फोटो गैलरी

अगला लेख

अगली खबर पढ़ने के लिए यहाँ टैप करें

Hindi News ओपिनियन मेरी कहानीएक क्रिकेटर जो कभी भाग्य पर नहीं रोया

एक क्रिकेटर जो कभी भाग्य पर नहीं रोया

लेंस लगने से समस्या यह हो गई कि सामने से आती एक गेंद दो दिखने लगती थी। लगता था, छह-छह इंच के अंतर पर दो-दो गेंदें चली आ रही हैं। गौर किया, तो पाया कि दो गेंदों में से बाहर वाली गेंद भ्रम है और अंदर.

एक क्रिकेटर जो कभी भाग्य पर नहीं रोया
Monika Minalमंसूर अली खान पटौदी, पूर्व क्रिकेट कप्तानSat, 25 May 2024 11:40 PM
ऐप पर पढ़ें

लेंस लगने से समस्या यह हो गई कि सामने से आती एक गेंद दो दिखने लगती थी। लगता था, छह-छह इंच के अंतर पर दो-दो गेंदें चली आ रही हैं। गौर किया, तो पाया कि दो गेंदों में से बाहर वाली गेंद भ्रम है और अंदर वाली की ही बल्ले से धुनाई करनी है।
कई लोग छोटी-छोटी बात पर हार मान बैठते हैं। भाग्य को कोसने लगते हैं। कुछ लोगों में तो हर बात पर हाय-हाय करने की आदत पाई जाती है। ऐसे लोगों को राई भर कष्ट हो, तो उसका पहाड़ बनाकर पेश कर देते हैं, पर कुछ लोग होते हैं, जो पहाड़ समान समस्या को भी राई मानकर मंजिल की ओर बढ़ चलते हैं। 
ऐसा ही उस क्रिकेटर के जीवन में भी हुआ। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की टीम की ओर से खेलने वाले इस युवा ने दिन भर जी-जान से क्षेत्ररक्षण किया था। उस सुहानी शाम को सभी खिलाड़ी स्टेडियम से लौट रहे थे। होटल बस तीन सौ गज दूर था। पांच खिलाड़ियों के समूह में से तीन ने फैसला किया कि पैदल चल पड़ते हैं, पर इस युवक ने तय किया कि विकेटकीपर रोबिन वाटर्स कार चला ही रहे हैं, तो उनके साथ ही चला जाए। कार चंद गज आगे बढ़ी ही थी कि सामने से एक कार काफी तेेज गति से आकर भीड़ गई। बचने के लिए युवक ने दाहिना कंधा आगे कर दिया, जिस पर सामने से शीशा आ टकराया। रोबिन को भी खरोचें आईं, पर लगा कि बड़ा हादसा गुजर गया, कुछ न हुआ। दर्द था, पर कमजोर लोग ही रोया करते हैं। मन जोर-जोर से समझा रहा था, कोई बात नहीं, कुछ नहीं हुआ। युवा को सिर्फ यही चिंता थी कि यूनिवर्सिटी का मैच कहीं छूट न जाए? सामने वाली टीम को हराना ही है, अपने पिता क्रिकेटर का रिकॉर्ड सामने दिख रहा था। शायद यह चालू मैच छूट जाएगा, तो क्या हुआ? यह दुर्घटना गंभीर नहीं है। जान बच गई, तो सब सलामत।
खैर, एंबुलेंस आई और जब आंख अस्पताल में खुली, तो बताया गया कि आपकी दाहिनी आंख का तत्काल ऑपरेशन कराना होगा। कांच का एक छोटा टुकड़ा आंख में जा घुसा है। खैर, शल्य चिकित्सक को घर से बुलाकर ऑपरेशन किया गया। इलाज चला, चिकित्सक ने कहा, दायीं आंख में कांटेक्ट लेंस लगाना होगा, उससे 90 प्रतिशत रोशनी लौट आएगी। यहां भी युवक ने हार नहीं मानी। चंद सप्ताह बाद ही मैदान पर उतर आया। लेंस लगने से समस्या यह हो गई कि सामने से आती हुई एक गेंद दो दिखने लगती थी। लगता था, छह-छह इंच के अंतर पर दो-दो गेंदें चली आ रही हैं। गौर किया, तो पाया कि दो गेंदों में से बाहर वाली गेंद भ्रम है और अंदर वाली की ही बल्ले से धुनाई करनी है। खास यह भी कि तब दायें हाथ से गेंद फेंकना दुश्वार था, गेंद फेंकते ही कंधा दर्द से चटकने लगता था। 
इतना होने पर भी उस क्रिकेटर ने एक पल के लिए भी नकारात्मक नहीं सोचा। यह कभी नहीं सोचा कि अब नहीं खेल पाऊंगा। वह अपने देश लौट आया, पर अभ्यास में कोई कमी नहीं छोड़ी। सामने से आने वाली दो गेंदों की समस्या को खत्म करने के लिए एक ही आंख से देखकर खेलना शुरू किया। हेलमेट का जमाना नहीं था, तो टोपी ही ऐसे पहनने लगे कि दायीं आंख ढक जाती थी। लोग सोचते थे, पटौदी के नवाब साहब स्टाइल मार रहे हैं। खैर, एक आंख के जोर पर ही चौके-छक्के शुरू हुए, लोग उनका खेल देख रुक जाते थे, तो पता चलता था कि नवाब साहब मंसूर अली खान पटौदी खेल रहे हैं। पहले क्षेत्ररक्षण को ज्यादातर खिलाड़ी कमतर काम मानते थे, पर नवाब साहब ने क्षेत्ररक्षण को जिंदा कर दिया। मैदान में सबसे कठिन जगह कवर पर वह क्षेत्ररक्षण करते थे और किसी बाघ की तरह गेंद पर झपटते थे, तो नाम पड़ गया, टाइगर पटौदी।
चूंकि किसी भी तरह के भय, निराशा से वह दूर थे, इसलिए उनका नेतृत्व किसी उदासीन टीम को भी चपलता से भर देता था। उन्होंने भारतीय टीम में चुने जाने के बाद भी ऐसा ही किया। छह टेस्ट खेलने वाले टाइगर पटौदी (1941-2011) को कप्तानी दी गई, तब उनकी उम्र थी 21 साल। वह जितने अच्छे बल्लेबाज थे, उससे कहीं अच्छे क्षेत्ररक्षक और उससे कई गुना अच्छे कप्तान थे। उन्होंने अपनी सुदर्शन उपस्थिति से भारतीय क्रिकेट का चेहरा बदल दिया। चालीस टेस्ट में वह भारत के कप्तान रहे। उन्होंने जब शतक जड़ा, तब इंग्लैंड के खिलाफ भारत को पहली शृंखला में जीत मिली। सदा नवोन्वेषी, गरिमामय, हंसमुख, शांति और बुद्धिमत्ता से भरपूर टाइगर पटौदी ने इंग्लैंड के खिलाफ भारत का पहला दोहरा शतक भी लगाया। भारत को विदेश में पहली जीत उन्हीं के नेतृत्व में मिली। उनके नेतृत्व में ही भारत ने पहली बार वेस्टइंडीज को हराया। 
आज जब फटाफट क्रिकेट का दौर है, तब अपने जमाने में टेस्ट में छह शतक लगाने वाले पटौदी को अक्सर याद किया जाता है और कहा जाता है कि वह दोनों आंखों से देखते हुए खेल पाते, तो न जाने कितनी ऊंचाई पर पहुंचते। लोगों को भले अफसोस हो, पर टाइगर पटौदी के शब्दकोश में यह शब्द नहीं था। उन जैसा कप्तान आज भी भारतीय टीम खोज रही है।
  प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय
 

Advertisement