यारहवीं में किया था। उस नाटक की बहुत तारीफ हुई थी। वह अंग्रेजी में लिखा नाटक था। जिसे हमने हिंदी में अनुवाद करके किया था। मुझे लगता था कि मेरी शक्ल अच्छी है और ड्रामा तो मैं करता ही था, तो मैं फिल्मों में जा सकता हूं। बचपन की यह सोच 18 साल तक आते-आते थोड़ी ‘मेच्योर’ हो गई थी। 

पिताजी की सलाह पर मैंने एफटीआईआई, पुणे और एनएसडी, दिल्ली का फॉर्म भरा। एफटीआईआई, पुणे में लोगों को शायद मेरी शक्ल पसंद नहीं आई, पर  नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में मेरा एडमिशन हो गया। केके रैना साहब, रंजीत कपूर साहब, अनिल चौधरी साहब, प्रेम मटियानी, विजय माथुर, अतिया चौधरी, ममता गुप्ता ये सारे लोग मेरे ‘बैचमेट’ थे। 21-22 लोगों का बैच था हम लोगों का। इनमें से मुंबई में अब कुछ ही लोग हैं। मैं खुद को बहुत भाग्यशाली मानता हूं कि नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के तीन साल में मुझे बहुत अच्छे-अच्छे टीचर मिले। खास तौर पर इब्राहिम अलकाजी, जो उस वक्त वहां के डायरेक्टर थे। उनके बारे में कहा जाता है कि वह बहुत सख्त मिजाज टीचर थे, लेकिन मैं मानता हूं कि अगर मैं किसी को थिएटर सिखाऊंगा, तो उन्हीं की तरह से सिखाऊंगा। मैं उस वक्त सिर्फ 19 साल का था। तीन साल के कोर्स में मैं जो कुछ सीख सकता था, मैंने उसे सीखने की कोशिश की। 1976 में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से निकलने के बाद कुछ साल तक मैंने वहां रिपर्टरी में काम किया। फिर मुझे ब्रेक मिला रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधी  में। उसमें मैं गांधीजी का दूसरा सेक्रेटरी प्यारेलाल बना था। वह रोल तो छोटा सा ही था, लेकिन उस रोल के अलावा बड़ी चुनौती थी, फिल्म की डबिंग। मैंने रिचर्ड एटनबरो से कहा कि आपने बेन किंग्सले साहब को गांधीजी पर जो कुछ भी ‘अवेलेबल’ था, वह डेढ़ साल पहले ‘अवेलेबल’ करा दिया था और मुझे आप ऐन वक्त पर कह रहे हैं कि मैं अंग्रेजी में डब करूं। उन्होंने कहा- मैं समझता हूं कि मैं आपके प्रति ‘अनफेयर’ हो रहा हूं, लेकिन मैं चाहता हूं कि आप इसमें मेरी मदद करें। फिर उसमें एक बड़ा मुश्किल सीन था, जिसमें गांधीजी भूख हड़ताल कर रहे हैं। वह उन्होंने मुझसे अंग्रेजी में कराया। वह उन्हें काफी ठीक लगा। इसी के बाद उन्होंने तय किया कि गांधीजी की आवाज मैं ही डब करूंगा। फिर वह सिलसिला शुरू हुआ, जो सात-आठ दिन तक रोज 11-12 घंटे तक चलता था। इस बीच नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा ने कह दिया कि अगर मैं रिपर्टरी कर रहा हूं, तो गांधी  फिल्म के लिए काम नहीं कर सकता। यह फिल्म मैं छोड़ नहीं सकता था। मैं कमिटमेंट कर चुका था। मजबूरन मुझे नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की रिपर्टरी छोड़नी पड़ी। मैं उस समय मुंबई में था, मेरे पास कोई काम नहीं था। ओमपुरी मेरे दोस्त थे। उन्होंने मुझसे कहा कि श्याम बेनेगल कोई फिल्म बनाने जा रहे हैं और मुझे उनसे मिलना चाहिए। मैं श्याम बेनेगल साहब से मिला और इस तरह मुझे उनकी फिल्म आरोहण  में काम करने का मौका मिला। इसके बाद जाने भी दो यारों  मेरे करियर की बड़ी फिल्म रही। इसे एक कल्ट फिल्म की तरह देखा जाता है।    (जारी...)

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  • Web Title:meri kahani hindustan column on 15 july