Hindustan My Story Column on June 9 - बेदी ने सिखाया जीतने का हुनर DA Image

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बेदी ने सिखाया जीतने का हुनर

madan lal former cricketer

अमृतसर में हम लोग गांधी ग्राउंड में बहुत से मैच खेलते थे। वहां मैच देखने के लिए दस-पंद्रह हजार लोग इकट्ठा होते थे। एक बार पिताजी मेरा मैच देखने के लिए आए। उस समय दर्शकों के बैठने के लिए आज की तरह ‘स्टैंड’ होते नहीं थे। पिताजी नीचे बैठकर मैच देख रहे थे। मैं आउट होकर सीधे ड्रेसिंग रूम की तरफ चला गया, तो वह नाराज हो गए। कहने लगे कि तुम मुझसे मिलने के लिए क्यों नहीं आए। फिर मैंने उन्हें समझाया कि खिलाडि़यों को ड्रेसिंग रूम की तरफ जाना होता है। हालांकि बाद में मुझे लगा कि उस मैच में मैं चाहता, तो उनसे मिलने जा सकता था, वह मेरा मैच देखने के लिए आए थे। मुझे बड़ा ‘फील’ भी हुआ कि पिताजी को बुरा लगा।

बाद में तो पिताजी कई बार मेरा मैच देखने आए। पुलिस लाइन में जब वह खाना बनाया करते थे, तो पुलिस वाले ही कहते थे कि पंडितजी के बेटे का मैच है, आज इन्हें भी ले जाना। मैं लगातार अच्छा खेल रहा था। पंजाब स्कूल के लिए मेरा चयन हो गया था। उन दिनों सिस्टम था कि इसके बाद नॉर्थ जोन स्कूल में चयन होता था। इसके बाद मैंने नागपुर में अपनी टीम को एक मैच जिताया। उस मैच में मैंने 8-10 चौके लगाए थे। उस मैच में करसन घावरी भी थे। गरमियों के दौरान अमृतसर में हम लोग लीग खेला करते थे। उसमें भी मैंने रन बनाए थे और अच्छी-खासी विकेट ली थीं। विश्वविद्यालय में मैंने तमाम अच्छी ‘परफॉर्मेंस’ दी। ऐसे मैचों में सुनील गावस्कर और ब्रजेश पटेल जैसे खिलाड़ी भी आते थे। इसी के बाद रणजी ट्रॉफी के लिए मेरा नाम आने लगा।

अब मेरे मन में इस बात की इच्छा बहुत मजबूत हो चुकी थी कि मुझे देश के लिए खेलना है। तब स्कूल, घर, ग्राउंड के अलावा कुछ और सूझता नहीं था। घर पहुंचकर मैं चुपचाप सो जाता था। सात-आठ घंटे की अच्छी नींद पूरी करता था। यह ‘रूटीन’ लंबे समय तक चला। फिर वीजी ट्रॉफी में मैंने दो मैचों में 20 से ज्यादा विकेट लीं, जो मेरा रिकॉर्ड था। मैं गांव से था, इसलिए ज्यादा ‘एक्सपोजर’ नहीं था। ज्यादा ‘नो-हाऊ’ नहीं पता था, पर मेहनत थी। उसी की बदौलत मैंने दो साल तक पंजाब से रणजी ट्रॉफी खेली। उसी समय मुझे टाटानगर में नौकरी का ऑफर मिला। मैंने मना कर दिया कि मैं अमृतसर से आकर टाटानगर में नौकरी नहीं कर सकता। उन दिनों अमृतसर से टाटानगर पहुंचने में दो-तीन दिन लग जाते थे। फिर रेलवे की नौकरी ऑफर हुई। मेरी ग्रेजुएशन पूरी नहीं हुई थी, पिताजी ने कहा कि पहले ग्रेजुएशन पूरी कर लो, फिर नौकरी करना।

क्रिकेट के करियर में जिस इंसान ने अनुशासन सिखाया, वह थे बिशन सिंह बेदी। वह किसी तरह का ‘नॉनसेंस’ बर्दाश्त नहीं करते थे। बॉम्बे में एक मैच में मैं 10-12 रन बनाकर आउट हो गया था। उस दिन बहुत गरमी थी, मुझसे भागा ही नहीं जा रहा था। मेरे आउट होने के बाद बेदी ने गुस्से में कहा कि अगर यह मैच हम हारे, तो तुम्हारे लिए अच्छा नहीं होगा। मैं भगवान से मना रहा था, हम जीत जाएं। खैर, वह मैच हम जीत भी गए। वह कहते थे कि जब मुंबई को हराना सीख जाओगे, तब बात बनेगी। मैं चार साल दिल्ली का कप्तान रहा। हमने दो बार रणजी ट्रॉफी जीती।

उस वक्त दिल्ली में ही था, जब यह खबर आई कि मुझे इंडियन टीम के लिए चुन लिया गया है। इसके बाद मैं पिताजी-माताजी का आशीर्वाद लेने के लिए अमृतसर गया। यह 1974-75 की बात है। हमें इंग्लैंड के दौरे पर जाना था। सबसे बड़ी मुसीबत थी इंग्लैंड में बातचीत करना। हमें इंग्लिश समझ ही नहीं आती थी। मैं तो चुप रहता था। बस सुनता था। बॉम्बे, तमिलनाडु के खिलाड़ी इंग्लिश में बात किया करते थे। हम नॉर्थ इंडिया वाले चुपचाप उन्हें देखते रहते थे। छुरी, कांटे से कैसे खाया जाता है, हम देखते थे। हम नकलची हो जाते थे। कभी-कभी इंग्लिश के एकाध शब्द बोलने की कोशिश की भी, तो गलत ही बोला। सुनील गावस्कर बहुत मजाक उड़ाता था हमारा, पर हम कभी बुरा नहीं मानते थे।

हम लोग ट्रेनों से सफर करके खेलने जाया करते थे। पांच-पांच दिन तक ट्रेन का सफर कर रहे हैं। खाने का इंतजाम करने से लेकर अपना बिस्तर बनाने तक, सब खुद ही करते थे। हम लोग रास्ते में कुछ भी खा लिया करते थे। मथुरा के पेड़े खा रहे हैं और आगरा का पेठा। नागपुर में संतरे खाने का किस्सा तो अब भी मुझे याद है। हम लोगों ने नागपुर के संतरों की बड़ी तारीफ सुनी थी। मैच से पहले हम लोग संतरे की मंडी चले गए। वहां संतरे बहुत सस्ते थे। हम बस खाते चले गए। किसने कितने संतरे खाए, होश नहीं। हम लोगों के समय में खिलाड़ी रूम शेयर किया करते थे। हम लोग आपस में बहुत बात करते थे। क्रिकेट बहुत ‘डिस्कस’ होती थी। हम लोगों के समय में खिलाड़ियों की ‘बॉन्डिंग’ जबर्दस्त होती थी।
(जारी...)

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