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मैं खुद को टॉलरेट नहीं कर पाता

अन्नु कपूर, फिल्म अभिनेता

करियर में बहुत सारी फिल्में ऐसी आई हैं, जिन्हें करने का अफसोस हुआ। उस फिल्म को करने की वजह कोई भी हो सकती है, व्यक्तिगत रिश्ता या फिर पैसा, लेकिन बहुत सारी ऐसी फिल्में जरूर हैं, जिन्हें करने का अफसोस हुआ। एक बार तो मैं सेट छोड़कर चला आया था। उसके पैसे वापस कर दिए, क्योंकि उस डायरेक्टर ने मुझे धोखा दिया था। दरअसल, मैंने स्क्रिप्ट देखने के बाद ही कहा था कि यह स्क्रिप्ट मुझे पसंद नहीं आ रही है, आप मेरे डायलॉग्स बदल दीजिए, क्योंकि मैं द्विअर्थी संवाद बोलता नहीं हूं। लेकिन जब सेट पर पहुंचा, तो देखा कि वही डायलॉग्स हैं। मैं भी पंजाबी आदमी हूं, सेट छोड़कर आ गया। कुछ ऐसी फिल्में भी हैं, जिनको करते वक्त बहुत आनंद आया और खुशी हुई। जैसे केतन मेहता की एक फिल्म मैंने की थी- सरदार।  उसमें मैंने गांधी का किरदार निभाया था। मैंने अनिल चौधरी के सीरियल कबीर  में कबीर का रोल किया। उन्होंने उस दौर में मुझे लेकर बड़ा रिस्क लिया था। इसके बाद विकी डोनर  में शुजीत सरकार का आभारी हूं कि उन्होंने इतनी कमाल की फिल्म बनाई। इसी तरह, सुभाष कपूर की जॉली एलएलबी-2 भी है।  

विकी डोनर  की स्क्रिप्ट को लेकर हमलोग टेबल पर आमने-सामने बैठे। उन्होंने हल्की सी कहानी सुनाई और स्क्रिप्ट देकर गए। मैंने उनसे कहा कि मुझे दो दिन का वक्त दे दीजिए स्क्रिप्ट पढ़ने के लिए। मैंने उस स्क्रिप्ट को पढ़ना शुरू कर दिया। पहले पेज से ही मुझे लग गया कि ओ माइ गॉड। अरे भैया, ये तो ओरिजिनल सब्जेक्ट है। मौलिक है। मैं मौलिकता का दीवाना हूं। ऐसी फिल्में बड़ी रेयर होती हैं, जो ओरिजिनल सब्जेक्ट पर बनी हों। उस फिल्म का तजुर्बा बिल्कुल अलग था। बहुत ही शानदार। एक-एक मोमेंट मुझे याद है। मेरे जैसे आदमी ने पूरी फिल्म की स्क्रिप्ट में एक शब्द भी चेंज नहीं किया है। अपने आप में ‘नेक्सट टु परफेक्ट स्क्रिप्ट’ और ‘नेक्सट टु परफेक्ट डायलॉग्स।’ मुझे कुछ करना ही नहीं पड़ा। डायलॉग्स की भाषा को लेकर मैं बहुत सेंसेटिव हूं, लेकिन उसमें कुछ बदलने की जरूरत ही नहीं पड़ी। मैं फिल्में देखता नहीं हूं, लेकिन सुना है कि शुजीत सरकार ने पहले भी काफी अच्छा काम किया है। उनके लिए भी विकी डोनर एक टर्निंग प्वॉइंट वाली फिल्म साबित हुई। इसके बाद जॉली एलएलबी-2 की बारी आई। मैं बहुत आलसी आदमी हूं। मेरे पास टाइम भी नहीं होता है। मैं सिर्फ स्क्रिप्ट पढ़ता हूं। मुझे इससे मतलब नहीं था कि सुभाष कपूर ने उससे पहले कितनी फिल्में बनाई हैं? मुझे मतलब है तो बस वर्तमान से। आज आप मुझे क्या ऑफर कर रहे हैं? आपकी स्क्रिप्ट क्या है? स्क्रिप्ट पढ़ी और न करने का सवाल ही पैदा नहीं होता। वह पहले एक फिल्म कर चुके थे, इसलिए थोड़ी-बहुत बातचीत हुई, लेकिन वह ‘पार्ट ऐंड पार्सल’ है क्रिएटिवटी का। वह डायरेक्टर हैं, मुझे उनकी बात माननी पड़ेगी, मगर मुझे अपनी जो बात कहनी थी, मैंने कही। आप ताज्जुब करेंगे, फिल्म रिलीज हुई, फिल्म हिट हो गई। हमारा काम हिट हो गया। हिट होने के सात महीने बाद उन्होंने मुझे मैसेज किया। यह नौ अगस्त की बात थी। उन्होंने लिखा- अन्नू जी, सोशल मीडिया पर अब भी आपके प्रमोद माथुर के रोल की बहुत तारीफ हो रही है। आपका शुक्रिया कि आपने इस प्रोजेक्ट पर हमारे साथ काम किया। आप उनकी विनम्रता देखिए। मैं यह कहना चाहता हूं कि इस फिल्म में मेरा रोल सुभाष कपूर को ही ‘डेडीकेटेड’ है। मैंने पूरी फिल्म में सब कुछ उनके ऊपर ही छोड़ दिया था। मैंने यह फिल्म भी नहीं देखी। विकी डोनर  देखी थी। उसका प्रीमियर शो देखा था। उसके बाद उसका दूसरा प्रीमियर शो मैंने पोलैंड के प्रधानमंत्री के साथ देखा। 

बचपन से लेकर अब तक गिनी-चुनी फिल्में मैंने देखीं। मैंने डीवीडी पर चक दे इंडिया  देखी थी। वह बहुत बेहतरीन फिल्म है। उसे देखते हुए मैं बड़ा इमोशनल हो गया था। उस फिल्म में मुझे शाहरुख का काम अच्छा लगा। मैंने इन कलाकारों का बाकी कोई काम देखा नहीं है। मैंने गुरुदत्त की प्यासा  देखी है। राज खोसला की मेरा गांव मेरा देश  याद आती है, जिसको पूरी तरह से कॉपी करके शोले  बनाई गई है। वैसे वह भी एक इंग्लिश फिल्म की कहानी पर बनाई गई थी। दिलीप कुमार की गोपी  देखी। कण-कण में भगवान  देखी। अपनी फिल्मों की बात करूं, तो मैंने अपनी भी कम ही फिल्में देखी हैं। मैं अपने आपको स्क्रीन पर देख नहीं पाता। मुझे घबराहट होने लगती है। मैं खुद को टॉलरेट नहीं कर पाता। अपनी फिल्मों में मैंने धर्मसंकट, गर्दिश, मुस्कराहट  देखी है।

(जारी...)

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  • Web Title:meri kahani hindustan column on 15 april