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और फिल्म संगीत पीछे छूट गया

पंडित शिव कुमार शर्मा प्रसिद्ध संतूर वादक

मैं और हरिजी पूरा साल कन्सर्ट में ‘बिजी’ रहते थे। जून-जुलाई का वक्त ऐसा होता था, जब हमारा विदेश दौरा नहीं होता था। इस दौरान गरमी की वजह से भारत में भी कम ही कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे। यशजी अपनी फिल्मों की शूटिंग और रिकॉर्डिंग की तारीखें इस तरह प्लान करते कि संगीत पक्ष पर जून-जुलाई में काम हो। वह हमारे साथ बहुत कोऑपरेट करते थे। एक वक्त ऐसा आया, जब डर  फिल्म की शूटिंग चल रही थी और मुझे अमेरिका के दौरे पर जाना था। यशजी कहने लगे कि पंडितजी, मैं हमेशा आपके साथ कोऑपरेट करता हूं, इस बार आप मेरे साथ कोऑपरेट करिए। हरिजी को भी बोलिए। जहां तक मुझे याद है, वह अक्तूबर का महीना था। मैंने यशजी से कहा कि मेरे लिए बहुत ज्यादा मुश्किल है, अगर मैं आयोजकों को मना करता हूं। बल्कि मेरे ऊपर कानूनी कार्रवाई हो सकती है, क्योंकि मैंने ‘कॉन्ट्रैक्ट’ साइन किया है। खैर, किसी तरह डर का संगीत बना। इसके बाद हमें फिल्म संगीत छोड़ना पड़ा, क्योंकि हमने पहले दिन से ही यह तय किया था जिस दिन शास्त्रीय संगीत और फिल्म संगीत में से एक को चुनना होगा, हम शास्त्रीय संगीत को चुनेंगे। 
यह बात सही है कि वह दौर निकल गया। उस तरह की सोच वाले प्रोड्यूसर-डायरेक्टर अब नहीं रहे। गीत-संगीत को सुनने के मामले में लोगों का ‘टेस्ट’ भी बदला है। मैं यह नहीं कह रहा कि हमारा दौर बेहतर था और आज का दौर बुरा है। बस हमें यह स्वीकार करना होगा कि वक्त बदल गया है। वैसा संगीत नहीं है। आजकल के गाने कई बार एक हफ्ते भी नहीं टिकते। ऐसे में, आप याद कीजिए 80 में सिलसिला  के गानों को या फिर मेरे हाथों में नौ-नौ चूड़ियां हैैं को। आजकल के गानों की बात दस साल बाद तो दूर, दस हफ्ते बाद नहीं होती। मैं यह बात माफी के साथ कह रहा हूं, लेकिन इस माहौल में क्या करिएगा? दूसरी तरफ, हमारा शास्त्रीय संगीत है। मुझे ऐसे कार्यक्रम याद हैं। जहां श्रोता आकर कहते हैं कि वाह साहब, आपका संगीत तो स्वार्गिक आनंद था। लेकिन मुझे आज भी यह महसूस हो जाता है कि कहां पर मुझसे कमी रह गई है। ऐसा अक्सर होता है। 
बदलते जमाने की बात चल रही है, इसलिए दिलीप साहब से जुड़ा एक किस्सा याद आ रहा है। यह किस्सा भी मैं इसीलिए शेयर कर रहा हूं, क्योंकि यह बतलाता है कि वह दौर कैसा था? दिलीप साहब की एक फिल्म आई थी- मशाल।  वह भी यश चोपड़ा साहब की ही फिल्म थी। उस फिल्म में एक सीन था, जिसमें वहीदा रहमान बहुत ही ज्यादा बीमार हैं और बॉम्बे बंद चल रहा है। मैं जो बताने जा रहा हूं, उसमें आप लोगों को दिलीप साहब के दो पहलू नजर आएंगे। उसमें एक लाजवाब सीन था, जब एक असहाय व्यक्ति बार-बार गाड़ी के लिए आवाज लगा रहा है कि कोई अपनी गाड़ी को रोके और वह अपनी बीमार पत्नी को लेकर अस्पताल जा सके। कोई भी अपनी गाड़ी नहीं रोक रहा है। उस सीन में इतना दर्द था कि हॉल में कई लोग रो दिए थे। मैंने भी वह फिल्म देखी। मुझे एक दिन दिलीप साहब मिल गए। मैंने उनसे उस सीन का जिक्र करते हुए पूछा कि उन्होंने कैसे वह सीन किया था? उन्होंने जो बताया, वह जानकर आपको मालूम होगा कि दिलीप साहब को संगीत की कितनी गहरी समझ है और वह कितने जमीन से जुड़े इंसान हैं। उन्होंने कहा- पंडित जी, मैं तो यह सोचता हूं कि जब आप संतूर पर आलाप करते हैं, तो एक नाजुक सुर को आप किस तरह से ले जाते हैं। एक सुर से दूसरे सुर पर जा रहे हैं और तांता टूटता नहीं। ऐसा लगता है कि सांस बंद करके उसको सुना जाए। वह एहसास मैं कभी भूलता नहीं। दिलीप साहब मुझसे पूछने लगे कि पंडित जी आप ऐसा कैसे करते हैं? मैं सोच रहा था कि दिलीप साहब ने कैसे पूरे मामले को पलट दिया। कहां तो मैं उनके सीन की तारीफ करने गया था और कहां उन्होंने पूरी बात पलटकर मेरी तरफ कर दी। कोई और होता, तो कहता- हो जाता है, फलां बात सोचकर वह सीन किया था। या कुछ और। 
ऐसे ही एक बार शशि कपूर मेरे पास आए। कहने लगे पंडित जी, कोई आपसे मिलना चाहता है। मैंने पूछा- कौन? तो बोले अन्नू कपूर। मुझे लगा कि अन्नू शायद सीखना चाहते हैं। लेकिन पता चला कि वह तो मुझसे मिलने के लिए शशि जी से पैरवी कर रहे थे। खैर, अन्नू कपूर जी मेरे पास आए। उन्होंने मेरा बजाया हुआ राग गोरख कल्याण कई बार सुनने की बात कही थी। तब पता चला कि वह संगीत की बहुत अच्छी समझ रखते हैं। 
            (जारी...)

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  • Web Title:meri kahani hindustan column 16 december