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22 जनवरी, 2021|12:19|IST

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गमगीन जिंदगी और तीस सेकंड

वह मंच पर कूदकर अवतरित हुई और दोनों पैरों को थोड़ा फैलाकर कमर पर दोनों हाथ रख हंसती हुई खड़ी हो गई। उसने आगे देखा, मंच से नीचे आगे की पंक्ति में बैठे निर्णायक आपस में बात करते दिखे, ऐसा लगा कि सबने नजरंदाज कर दिया। तभी मुख्य निर्णायक या जूरी अध्यक्ष की आवाज गूंजी, ‘इसे रोको, रोको। बस काफी है। धन्यवाद, मिस। नेक्स्ट प्लीज’। मतलब, महज 30 सेकंड में उस लड़की को मंच से हटने के लिए कह दिया गया। वह 18 साल की लड़की एकदम से तनाव में आ गई, यह क्या? मेरा एक्ट पूरा देख तो लेते, मौका ही नहीं दिया, ‘एंट्री’ करते ही ‘स्टॉप’ कह दिया। ऑडिशन में फेल? अब क्या होगा? वह बिना परिणाम जाने हैरान-परेशान सड़कों पर निकल पड़ी। ऑडिशन की कितनी तैयारी की थी, मंच पर खिलंदड़ अंदाज में एंट्री करते हुए सोचा था, सबको चौंका देगी कि लो मैं आ गई, मुझे देखो तो सही। लेकिन यहां तो मंच पर आते ही ‘नेक्स्ट प्लीज’ सुनने को मिल गया। क्या गलती हो गई?
जूरी ने मेरा पूरा संवाद तक न सुना। उन्होंने यह भी नहीं माना कि मैं सुनने लायक हूं। अब मैं फिर कभी अभिनेत्री बनने के बारे में नहीं सोच सकती। ऑडिशन एक अच्छा मौका था, 16वें स्थान पर उसे मौका मिला था, तैयारी का भी पूरा समय मिला था, पर सारी मेहनत धुल गई। उदासी के उन क्षणों में वह सीधे समुद्र तट पर चली गई। वह बंदरगाह का इलाका था, समुद्री चिड़िया यानी सीगल की आवाज हवा में गम घोल रही थी। लड़की के दिमाग में एक ही उपाय उमड़ रहा था, अभी खुद को इसी पानी के हवाले कर दूं कि किस्सा खत्म हो जाए। ख्वाब तो ख्वाब ही रहेगा, जब साकार नहीं होना है, तो जीकर क्या करना है? लेकिन हिम्मत न हुई। देखो, यहां पानी गंदा है, जब डूबने के बाद निकाला जाएगा, तो गाद में लिपटी मैं कैसी दिखूंगी? काफी देर वहीं तट पर गमगीन टहलने के बाद वह तेजी से चलती अपने डेरे तक आई। इंतजार कर रही दो चचेरी बहनों ने आते ही पूछा, बड़ी देर लगा दी, क्या हुआ? 
लड़की के पास देने लायक जवाब न था, तो वह और तेज कदमों से अपने कमरे में आई और खुद को बिस्तर के हवाले कर दिया। फूटकर रोने लगी। मेरा कौन है? चाचा ने बड़ी मुश्किल से एक ऑडिशन की इजाजत दी थी और वादा लिया था कि फेल हुई, तो अभिनेत्री बनने का भूत हमेशा के लिए सिर से उतारना पडे़गा। आज अगर पापा होते, तो ऑडिशन के और मौके मिलते और मम्मी होतीं, तो अपने गले से लगा लेतीं, ढांढस बंधातीं। जब मैं दो-तीन साल की थी, तभी मम्मी क्यों छोड़ गईं? और पापा ने ही तो सपने संजोए थे, पापा कैमरा लिए साथ लगे रहते थे। शहर में कोई ऐसी लड़की नहीं थी, जिसकी इतनी तस्वीर खींची जाती हो। फोटोग्राफर पिता हर मौके पर फोटो लेते थे, थियेटर ले जाते थे, फिल्में दिखाते थे। लगातार कुछ न कुछ सिखाते रहते थे, पर वह 13 की हुई थी कि बीमार पिता ने भी हाथ छुड़ा लिया। फिर एक चाची ने सहारा दिया, लेकिन उनका साया भी छह महीने में ही उठ गया। कोई लड़की इतनी बदकिस्मत भी होती है क्या? अब एक चाचा ने आश्रय दिया है, लेकिन वह मेरे ख्वाब के खिलाफ हैं। अभिनय को सम्मानित पेशा नहीं मानते, बमुश्किल एक मौका उन्होंने दिया था कि जा किस्मत आजमा ले, लेकिन यहां भी निराशा हाथ लगी। अब वह क्या करेगी? 
रो-रोकर बुरा हाल था, लेकिन तभी एक दोस्त का फोन आया, और बहनों ने बात करके बताया कि ऑडिशन थियेटर पर सफेद लिफाफा तुम्हारा इंतजार कर रहा है। वह बिस्तर से उछलकर खड़ी हुई। तेजी से सीढ़ियां उतरकर मानो उड़ चली। कदम थियेटर पहुंचकर ही थमे। वह ऑडिशन पास कर गई थी, कैसे? यह पूछने की हिम्मत नहीं पड़ी, बस सफलता का सफेद लिफाफा लिए ऐसे चल पड़ी कि जिंदगी में कभी पीछे पलटकर नहीं देखना पड़ा। 
नाटक और फिल्मों में काम का सिलसिला चल पड़ा। वह बला की खूबसूरत बेहद सम्मानित-पुरस्कृत अभिनेत्री इंग्रिड बर्गमन (1915-1982) दुनिया में किसी पहचान की मोहताज नहीं रहीं। जिंदगी खुशियों से भर गई, लेकिन वह दुखद लम्हा बार-बार दिमाग में आता था। एक बार रोम में उस ऑडिशन जूरी में शामिल एक सदस्य से उन्होंने पूछ ही लिया, ‘मुझे बताइए, क्यों पहले ऑडिशन में आप सभी ने मेरे साथ इतना बुरा बर्ताव किया था? पता है, मैं आत्महत्या कर सकती थी? मुझे इतना नापसंद किया कि महज 30 सेकंड में खारिज कर दिया’। जवाब मिला, ‘प्यारी लड़की, तुम पागल हो? तुम आत्मविश्वास से भरी जैसे ही मंच पर छलांग लगाकर एक बाघिन की तरह आई, हमने एक-दूसरे से कहा, समय बर्बाद मत करो, इसे तत्काल चुन लो’। 
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय

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  • Web Title:hindustan meri kahani column 29 november 2020