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क्लास में पीछे की बेंच पर सोना

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मेरा ज्यादातर बचपन नानी के यहां बीता। जब मैं पैदा हुआ, उस समय मेरे पिता पुरानी दिल्ली में अपना बिजनेस सेटअप करने की कोशिशों में लगे हुए थे। बिजनेस का शुरुआती दौर था, इसलिए तमाम चुनौतियां भी रही होंगी। घरवाले नहीं चाहते थे कि मेरा बचपन उन चुनौतियों को देखने या महसूस करने में बीते, इसलिए उन्होंने मुझे मेरी नानी के यहां करोलबाग भेज दिया। नानी के यहां मेरी उम्र के बहुत बच्चे थे, इसीलिए मेरा मन भी वहां लगता था। वहीं पर खेलकूद की शुरुआत हुई। मेरा सबसे पहला बैट कपड़े धोने वाली थापी थी, जिससे पीट-पीटकर कपड़े धोए जाते हैं। उसी थापी से मैं क्रिकेट खेला करता था। यानी मैंने भी क्रिकेट उसी तरह शुरू की थी, जैसे कोई आम बच्चा करता है। मुझे याद है, पहले गलियों में और फिर घर के सामने एक पार्क था, उसी में मैं क्रिकेट खेला करता था।

गरमियों की छुट्टियां चल रही थीं। एक दिन मम्मी ने आकर कहा कि पार्क में खेलने से अच्छा है कि किसी एकेडमी में जाकर खेलो। घर के पास जो स्कूल था, उसमें प्लेमेकर्स क्रिकेट एकेडमी चलती थी। मैंने वहीं जाकर खेलना शुरू कर दिया। गरमियों की छुट्टियां तो बीत गईं, लेकिन क्रिकेट का शौक और बढ़ गया। फिर घरवालों को लगा कि मैं थोड़ा और ढंग से एकेडमी में जाऊं। पूरे तीन घंटे अभ्यास करूं। इस तरह क्रिकेट सीखने का नियमित सिलसिला शुरू हो गया। उस वक्त मेरी उम्र कोई 10-11 साल रही होगी, जब मैंने प्लेमेकर्स क्रिकेट एकेडमी में क्रिकेट खेलने की शुरुआत की थी।

मैं क्रिकेट खेल पाया, तो सिर्फ अपने घरवालों की वजह से, क्योंकि वे बहुत ‘सपोर्ट’ करते थे। कई बार ऐसा होता है कि माता-पिता इसलिए डांटते हैं, क्योंकि खेल पढ़ाई पर हावी होने लगता है, लेकिन मेरे घरवालों ने कभी यह नहीं कहा कि सिर्फ पढ़ाई करो और खेलो मत। उन्होंने हमेशा यही कहा कि जहां तक खेलना चाहते हो, खेलो। बस पढ़ाई के साथ खेल का ‘बैलेंस’ सही तरीके से बनाकर रखो। मुझे नहीं याद आता कि मुझे कभी खेलने के लिए डांट पड़ी हो। कई बार ऐसा भी हुआ कि शाम को मैं खेलकर देरी से घर लौटा और घरवालों ने डांटा नहीं। हां, कभी-कभार डांट पड़ी, तो इस बात पर कि सिर्फ खेलने पर दिमाग मत लगाओ, क्योंकि घरवाले पहले ही समझा चुके थे कि खेल के साथ-साथ पढ़ाई भी जरूरी है।

यह मेरी किस्मत थी कि मैं मॉर्डन स्कूल में गया। वहां खेलकूद की बेहतरीन सुविधाएं थीं। बेहतरीन ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर’ था। इसी कारण से मैं आगे खेल भी पाया। अगर स्कूल में मुझे खेलने की अच्छी सुविधाएं न मिली होतीं, तो शायद क्रिकेट मेरा ‘पैशन’ या ‘प्रोफेशन’ न बन पाता। ऐसा भी नहीं है कि मैं स्कूल में सिर्फ क्रिकेट खेलता था, बल्कि स्कूली दिनों में मैं सारे ‘स्पोट्र्स’ खेलता था, क्योंकि अव्वल तो खेलने में मुझे मजा आता था, फिर वहां सुविधाएं बहुत अच्छी थीं। मैंने स्कूल के दिनों में बैडमिंटन, टेनिस, हॉकी और फुटबॉल भी खेला है। मॉर्डन स्कूल में स्पोट्र्स ‘कंपलसरी’ हुआ करता था, जिसका फायदा अब समझ में आता है। 

मैं 10-11 साल की उम्र से ही क्रिकेट में इतना ‘इनवॉल्व’ हो गया था कि बचपन की शरारतों से दूर ही रहा। एकाध बार बचपन में बच्चों को परेशान करने के लिए उनकी पैंट में ‘च्युइंगगम’ जरूर चिपकाया है, लेकिन ऐसा भी नहीं कि बस मैं यही करता था। छोटी-मोटी शरारतों को छोड़ दें, तो स्कूल और मेरे दोस्त मेरे लिए हमेशा बहुत ‘महत्वपूर्ण’ रहे। परिवार के बाद अगर मुझे स्कूल का ‘सपोर्ट’ नहीं मिला होता, तो मैं कभी क्रिकेट को अपना ‘प्रोफेशन’ नहीं बना पाता। बात चाहे मेरे टीचर्स की हो, स्कूल के दोस्तों की या फिर मेरे प्रिंसिपल की। हर किसी ने मुझे जमकर ‘सपोर्ट’ किया। यह ‘सपोर्ट’ ‘होमवर्क’ से लेकर इम्तिहान के दिनों तक में मिलता था।

जब मैं अंडर-16 खेल रहा था, तो पढ़ाई के लिए बिल्कुल वक्त नहीं मिलता था। मुझे याद है कि मेरी क्लास टीचर ने मेरे साथ के बच्चों को यह जिम्मेदारी सौंपी थी कि स्कूल के बाद शाम को गौतम से मिलकर उसे बताया करो कि स्कूल में क्या-क्या पढ़ाया गया है। मेरे दोस्त ऐसा करते भी थे। कई मौके ऐसे भी आए, जब मैं कड़ी प्रैक्टिस के बाद थककर क्लास में पहुंचता था और मेरे चेहरे पर थकान दिख रही होती थी, तो टीचर कहती थीं कि तुम जाकर पीछे की बेंच पर सो जाओ। पूरी क्लास के बच्चे पढ़ रहे होते थे और मैं पीछे सो जाता था। इस तरह का ‘सपोर्ट’ बहुत जरूरी भी होता है। टीचर को भी पता होता था कि मैं सुबह छह बजे से प्रैक्टिस करने के बाद उनकी क्लास में गया हूं। कई बार पूरे-पूरे हफ्ते ऐसा ही होता था। कई बार मैच खेलकर सीधा स्कूल जाता था, तो स्कूल की सभी टीचर हर तरह का ‘सपोर्ट’ करते थे कि मैं ‘कंफर्टेबल’ रहूं। 
(जारी)

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  • Web Title:Hindustan Meri Kahani Column on June 23