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होटल का नल देखा तो देखता रह गया

Sushil Kumar

एक दिन मैं पहलवान न बन पाने की कोच की बात सोचकर दुखी बैठा था, जब सतपाल गुरुजी मेरे पास आए। मुझे रोता देख मेरी पीठ पर हाथ ठोककर उन्होंने कहा कि यह तो वल्र्ड चैंपियन बच्चा है। मैं इतना छोटा था कि मुझे उनकी बात समझ नहीं आई, मगर मैं वह बात जीवन में कभी भूल नहीं सकता हूं। मैं अब कभी-कभार उन्हें इसकी याद दिलाता हूं कि उन्होंने बचपन में ही मेरे वल्र्ड चैंपियन बनने की बात कही थी, तो वह कहते हैं कि उन्हें याद नहीं। अब जब याद करता हूं, तो लगता है कि छत्रसाल स्टेडियम में कितनी मुश्किल से जगह मिली थी। आज भी इस स्टेडियम में बड़ी मुश्किल से ट्रेनिंग करने के लिए जगह मिलती है। इतना बड़ा अखाड़ा है कि हर कोई यहीं आना चाहता है। खैर, कुछ समय बाद वहां जगह मिल गई और मेरा अभ्यास शुरू हो गया।  
1998 में मैनचेस्टर में वल्र्ड कैडेट कोर का मेरा पहला बड़ा टूर्नामेंट था। मुझे मैनचेस्टर जाना था। अखाड़े में हमारे सीनियर्स फ्लाइट से जाने की कहानियां सुनाया करते थे। बताते थे कि फ्लाइट में बड़ा मजा आया था। मुझे भी बड़ा शौक था कि मैं भी फ्लाइट से जाऊंगा। मैं उस समय करीब 15 साल का था। रात की फ्लाइट थी। कई बार होता है कि फ्लाइट के अंदर आप एक ‘गैलरी-डोर’ से सीधे पहुंच जाते हैं। हम लोगों ने फिल्मों में देखा था कि सीढ़ियों से चढ़कर फ्लाइट में अंदर जाते हैं। हमें गैलरी डोर से ही सीधा फ्लाइट में भेज दिया गया। मैं वहां अंदर जाकर बैठा। बैठे-बैठे नींद आ गई और नींद में ही था, तब फ्लाइट उड़ गई। नींद खुली, तो हम मैनचेस्टर पहुंचने वाले थे। मुझे लगा कि फ्लाइट का तो मजा ही नहीं आया। वह मेरा पहला बड़ा टूर्नामेंट था और मैं वहां वल्र्ड चैंपियन बना। मैंने वहां दो बार के वल्र्ड कैडेट चैंपियन को हराया था। उस वक्त तक मुझे पता नहीं था कि मेरे सामने जो रेसलर है, वह कौन है? बाद में जब मैंने उसे हरा दिया, तो मुझे कोच साहब ने बताया कि वह बड़ा पहलवान था। यह जानकर मेरी खुशी सातवें आसमान पर थी। मुझे लगा, अब मैं भी कुछ कर सकता हूं। 
जब मैं विदेश में पहली बार बड़े होटल में रुका, तो हाथ धोने वाला जो वॉश बेसिन था, उसको देखता रह गया। वह नल कैसे खुलेगा, उसके सिस्टम में ही काफी देर उलझे रहे। साथी पहलवानों को कमरे में बुला लिया। पूरा डिस्कशन हुआ कि देख यार, क्या कमाल के नल हैं यहां तो। बाद में वे सारी चीजें हमारे देश में भी आ गईं। जब मैं शुरू-शुरू में विदेश जाता था, तो कमरे से ज्यादा बाहर नहीं निकलता था। मैं हमेशा कोशिश करता था कि जिस काम के लिए गया हूं, उस काम को अच्छी तरह करके वापस आऊं। 
घूमने-फिरने की बजाय मेरी प्राथमिकता आज भी यही रहती है। ऐसे भी टाइम बहुत कम मिलता है। काम खत्म होने के बाद तुरंत घर लौटने की आदत थी। अगर हार गए, तो एरिना में बैठकर कुश्तियां ही देखा करते थे। उन कुश्तियों को देखकर इस बात का आकलन करने की कोशिश करते थे कि आखिर हमने क्या गलती की? क्यों हार गए? ऐसा तो होगा नहीं कि हम हमेशा जीतते ही रहेंगे, इसलिए अपनी गलतियों को समझने के लिए दूसरे पहलवानों के बाउट देखता हूं। आज भी मेरा घूमने-फिरने में मन नहीं लगता है। मुझे याद है कि सतपाल गुरुजी अखाड़े में आते, तो हमेशा कहते थे कि आप लोगों को ओलंपिक मेडल जीतना है। तब हमें पता ही नहीं था कि ओलंपिक मेडल होता क्या है?      
बचपन से ही ईश्वर में मेरी बड़ी आस्था है। बजरंगबली का भक्त हूं। सुबह-शाम अब भी नियमित तरीके से पूजा-पाठ करता हूं। कई बार लगता है कि हर बाउट भगवान भरोसे होती है। जब सामने ‘अपोनेंट’ होता है, तो पता नहीं होता कि कौन-सा दांव कब लग जाएगा? यह अलग बात है कि आपने बड़ी मेहनत की होती है। आप ज्यादा अनुभवी पहलवान हो सकते हो, लेकिन जीतने के बाद शुक्रिया अदा करने के लिए हाथ ऊपर ही जाता है कि मालिक आपने बड़ा आशीर्वाद दिया कि जीत मिली। कई बार तो ऐसा होता है कि लगता है, चमत्कार हो गया। मुझे याद है कि एक बार वल्र्ड चैंपियनशिप में बाउट खत्म होने में सिर्फ 15 सेकंड रह गए थे और मैंने सिर्फ दो सेकंड पहले स्कोर किया। कई बार मैं दो-दो सेकंड पहले हारा भी हूं। सब भगवान भरोसे चलता है। सभी खिलाड़ियों के साथ ऐसा होता है। मैं आज कहता हूं कि कोई ओलंपिक चैंपियन हो या वल्र्ड चैंपियन, अगर बाउट में जाने से पहले आवाज मारकर जाए कि मैं आज नहीं हारूंगा, तो मैं मान लूं। ऐसा संभव नहीं है।     (जारी...)

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  • Web Title:meri kahani coloum of Sushil kumar in Hindustan on 10 May