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Hindi News ओपिनियन मेरी कहानीजब युद्ध में टूटकर बिखर गया मन

जब युद्ध में टूटकर बिखर गया मन

वैसे भी मुसीबतें खुदरा नहीं, थोक में आती हैं। पहाड़ की तरह साथ खड़े पिता जिंदगी की जंग हार गए, सगा पुत्र गंभीर बीमारी में पड़ गया और पत्नी की मानसिक दशा अपनी दिशा भटक गई। फिर तो कुछ भी न बचा, कौन...

जब युद्ध में टूटकर बिखर गया मन
hermann hesse
Monika Minalहरमन हेस, प्रसिद्ध साहित्यकार Sat, 20 Apr 2024 09:36 PM
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यह मानव सभ्यता की नाकामी ही है कि न मन की आग शांत होती है और न युद्ध की आग। रह-रह धधक उठती है और इंसान अपने ज्ञान की तमाम महान पवित्र पोथियों को किनारे रखकर एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं। युद्ध के दिन दिलो-दिमाग से मिटाए नहीं मिटते हैं। उन दिनों भी दुनिया प्रथम विश्व युद्ध में उतरी हुई थी। माहौल ऐसा बन गया था कि लगता था, किसी न किसी दिन सबको लहूलुहान होना पडे़गा। 
वह दुबले-पतले, भावपूर्ण नैन-नक्श वाले लेखक भी युद्ध की आंच से तप रहे थे। जब पास ही आग लगी हो, तो हाथ पर हाथ धरे बैठा नहीं जा सकता। यूरोप के ज्यादातर कवि, लेखक भी देश के लिए बंदूक थाम चुके थे। कुछ युवा लेखकों की जंगी मोर्चे पर जान भी चली गई थी। सभी पर युद्ध में जाकर दो-दो हाथ करने का गजब दबाव था। इस लेखक ने भी अपना नाम इंपीरियल सेना में बहाली के लिए लिखवा लिया, पर उस नाजुक मन रचनाकार को युद्ध लड़ने के अयोग्य पाया गया। उन्हें युद्धबंदियों की देखभाल से जुड़ी सेवा में लगा दिया गया। ऐसा लगता था कि दुनिया अब लड़कर खत्म हो जाएगी। कवियों के बीच भी बहुत नफरत पसर गई थी। उन्हीं दिनों इस नफरत के खिलाफ इस लेखक ने एक लेख लिखा। उन्होंने सबको समझाया कि राष्ट्रवादी पागलपन और नफरत की खाई में ऐसे न गिर जाइए कि फिर निकलना मुमकिन न हो। नफरत से बड़ा है प्यार, क्रोध से बड़ी है समझ और युद्ध से महान है शांति! 
दुर्भाग्य, कोई समझ न पाया। लेखक बिरादरी दुश्मन हो गई और मीडिया शब्दबाण बरसाने लगा। खूब धमकियां मिलीं। लेखक का घर से निकलना दूभर हो गया, उन्होंने अपने भारत प्रेमी मित्र लेखक रोमां रोलां को पत्र लिखा, ‘मित्र, सियासी मामलों में प्यार आजमाने की मेरी कोशिश नाकाम हो गई।’ 
निर्णायक पल था, दिल बिखर गया, अवसाद ने अपने भंवर में लपेट लिया। वैसे भी मुसीबतें खुदरा नहीं, थोक में आती हैं। पहाड़ की तरह साथ खड़े पिता जिंदगी की जंग हार गए, सगा पुत्र गंभीर बीमारी में पड़ गया और पत्नी की मानसिक दशा अपनी दिशा भटक गई। फिर तो कुछ भी न बचा, कौन संभालता? मन इतना डगमगाया कि मस्तिष्क ने जवाब दे दिया और लेखक का शरीर एक मनोरोगी उपचार केंद्र पहुंचा दिया गया। एक अच्छे लेखक के बारे में लगभग घोषणा ही हो गई कि उसे युद्ध की आंधी उड़ा ले गई। पढ़ना-लिखना बिला गया, पर सौभाग्य की बात थी कि उन्हें मनोचिकित्सकों ने बहुत सहारा दिया। जो अच्छी चीजें उनके अंदर सूख चुकी थीं, उन्हें फिर हरा-भरा करने की कोशिश धीरे-धीरे रंग लाने लगी। किसी भी तकलीफ या किसी एक हार पर दुनिया खत्म नहीं होती। सुख, दुख, भोग, योग, संयम, त्याग, उपवास की ओर मन बहने लगा। निर्लिप्तता का एहसास बढ़ने लगा। दुख के बादल भी ओझल होने लगे। धर्म चिंतन ने तमाम कष्टों और असुरक्षा बोध की गहरी गुफा से बाहर ला खड़ा किया। सनातन धर्म के साथ-साथ गौतम बुद्ध बार-बार याद आने लगे। लेखक महोदय कुछ वर्ष पहले जर्मनी से श्रीलंका तो आए थे, पर भारत आने से पहले बीमार पड़ गए थे और स्वदेश लौटना पड़ा था, पर भारत के पास से गुजरते हुए इस मोक्ष-भूमि के प्रति प्रेम का बीज उनके मन में पहले से पड़ा हुआ था, वह अंकुरित हो गया। उन्होंने भारतीय दर्शन और बुद्ध को आधार बनाकर एक उपन्यास की रचना की, नाम रखा- सिद्धार्थ। भोग में भी योग खोज लेने की कला के साथ ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का जो ज्ञान उन लेखक महोदय को हासिल हुआ था, उसने कमाल कर दिया। साहित्य की दुनिया में जब सिद्धार्थ  का आगमन हुआ, तब विश्व युद्ध बीत चुका था और दुनिया विकास की नई लहर से पुलकित हो रही थी। दुनिया ने अपने एक महान लेखक हरमन हेस को भारतीयता से ओत-प्रोत नई रोशनी में देखा-पहचाना। 
सिद्धार्थ लिखने के बाद हरमन न जाने कितनी वर्जनाओं और उलझनों से एक झटके में उबर गए, तो फिर घर न लौटे। उन्होंने पुराने जीवन के कारागार को तोड़ दिया और स्विटजरलैंड में जा बसे। दुनिया को एक से बढ़कर एक कृतियों से संपन्न बनाया और साहित्य के सर्वश्रेष्ठ सम्मान नोबेल से नवाजे गए। 
अकेले अमेरिका में इस उपन्यास की पचास लाख से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं। गौर कीजिए, हरमन हेस (1877-1962) ने यह पुस्तक अपने भारत प्रेमी मित्र रोमां रोलां के नाम समर्पित की थी। जी वही रोमां रोलां, जिन्होंने कभी कहा था, ‘यदि पृथ्वी पर कोई एक जगह है, जहां जीवित मनुष्यों के सभी सपनों को शुरुआती दिनों से ही घर मिला हुआ है, जब मनुष्य ने अस्तित्व का सपना देखना शुरू किया था, तो वह भारत है!’
  प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय