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मैं नृत्य के बिना नहीं रह सकती

नब्बे के दशक में मैं अभिनय क्षेत्र से दूर रही। इसके बाद फिल्म बागवान (2003) का प्रस्ताव मिला, तो मैं इनकार न कर सकी। इस फिल्म के साथ मैंने दूसरी पारी शुरू की। इस फिल्म की विषय-वस्तु ने मेरे दिल को छुआ था। बागवान  के दौरान मेरी ऊर्जा को देख अभिनेता अमिताभ बच्चन ने कहा कि, आज भी आप अपनी बेटियों से अधिक जवान लगती हैं। बागवान  फिल्म के लिए मुझे अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। इसके साथ-साथ मोस्ट पॉपुलर एक्ट्रेस, पर्सन आफ द ईयर जैसे पुरस्कार भी मिले। बाद में वीर-जारा  (2004), बाबुल (2006) और लागा चुनरी में दाग (2007) जैसी कई फिल्में मैंने कीं। इससे पहले बतौर निर्देशक अभिनेता शाहरुख खान और दिव्या भारती को लेकर फिल्म दिल आशना है  बनाई थी। बाद में बेटी ईशा और धर्म जी के साथ टेल मी ओ खुदा  बनाकर निर्देशन क्षेत्र की बारीकियां देखीं।  

कला जगत में मेरी दो पहचान हैं। एक अभिनेत्री का, जिसमें जॉनी मेरा नाम, खुशबू, सीता और गीता,  प्रेम कहानी, शोले  जैसी कई फिल्मों में लोगों ने मुझे देखा। मेरा दूसरा रूप नृत्यांगना का है, जिसमें भरतनाट्यम के माध्यम से मैं शास्त्रीय नृत्यों का मंचन करती हूं। बॉलीवुड से मुझे प्रसिद्धि मिली, तो कला की गूढ़ता का मर्म मैं शास्त्रीय मंचों के माध्यम से प्रस्तुत करती हूं। कभी गंगा अवतरण, कभी दुर्गा आराधना, तो कभी महिषासुर मर्दन के दृश्यों पर दर्शकों की हौसला अफजाई से मुझे साहस मिलता है। इसी के चलते भारतीय शास्त्रीय नृत्य को दुनिया के कोने-कोने तक लोकप्रिय बनाने की मेरी कोशिश जारी है। मोहिनीअट्टम की नृत्य शैली आज लुप्त होती जा रही है। इस विधा को बनाए रखने के लिए मैं प्रयासरत हूं। मैं नृत्य के बिना नहीं रह सकती। अब तो मेरी दोनों बेटियां भी मेरे साथ मंचों को और कलात्मक बनाने में सहयोग करती हैं। शास्त्रीय नृत्यों के आयोजनों में बेटियों के साथ कला को नया आयाम देने की मेरी कोशिश रहती है। मैंने भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी और ओडिसी में विधिवत प्रशिक्षण लिया है। देश-विदेश में स्टेज शो किए हैं। अभिनेत्री, फिल्म निर्माता, निर्देशक और संसद सदस्य होने के साथ ही मैं अपने नृत्यांगना स्वरूप को हमेशा बनाए रखना चाहती हूं।

अपने लंबे फिल्मी करियर में या डांस शोज में आने वाले लोग मेरे डांस नंबर्स देखते हैं, लेकिन जब भी मैं सार्वजनिक जगहों पर जाती हूं, तो लोग मुझे इसलिए देखने आते हैं कि मैं बॉलीवुड कलाकार हूं। मैंने कई फिल्मों में काम किया है, मगर लोगों को इन सब भूमिकाओं में शोले खास तौर पर याद है। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि इसका बसंती कैरेक्टर फेमस हो गया था। अपनी सभाओं में मैं महिलाओं से कहती भी हूं कि उन्हें बसंती जैसा बनना है। वर्ष 1990 में मैंने छोटे परदे पर धारावाहिक नुपूर  का निर्देशन किया। नुपूर  धारावाहिक भरतनाट्यम पर आधारित था। वर्ष 1995 में छोटे परदे के लिए मोहिनी  का निर्माण और निर्देशन किया। 

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी से जब मेरी मुलाकात हुई, तो मैं थोड़ा नर्वस थी। लेकिन उनके सामने जाने पर पता चला कि वह मेरे अभिनय के फैन हैं। वाजपेयी जी ने खुद बताया कि उन्होंने फिल्म सीता और गीता 25 बार देखी है। इस फिल्म में मेरा डबल रोल था। फिल्मों में मैंने सभी तरह के किरदार निभाए, जिनमें एफसी मेहरा की फिल्म लाल पत्थर  में मेरा निगेटिव कैरेक्टर भी था। इसी तरह किशोर कुमार के कहने पर बांग्ला भाषा में मैंने दो गीत भी गाए थे। महान फिल्मकार सत्यजीत रे के साथ काम करने का मुझे मौका नहीं मिला, अगर वह मुझे किसी रोल का प्रस्ताव देते, तो मैं उसे स्वीकार कर लेती। 

अपने को तरोताजा बनाए रखने के लिए मैं हर रोज नियमित तौर पर योग तथा व्यायाम करती हूं। सप्ताह में दो बार उपवास मेरी नियमित जिंदगी का अंग है। इनमें एक दिन शुक्रवार होता है। इसके कारण मुझे काम करने की ऊर्जा मिलती है। मैं शुद्ध शाकाहारी हूं। मुझे भोजन में चावल के साथ रसम, ग्रीन टी, दही बेहद पसंद हैं। यह जानना कि मेरा भोजन पेड़-पौधे और जानवरों की मदद कर रहा है, मुझे खुश करता है। मुझे कांजीवरम साड़ियां, चमेली के गजरे और ढेर सारी ज्वेलरी भी पसंद हैं। मेरे जीवन में सबसे ज्यादा खुशी का दिन वह था, जब मेरी नातिन राध्या पैदा हुई। मैं उसे बेहद प्यार करती हूं। इसके लिए मैं भगवान को धन्यवाद देती हूं। उसका नाम राधा जी के नाम पर हमने राध्या रखा है। उसे देखकर तो मैं सब कुछ भूल जाती हूं।   (जारी...) 

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  • Web Title:meri kahani hindustan column on 13 january