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जब पढ़ाई ने विवाह से बाल-बाल बचाया

ज्यादातर माता-पिता न बेटियों से कोई उम्मीद रखते थे और न यह चाहते थे कि बेटियां उनसे कोई उम्मीद रखें, तो कोशिश यही रहती थी कि पराए धन को जल्दी से जल्दी सही ठिकाने पर पहुंचा दिया जाए। वैसे भी बेटियों ..

जब पढ़ाई ने विवाह से बाल-बाल बचाया
Monika Minalजानकी अम्मल, भारतीय वैज्ञानिक Sat, 17 Feb 2024 09:22 PM
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तब शिक्षा का बहुत बुरा हाल था, देश में 100 में से 98 महिलाओं के लिए काला अक्षर भैंस बराबर था। न जाने कैसे समाज में यह कुविचार किसी मानसिक महामारी की तरह फैला हुआ था कि बेटियां पराया धन होती हैं, एक दिन उन्हें दूसरे घर चले ही जाना है, तो ऐसे धन को भला कोई क्यों ज्यादा चमकाए-बढ़ाए? ज्यादातर माता-पिता न बेटियों से कोई उम्मीद रखते थे और न यह चाहते थे कि बेटियां उनसे कोई उम्मीद रखें, तो कुल मिलाकर कोशिश यही रहती थी कि पराए धन को जल्दी से जल्दी सही ठिकाने पर पहुंचा दिया जाए। वैसे भी बेटियों के साथ भाग्य का रोना तो जबरन नत्थी किया जाता रहा है। अनेक लोग बहुत गर्व से सुनाते हैं कि अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आंचल में है दूध, आंखों में पानी। 
खैर, केरल की उस लड़की की खुशकिस्मती थी कि उसके सात भाई थे और पांच बहनें। उसने एक-एक बहन को जुदा होते और भाभियों को आते देखा था। हर बार एक ही कहानी दोहराई जाती थी, एक था दूल्हा राजा, एक थी दुल्हन रानी और फिर उनके ढेरों राजकुमार। विवाह होते ही जिंदगी भेड़चाल में घुस जाती थी। भेड़चाल में फंसने से बचने के लिए ही उस लड़की ने मन लगाकर पढ़ाई की। जाति से भी कमतर थी और ऊपर से लड़की, उसकी कौन सुनने वाला था? तब सब यही मानते थे कि शौक है इस लड़की को कुछ किताबों का, पलट लेने दो, आखिर लौटकर गृहस्थी के जहाज पर ही आना है। फिजूल ही विज्ञान पढ़ रही है कि हाइड्रोजन में ऑक्सीजन मिले, तो क्या बनता है; असल में पूरी जिंदगी करना तो यही है न कि चावल-उड़द में कितना पानी मिलाकर अच्छा डोसा बनता है।  
खैर, वह पढ़ती चली गईं। उनकी दूसरी बहनें भी पढ़ने में ठीक थीं, पर किसी ने भी परंपरा से अलग चलने की हिम्मत नहीं दिखाई। चुपचाप जहां विवाह हुआ, वहां चल पड़ीं। इधर, देखते-देखते उस तेज युवती ने वनस्पति विज्ञान अर्थात बॉटनी में स्नातक कर लिया और चुपचाप कॉलेज में पढ़ाने लगीं। कुछ न कुछ करके विवाह को टालती रहीं, पर एक मोड़ ऐसा आया, जब विवाह टालना मुश्किल हो गया, विवाह होते ही नौकरी का छूट जाना तय था। आसपास ऐसी कुछ लड़कियां थीं, जिनसे वादे किए गए थे कि विवाह के बाद भी पढ़ाई या नौकरी करने दी जाएगी, पर उन वादों को गृहस्थी के तेज भंवर के हवाले कर दिया गया। न जाने कितनी लड़कियां अपने टूटे सपनों की चुभन और अफसोस के साथ जिंदगी गुजार देती हैं? क्या फिर यही होगा? पहले विवाह और फिर अंधी भेड़चाल। 
शायद संयोग ही था, निर्णायक मोड़ आ गया। जब वह मद्रास के महिला क्रिश्चियन कॉलेज में कक्षा ले रही थीं, उन्हें यह सूचना किसी वरदान की तरह मिली कि उन्हें प्रतिष्ठित बारबोर छात्रवृत्ति प्राप्त हुई है और उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका जाना है। तब पढ़ाकू युवती की खुशी का ठिकाना नहीं था। अमेरिका के सबसे शानदार शिक्षा संस्थान मिशिगन यूनिवर्सिटी में वनस्पति विज्ञान की पढ़ाई करनी थी। नौकरी वह कर ही रही थीं, अब छात्रवृत्ति ने और मजबूत कर दिया था। उन्होंने परिवार में एलान कर दिया कि पहले पढ़ाई कर लौट आऊं, बाद में विवाह करूंगी। शिक्षा में इतनी शक्ति थी कि कोई उन्हें रोक न पाया। अब यह इतिहास में दर्ज है कि वह युवा वैज्ञानिक जानकी अम्मन बोटनी में पीएचडी करने वाली पहली भारतीय महिला हैं। उन्होंने अमेरिका में ही बैगन की एक नई किस्म विकसित की, जिसका नाम है जानकी ब्रिंजल। भारत लौटकर उन्होंने गन्ना को ज्यादा मीठा बनाने में जोर लगाया और कामयाब हुईं।  
भारत की आजादी के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जानकी अम्मन (1897-1984) को बॉटनिकल सर्वे ऑफ इंडिया के पुनरोद्धार के लिए लंदन से विशेष रूप से आमंत्रित किया। उन्हें पद्मश्री से नवाजा गया। कभी हार न मानने वाली वह अद्भुत विदुषी प्रयोगशालाओं और वैज्ञानिक संस्थाओं की दफ्तरी राजनीति से दूर जंगलों-बगीचों-खेतों में पेड़-पौधों को परखती घूमती रहती थीं। उत्पादन और गुणवत्ता बढ़ाने में दिन-रात लगी रहती थीं। आज भी कई पौधे और फूल खिलते हैं, जिनके साथ जानकी अम्मन नाम जुड़ा है। ब्रिटेन में भी रॉयल हॉर्टिकल्चर सोयायटी के प्रांगण में मैगनोलिया के विशेष सुंदर श्वेत फूल खिलते हैं, जिन्हें देखकर विदेशी वनस्पति वैज्ञानिक भी कह उठते हैं कि जानकी अम्मन की खूबसूरती तो देखो। 
बहरहाल, वह बहुत आगे बढ़ गईं और विवाह की बात बहुत पीछे रह गई। लोग चर्चा करते थे, ‘तेरी उम्र हो गई, विवाह न हुआ, तेरा क्या होगा जानकी?’ इस पर उन्हें दोटूक जवाब मिलता था, ‘दुनिया मुझे मेरे काम से याद रखेगी।’ 
  प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय
 

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