फोटो गैलरी

अगला लेख

अगली खबर पढ़ने के लिए यहाँ टैप करें

Hindi News ओपिनियन मेरी कहानीएक दिन अचानक चले गए दादा जी

एक दिन अचानक चले गए दादा जी

मुख्य शहर से कुछ दूर दादा जी ने घर ले रखा था; शांत, बाग-बगीचे-आंगन से भरपूर। हर जगह किताबें रहती थीं, पहरेदार की तरह और पुस्तकालय तो मानो अनमोल टकसाल था, जहां हर किसी को जाने की इजाजत नहीं थी...

एक दिन अचानक चले गए दादा जी
octavia paz
Pankaj Tomarओक्ताविओ पाज, नोबेल विजेता साहित्यकारSat, 30 Mar 2024 10:26 PM
ऐप पर पढ़ें

जब मैक्सिको बड़ी समस्याओं से गुजर रहा था, तब पिता अक्सर सफर पर रहते थे। वह दौर ऐसा था, जब हर पत्रकार-बुद्धिजीवी देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी दिलोजान से समझता था। भारत में कबीर तो बहुत पहले ही बोल गए थे, ‘जो घर फूंके आपणा, चले हमारे साथ।’ तो उस बच्चे के पिता भी घर से निकल जाते थे, अक्सर, देश की पुकार पर और पीछे देख-रेख के लिए रह जाते थे दादा। उस लड़के को दादा का ही स्नेह नसीब हुआ था। दादा भी कोई मामूली इंसान नहीं थे, देश के लिए दुश्मन सेना से जंग में दो-दो हाथ कर चुके थे, पर उनका मूल कार्य तलवार चलाना नहीं था, वह कलम के सच्चे सिपाही थे। अनेक पुस्तकों की रचना कर चुके थे। घंटों पढ़ते थे और घंटों लिखते थे। उन्होंने दुनिया-जहान की न जाने कहां-कहां की किताबों का जखीरा संजोए रखा था। दादा का पोते पर असर हो चुका था, पर गंभीरता नहीं आई थी। इतना तो एहसास था कि किताबें हैं, पर किताबों में कितनी गहराई है, इसका अंदाजा नहीं था। 
कहा जाता है, बडे़ खुशनसीब होते हैं वे बच्चे, जिनके आसपास किताबें रहती हैं, वरना ज्यादातर बच्चों का बचपन तो रोटी-दाल के लिए तरसते बीत जाता है। मुख्य शहर से कुछ दूर दादा जी ने घर ले रखा था; शांत, बाग-बगीचे-आंगन से भरपूर। हर जगह किताबें रहती थीं पहरेदार की तरह और पुस्तकालय तो मानो अनमोल टकसाल था, जहां हर किसी को जाने की इजाजत नहीं थी। उस बच्चे को भी वहां जाने से रोका जाता था, जहां किताबों की रहस्यमय दुनिया गुलजार थी। वह बच्चा दस साल का हुआ ही था कि दादा जी की जिंदगी की किताब अचानक बंद हो गई। उनकी आंखें एक घड़ी पर ठिठक गईं, एकटक वह देखे जा रहे थे या देखने का एहसास करा रहे थे या देखते-देखते ही जाते हुए आंखें बंद करना भूल गए थे। मतलब वह अभी भी बहुत कुछ देखना चाहते थे। 
उस बच्चे को बताया गया कि दादा जी हमेशा के लिए चले गए। उस बच्चे ने गौर से देखा और समझने की कोशिश करने लगा कि दुनिया से जाना आखिर क्या होता है। दादा तो आंखें भी बंद करना नहीं चाहते थे, पर मौत उन्हें ले गई, मौका ही नहीं दिया। मौत आखिर क्यों मौका नहीं देती? पहले दादा कहीं जाते थे, तो उनके साथ कोई जरूर जाता था, पर इस बार कोई न गया। जब दादा नहीं हैं, तो कितना विशाल सन्नाटा छूट गया है, उसे कौन भर पाएगा? पिता साथ होते, तो शायद बच्चे को संभाल लेते, पर वह कहीं दूर रह गए थे। दादा के जाने से जो दुख घनीभूत हुआ, वह बच्चे के मन-मस्तिष्क में बरसने लगा। उसके पांव दादा के विशाल पुस्तकालय की ओर अनायास बढ़े कि शायद किताबों में कहीं दादा को खोजा जा सकेगा। सहारे की खोज में ही वह बच्चा किताबों की ओर गया और वहीं दुनिया के एक महान कवि-साहित्यकार ओक्ताविओ पाज के रूप में तैयार हुआ।  
पाज की रचनाओं में मृत्यु की विशालता किसी सागर की तरह हिलोरें लेती है। मृत्यु उनके लिए सदैव प्रेरणा स्रोत रही। वह अक्सर कहते थे, ‘मृत्यु में मैंने भाषा की खोज की।’ दादा की मृत्यु का वह पल उनकी रचनाओं में अनेक जगह आया। उनकी कुछ पंक्तियों का भाव देखिए, ‘एक दरवाजे से लेकर मरने तक, बहुत कम जगह है और मुश्किल से ही इतना समय मिलता है कि बैठ सकें, अपना सिर उठा सकें, घड़ी देख सकें और महसूस कर सकें : आठ पंद्रह बज गए हैं। ...शायद हम सिर्फ इसलिए मरते हैं, क्योंकि कोई हमारे साथ मरना नहीं चाहता, कोई हमारी आंखों में आंखें डालकर देखना नहीं चाहता।’
ओक्ताविओ पाज को पूरी दुनिया सुनना और पढ़ना चाहती है। उनकी रचनाओं की मिठास मनुष्यता को संपन्न बनाती है। वह पूछते हैं, क्या जीवन को कविता बनाने के बजाय जीवन को कविता में बदलना बेहतर नहीं होगा? क्या कविता का प्राथमिक मकसद कविताओं के निर्माण के बजाय काव्यात्मक क्षणों का निर्माण नहीं हो सकता?’ अतियथार्थवाद, अस्तित्ववाद और रूमानियत से सराबोर यह कवि आगे चलकर दुनिया के सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार नोबेल से सम्मानित हुए। 
ओक्ताविओ पाज के दौर में कवि भी देशों के राजदूत नियुक्त हुआ करते थे। वह भारत में मैक्सिको के राजदूत रहे। पूरे छह साल भारत में गुजारे और भारत उनके अंदर उतर गया। भारत से प्रभावित उनकी एक कविता की पंक्तियां देखिए, शिव और पार्वती : / हम तुम्हें पूजते हैं/ देवताओं की तरह नहीं,/ बल्कि मनुष्य में देवत्व की/ प्रतिमाओं की तरह। 
31 मार्च को जन्मे पाज (1914-1998) ने भारत की किसी सुंदर सहज सुबह को याद करते हुए लिखा था, मैं मलता हूं अपनी आंखें/ आकाश जमीन पर उतरता है।
      प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय