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11 जुलाई, 2020|11:00|IST

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जहां से आती है मेरी क

पंडित शिव कुमार शर्मा

एक बार शिकागो में कार्यक्रम था। यह 1980 के दशक की बात है। मेरे साथ उस्ताद अल्ला रक्खा खां साहब बजा रहे थे। उस पूरे दौरे में उन्होंने ही मेरे साथ बजाया था। मैं उनसे डोगरी भाषा में ही बातें करता था। अल्ला रक्खा खां साहब भी जम्मू के रहने वाले थे। हुआ यूं कि उस दिन कार्यक्रम करने के बाद जब लोगों ने मिलना-जुलना शुरू किया, तो सबने बड़ी तारीफ की। मैंने उनसे डोगरी में कहा- खां साहब, लगता है कि आज का कार्यक्रम अच्छा हो गया। उनका जवाब था कि कार्यक्रम तो अच्छा होना ही था, क्योंकि जम्मू के दो कलाकार जो बजा रहे थे। खां साहब मुझे बहुत स्नेह करते थे। यह जो हमारी जमीन से जुड़ी याद थी, हमेशा मेरे जेहन में रही। ऐसे कार्यक्रमों से अलग आज भी आम फैन तो ऐसे आते हैं कि पूछिए मत। एक बार भोपाल की बात है। मैंने बजाना बंद किया। उसके बाद मैं लोगों से मिल रहा था। एक कॉलेज स्टूडेंट थी। वह  लड़की मेरे लिए इंतजार कर रही थी। जब उसका टर्न आया, तो वह मेरे पास आई। उसकी आंखों में आंसू थे। उसने कहा कि मैंने अपनी जिंदगी में कभी भी शास्त्रीय संगीत नहीं सुना था। यह मेरे जीवन का पहला मौका है। यह वाकई ‘डिवाइन’ है। मेरे पास शब्द नहीं हैं। ऐसे भी लोग मिल जाते हैं। ऐसे बहुत सारे लोग हैं। इसके अलावा, संगीत की तारीफ करने वालों में बहुत बडे़-बडे़ लोग हैं। उनका नाम लेना अच्छा नहीं लगता है। मुझे लगता है कि जब कभी वे अपनी-अपनी कहानी सुनाएंगे और उसमें मेरे संगीत का जिक्र करेंगे, तो वह ज्यादा बेहतर बात होगी।
आज मेरी चिंताएं अलग हैं। मैं इसकी बात भी करना चाहता हूं। कोई भी कला तभी जीवित रहती है, जब उसे आगे करने वाले लोग हों। यह बहुत ही आवश्यक है। संगीत अगर जीवित रहता है, तो गुरु-शिष्य परंपरा में। यह कितने दुर्भाग्य की बात है कि शहनाई में उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के बाद हमें उस घराने से कोई कलाकार नहीं मिला। खान साहब ने शहनाई को कहां से कहां लाकर रख दिया, लेकिन आज अगर आप उनके शिष्यों की बात करने जाएं, तो कोई नाम नहीं मिलेगा। और भी ऐसे कलाकार हैं, जिनके उस दर्जे के शिष्य आगे नहीं दिखाई दे रहे हैं। यह अच्छी स्थिति नहीं है। आप हरिप्रसाद जी को देखिए। उनके कितने शिष्य बजा रहे हैं। उनके बेटे राकेश बहुत अच्छा बजा रहे हैं। राकेश के अलावा उनके बाकी शिष्य भी अच्छा बजा रहे हैं। लेकिन बाकी वाद्यों में शायद ऐसा नहीं हो रहा। कला को आगे बढ़ाना गुरु की भी एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है। ऐसा नहीं कि कला आपके साथ ही चली जाए। पुराने जमाने में ऐसा होता था कि गुरु लोग शिष्यों को बहुत कम सिखाते थे। अगर सिखाते भी, तो अपने घर-परिवार के लोगों को सिखाते थे। बाहर के लोगों को नहीं सिखाते थे। 60-70 साल पहले ऐसी प्रथा थी। लेकिन हम कोशिश कर रहे हैं कि जो भी आए, उसको सिखाएं। 

इस समय मेरे बहुत सारे शिष्य बजा रहे हैं। तरह-तरह के शिष्य हैं। कई लोग हैं, जो ‘परफॉर्मर’ हैं। कई ऐसे हैं, जो सिखाने में अच्छे हैं। कई लोग हैं, जो लाइट म्यूजिक में बहुत अच्छे हैं और फिल्मों में बजा रहे हैं। भारत के बाहर भी बहुत सारे बच्चे हैं, जो बचा रहे हैं। एक गुरु 20-50 बच्चों से लेकर 100-150 बच्चों तक सिखाए, लेकिन उनमें से एकाध शिष्य ही ऐसे निकलते हैं, जो गुरु की शिक्षा को न सिर्फ आत्मसात करते हैं, बल्कि उसमें अपनी तरफ से भी कुछ नया जोड़ते हैं। एक नई खुशबू पैदा करते हैं। ऐसे ही शिष्यों से संगीत आगे चलता है। बहुत से लोग गुरु की ‘जीरॉक्स कॉपी’ बन जाते हैं। वे भी अपनी जगह कुछ दिनों तक चलते रहते हैं। यह साबित करना पड़ता है शिष्य को कि वह किस दिशा में आगे बढ़ा है? उसके लिए मुश्किल यह होती है कि उसका आए दिन गुरु के साथ तुलना होती है। राहुल को लेकर मुझे लगता है कि उसके संगीत में वह बात है कि मुझे खुद कुछ न कहना पड़े। मतलब मुझे कहना पडे़ कि वह बहुत अच्छा बजा रहा है। ये बात लोग कहें। जो अनजान हैं, वे कहें। जो जानकार हैं, वे भी कहें। जो प्रतिद्वंद्वी हैं, वे भी कहें। सभी लोगों ने राहुल के बारे में अच्छी प्रतिक्रियाएं व्यक्त की हैं। यह मेरे लिए बड़े संतोष की बात है। मेरे रियाज के कमरे में सत्य साईं बाबा की तस्वीर लगी है। मैं जीवन में उनके साथ हर पल जुड़ा हुआ हूं। मैंने जब आपको अपनी कहानी सुनानी शुरू की थी, तब कहा था कि तारीफ हमें मिलती है, जबकि वह आती कहीं और से है। मैं सत्य साईं बाबा का ही जिक्र कर रहा था। सब वहीं से आता है।

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  • Web Title:meri kahani hindustan column 23 december