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हमारा रिश्ता बहुत परिपक्व है

हेमा मालिनी

पहली बार फिल्म आसमान महल  के प्रीमियर पर धर्मेंद्रजी से मुलाकात हुई। तब मैंने नहीं सोचा था कि यह मेरे जीवन साथी बनने वाले हैं। शुरुआत में इस ओर ध्यान ही नहीं दिया। यह तो कुछ साल बाद महसूस हुआ। इस मुलाकात से पहले उनके बारे में मैंने बहुत कुछ सुन रखा था। संयोग से इसी साल हमें एक साथ चार फिल्मों में साइन किया गया। सबसे पहले फिल्म शराफत  की हमने शूटिंग की। इसके बाद 1971 में धरमजी के साथ आई राजा जानी  सुपरहिट रही। फिर 1972 में सीता और गीता  में हमने साथ काम किया। डायरेक्टर रमेश सिप्पी ने यह कहानी मुझको नजर में रखकर लिखी थी। धर्मेंद्रजी के साथ आई हीरोइन ओरिएंटेड यह फिल्म लोगों ने खूब सराही। रमेश सिप्पी की ही शोले  में बसंती के बाद धरमजी मुझे अक्सर बसंती कहकर बुलाते थे। उनके साथ मेरी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर कामयाब हो रही थीं। चरस  से लेकर 1977 में ड्रीम गर्ल  तक हमारी जोड़ी सुपरहिट रही। जिस वक्त शोले  रिलीज हुई, उस वक्त मेरी शादी को लेकर अखबारों में रोज छपने वाली खबरों से मां-पापा परेशान रहते थे। उनको देखकर एक दिन मैंने कह दिया कि मां, अगर ऐसे ही चलता रहा, तो मैं फिल्मों में काम नहीं करूंगी। असल में किसी और एक्टर के साथ मेरे काम करते समय मम्मी को डर रहता था, लेकिन धरमजी के साथ काम करने पर मम्मी निश्चिंत रहती थीं। मैं भी तब मां को सारी बातें बता देती थी। 
बाद में हमारी शादी तमिल रीति-रिवाज से हुई। हम दोनों इसी तरह से शादी करना चाहते थे। ज्यादातर लोग मेरे सामने मेरी तारीफ किया करते थे, लेकिन धरमजी ऐसे नहीं हैं। वह मेरी मां जैसे हैं। मेरी मां की आदत थी कि वह मेरी तारीफ मेरे सामने नहीं करती थीं। मेरे पीछे से वह मेरी तारीफ करती थीं। ठीक इसी तरह, धरमजी ने भी मेरे सामने मेरी तारीफ कभी नहीं की। मां ने हमेशा मुझे सही रास्ता दिखाया। वह सही और गलत के बारे में बताती थीं। यही आदत धरमजी की है।  
हमारा रिश्ता बहुत मैच्योर है। धरमजी को अपनी ड्यूटी पता हैं। उन्हें कभी यह बताना नहीं पड़ा कि उनकी बेटियों के प्रति क्या जिम्मेदारी है? धरमजी ने मेरे और मेरी बेटियों के लिए लिए जो किया, मैं उसमें खुश हूं। उन्होंने एक पिता की भूमिका बखूबी निभाई। मेरी बेटी ईशा की शादी भी तमिल रीति-रिवाज के साथ हुई थी। मैंने अपनी देख-रेख में शादी के सारे इंतजाम किए थे। उन्होंने पिता का कर्तव्य बखूबी निभाते हुए बारातियों का खुद स्वागत किया। बेटी की संगीत पार्टी में धरमजी के साथ सबने जमकर धमाल मचाया। 
धरमजी के पिता केवल कृष्ण सिंह देओल, मुझे और मेरी फैमिली को बहुत पसंद करते थे। वह अक्सर चाय पर मेरे पापा और भाई से मिला करते थे। इस दौरान वह पंजे भी लड़ाया करते थे। उन्हें हराने के बाद मजाक करते हुए कहते, तुम लोग कुछ घी-मक्खन खाओ, लस्सी-वस्सी पियो। इडली और सांभर से ताकत नहीं आती। इसके बाद सब खूब हंसते थे। धरमजी की मां सतवंत कौर बहुत अच्छी महिला थीं। एक बार वह मुझसे मिलने जुहू के एक डबिंग स्टूडियो में आई थीं। उन्होंने घर में किसी को यह नहीं बताया था। मैंने उनके पैर छुए और उन्होंने आशीर्वाद देते हुए कहा- बेटा, हमेशा खुश रहो। 
धरमजी जब सांसद थे, तो मैं भी उनके कामों में हाथ बंटाती थी। उन्होंने बीकानेर में बहुत काम किया। वह मुझसे अक्सर पूछते रहते हैं कि अपने संसदीय क्षेत्र के लिए क्या-क्या कर रही हो? मैं मथुरा से जब मुंबई वापस जाती हूं, तो मेरे दौरे के बारे में शिद्दत से पूछते हैं। मैं उन्हें बताती हूं कि कहां पर मैंने क्या देखा और लोगों की किस समस्या का मैं क्या हल करने जा रही हूं। अपने संसदीय क्षेत्र के कस्बा सौंख में जब लोगों के लिए आरओ के पानी का एटीएम लगाया, तो धरमजी बहुत खुश हुए।
आज मैं काम करती हूं और अपनी डिग्निटी को मेंटेन करने में पूरी तरह सक्षम हूं। मैंने अपनी जिंदगी को कला और संस्कृति से जोड़ लिया है। मुझे लगता है कि अगर सिचुएशन इससे थोड़ी भी अलग होती, तो मैं आज वहां न होती, जहां हूं। धरमजी को देखकर मैं कह सकती हूं कि उम्र कोई मायने नहीं रखती। कोई भी चाहे, तो धरमजी की तरह हमेशा बच्चा बना रह सकता है। वह आज भी मुझे अंतरात्मा की तरह सही और गलत का रास्ता दिखाते हैं। उनको मेरी क्षमता पर पूरा विश्वास है। वह देखने में भले ही कठोर लगते हैं, लेकिन दिल के बहुत नरम हैं। जब मेरे पापा नहीं रहे और हमारा परिवार काफी दुखी था, तब धरमजी ने ही परिवार की बहुत मदद की थी।                (जारी...)

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  • Web Title:meri kahani hindustan column on 13 january