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टूथब्रश से क्रिकेट फॉर्म का रिश्ता

                              mohd zakir ht photo

क्रिकेट छोड़ने के फैसले के बाद मैदान में वापसी अपने आप हुई। 2007 में भारतीय टीम विश्व कप से पहले ही दौर में बाहर हो गई। वेस्ट इंडीज में खेले गए उस विश्व कप में भारतीय टीम बांग्लादेश और श्रीलंका से हार गई थी। राहुल द्रविड़ टीम के कप्तान थे। हार के बाद बहुत हो-हल्ला हुआ। उसके बाद भारतीय टीम को बांग्लादेश के दौरे पर जाना था। रवि शास्त्री को उस दौरे में मैनेजर बनाया गया था। उस दौरे के लिए मुझे चुना गया। वहां जाकर मैंने पहले ही मैच में बांग्लादेश के खिलाफ 100 रन बना दिए। दूसरे मैच में भी मैंने हाफ सेंचुरी बनाई। तीसरा मैच बारिश की वजह से धुल गया। इसके बाद भारतीय टीम का इंग्लैंड दौरा था, जिसके लिए भी मुझे टीम में चुना गया। फिर 2007 का ट्वंटी-20 विश्व कप आया। उस टूर्नामेंट में हम चैंपियन बने। मैंने टूर्नामेंट में भारत की तरफ से सबसे ज्यादा रन बनाए। सात मैचों में मेरे सवा दो सौ से ज्यादा रन थे, जिसमें तीन हाफ सेंचुरी थीं। इसके अलावा फाइनल मैच में भी मैंने टीम के लिए सबसे ज्यादा 75 रन बनाए थे। इसके बाद फिर कहानी बदल गई। 
मुझे करियर की बड़ी सीख मिली 2007-2008 के ऑस्ट्रेलिया दौरे के बाद। मैंने ऑस्ट्रेलिया जाने के बाद अपने खेल को आसान करने की कोशिश की। ऑस्ट्रेलिया जाने के बाद मुझे अपने खेल को लेकर जितनी समझ मिली, उतने पूरे करियर में नहीं मिली। उस समय मैंने यह समझा कि तकनीक बहुत ‘ओवर रेटेड’ चीज है। सबसे जरूरी है कि आप किस तरह से गेंद को देखते हैं। अगर आप गेंद को सही तरीके से देखते हैं, तब आपका माइंडसेट बिल्कुल ब्लैंक होता है। उसके बाद आप गेंद को खेलने की अपनी रणनीति बेहतर तरीके से प्लान कर सकते हैं। इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता। ऑस्ट्रेलिया से आने के बाद मैंने अपने करियर में दो बार पांच-पांच सौ रन बनाए, तो समझ आया कि वहां से लौटने के बाद क्या फर्क पड़ा है। ऑस्ट्रेलिया से लौटने के बाद मैंने अपना खेल एक बार तोड़कर दोबारा जोड़ा। अपना पूरा खेल ही मैंने बदल दिया। बल्लेबाजी में सबसे जरूरी चीज होती है, आपका नजरिया। जब आप अपना नजरिया बदलते हैं, वह भी काफी ज्यादा, तो आप बतौर बल्लेबाज जीरो से शुरू करते हैं। मैंने भी अपनी बल्लेबाजी जीरो से शुरू की। उसके बाद रन बनाए। ऐसा करने में एक खतरा भी होता है। अगर आप कोई बड़ा बदलाव करें और उसके बाद रन न बने, तो आपकी आदत होती है वापस पुरानी ‘स्टाइल’ में लौटना। मेरे सामने यही चुनौती थी कि चाहे मैं जीरो बनाऊं या सौ, मैं नए नजरिए के साथ ही खेलूंगा। ऐसा करके मैंने अपने खेल को आसान किया। 
मैं रॉकी  का बहुत बड़ा फैन था, जो सिल्वेस्टर स्टोन की फिल्म शृंखला है। मैंने ‘रॉकी  सीरीज’ की फिल्में कई-कई बार देखी हैं, खास तौर पर रॉकी फोर।  इसीलिए मेरे बल्लों के नाम उसी तरह होते थे। मैंने अपने बल्लों पर वन, टू, थ्री की नंर्बंरग करके रखी थी, जो बहुत आम बात है। क्रिकेटर अपने पसंदीदा बल्लों को ‘नंर्बंरग’ करके रखता ही है। इसके अलावा, मैंने अपने करियर में कोई टोटका कह लें या अंधविश्वास, कभी नहीं किया। ‘रूटीन’ अलग चीज है और अंधविश्वास करना अलग। अंधविश्वास आपको कमजोर करता है। मैं कभी यह नहीं सोचता था कि मुझे ‘यही’ करना है या ‘वही’ करना है। जैसे बहुत से लोग कहते हैं कि मैं जब आउट ऑफ फॉर्म होता था, तो सहवाग के बल्ले से खेलता था। इसका सच भी कुछ दूसरा है। दरअसल वीरू ने मुझे टी-20 वल्र्ड कप से पहले एक बैट दिया था। उस बैट से मैंने बहुत रन बनाए थे। उसी बल्ले से मैंने सीबी सीरीज में भी काफी रन बनाए थे। सीबी सीरीज में भी मैंने टीम के लिए सबसे ज्यादा रन बनाए थे। दो शतक लगाए थे। उसमें मैंने साढ़े चार सौ के करीब रन बनाए थे। असल में कई बार ऐसा होता है कि दूसरे खिलाड़ी का बैट आपको बहुत पसंद आता है। वैसे भी मैं बहुत हल्के बैट से खेलता था। ‘वेट’ और ’साइज’ के हिसाब से सहवाग का बैट ही मेरे बैट के सबसे करीब था। युवराज सिंह का बैट लंबा हुआ करता था। भज्जी या धोनी का बैट बहुत भारी हुआ करता था। मैं भी शॉर्ट हैंडल से ही खेलता था। इसलिए जब भी मुझे किसी दूसरे बल्लेबाज का ‘बैट’ चाहिए होता था, तो मैं वीरू का ही ‘बैट’ लेता था। इसके अलावा मेरी क्रिकेट फॉर्म का रिश्ता मेरे टूथब्रश से भी है। मैं सोचता बहुत हूं। जब मैं ज्यादा सोचता हूं, तब मेरा ब्रश करने का तरीका अलग होता है। ब्रश करते वक्त भी मेरे दिमाग में बहुत सारे ‘थॉट्स’ चलते रहते थे। कई बार चिंताएं भी रहती थीं। मेरा ब्रश कितना घिसा हुआ है, यह देखकर मेरे घरवाले इस बात का अंदाजा लगा लेते थे कि मैं अपनी फॉर्म को लेकर कितना सोच रहा हूं। 
(जारी)

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  • Web Title:meri kahani hindustan column on 14 july