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नहीं भूला बस नंबर 978 का वह डंडा

सुशील कुमार, प्रसिद्ध पहलवान

खिलाड़ी और ओलंपिक मेडलिस्ट होने का मतलब उस समय पता चलता है, जब आप देश का तिरंगा लेकर आगे-आगे चल रहे होते हैं। मुझे ही नहीं, किसी भी खिलाड़ी को उसी वक्त पता चलता है कि उसने वाकई देश के लिए कुछ किया है। उस वक्त भावना ही अलग होती है। आप जीतने के बाद ‘पोडियम’ पर खड़े होते हो, पूरी दुनिया आपको देख रही होती है, तब सचमुच गर्व महसूस होता है। अभी भी मैं जब जॉर्जिया जाता हूं ट्रेनिंग करने के लिए, तो कई बार के वल्र्ड चैंपियन मुझे देखने आते हैं कि यह भारत का वह खिलाड़ी है, जिसने लगातार दो ओलंपिक में मेडल जीते हैं। अभी तक बहुत कम लोग ऐसा कर पाए हैं कि लगातार दो ओलंपिक में मेडल जीते हों। ये सब बातें मुझे भी नहीं पता थीं। मैं तो बस उस लाइन के पीछे भागा करता था, जो गुरुजी ने दी थी- ओलंपिक मेडल। मैंने कभी सोचा तक नहीं था कि मालिक इतना कुछ दे देगा। मैंने आप लोगों को बताया ही है कि मैं एक मध्यमवर्गीय परिवार से आता हूं। बस नंबर 978 का डंडा आज भी याद है। गरमी में कैसे उसे पकड़कर स्टेडियम जाते थे। 

आज ईश्वर का दिया परिवार के पास सब कुछ है। कुछ हफ्ते पहले, जब मैं कॉमनवेल्थ गेम्स में जीतकर लौटा, तो मेरे साथ मेरा एक जूनियर पहलवान सुमित भी गोल्ड मेडल जीतकर लौटा। मेरे पिताजी ने उसके हाथ पर एक लाख रुपये रख दिए। मुझे यह देखकर इतनी खुशी हुई कि देखो, समय कितना बदल गया है। पिताजी ने सुमित से कहा कि ‘तुमने बहुत अच्छी कुश्ती लड़ी है और ये एक लाख रुपये मेरी तरफ से आशीर्वाद है।’ पापा ने हम लोगों का बीता वक्त देखा है। इसलिए भी खुशी हुई कि आज ऊपर वाले ने इस लायक बना दिया है कि हम दूसरों की भी मदद कर सकें। वक्त बदल गया है। कभी बस में आता था, अब टीवी पर आता हूं। मेरे बच्चे ‘एक्साइटेड’ हो जाते हैं कि देखो-देखो, टीवी पर पापा आ रहे हैं। 

मेरे साथ पिछले ओलंपिक से पहले एक विवाद भी हुआ। नरसिंह यादव वाले मामले में। मैंने इसीलिए ज्यादा कुछ बोला नहीं। बस एक बात कही थी कि खिलाड़ी को समझ-बूझकर काम करना चाहिए। लोगों ने कहा कि मेरा और नरसिंह का झगड़ा हो गया। मैं आज भी उससे मिलता हूं। अभी मैं नेशनल्स खेलने गया था, तो वहां पर नरसिंह चीफ गेस्ट बनकर आया था। वह स्टेज पर बैठा हुआ था। जब मैं फाइनल जीतकर सबसे मिलने गया, तो उसके पास भी गया। उसने मेरे पैर छुए और मैंने उसका हाल-चाल पूछा। मैं बाउट हारने पर कभी नहीं रोया, जीतने पर भी कभी नहीं रोया। मैं बाउट के बाद मजे करता हूं। हार के बाद भी मैं ज्यादा परेशान नहीं होता। हां, कोच साहब बहुत परेशान हो जाते हैं। अक्सर वह मेरे साथ ही होते हैं, तो हार के बाद उनका चेहरा देखने लायक होता है। उनसे बचने के लिए मैं इधर-उधर परेशान शक्ल लेकर घूमता हूं, ताकि उन्हें लगे कि मैं भी परेशान हूं। मैं हमेशा मानता हूं कि अगर हार की बात दिमाग में लेकर घूमता रहा, तो अगला सेशन भी खराब हो जाएगा। अब हारना था तो हार गए, अब आगे सोचना है। 

आज मेरी एक ‘पर्सनल’ जिंदगी भी है। अब मैं शादीशुदा हूं। मेरे जुड़वां बेटे हैं। दोनों चार साल के हैं। अब तो मैं जब बाहर जाता हूं, तो वे रोते हैं। कई बार फेसटाइम या वीडियो कॉलिंग पर बात करता हूं, तो मुझसे मिलने के लिए रोते रहते हैं। कहते हैं, पापा आपकी बहुत याद आ रही है। मुझे लगता है कि वे भी मेरे साथ तपस्या कर रहे हैं। मेरी पत्नी बहुत सपोर्ट करती हैं। कॉमनवेल्थ में तो बड़ा मजेदार वाकया यह रहा कि जब मैं सेमीफाइनल बाउट जीतकर गुरुजी के पास आशीर्वाद लेने गया, तो वहां मेरे बच्चे भी तख्ती लेकर बैठे थे, जिस पर लिखा था- ‘गो फॉर गोल्ड पापा।’ बड़ा अजीब सा लगा कि ये तख्ती उनके हाथ में किसने दे दी? फिर मेरी पत्नी ने बताया कि एरिना में आते वक्त सभी छोटे बच्चे उस तरह की तख्तियां ले रहे थे, तो उसने लेकर उस पर लिख दिया था- ‘गो फॉर गोल्ड पापा।’ अब भी जब मैं घर जाता हूं, तो मुझे दिखाते हैं कि देखो पापा, हमने ये ले रखा था। अब जब शनिवार-इतवार को उनके स्कूल की छुट्टी होती है, तो दोनों मेरे साथ अखाड़े में आते हैं। मेरी खुशकिस्मती है कि परिवार की सारी जिम्मेदारी एक तरफ से पत्नी ने ले रखी है और मुझे फ्री छोड़ा है कि मैं अपनी कुश्ती अपने करियर पर फोकस करूं। मेरे ऊपर घर जाने की सिरदर्दी नहीं है। मुझे ‘प्रॉपर-स्पोट्र्स’ करना है और देश के लिए खेलना है। इसीलिए अब भी मेरा ध्यान सिर्फ ट्रेनिंग पर है। अब एशियन गेम्स की तैयारी करनी है। 

    (जारी...)

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  • Web Title:meri kahani hindustan column on 1 july