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पढ़ने के हठ से निकली राह

संघर्ष भले ही जितने हों, पर जीवन में एक ऐसा मोड़, एक ऐसा लम्हा आता है, जो कुछ लोगों को सीधे कामयाबी की मंजिल तक ले जाता है। दुनिया बदल देने वाले लोगों के ऐसे ही लम्हे पर हम एक नया स्तंभ शुरू कर रहे हैं। इसकी पहली कड़ी में महान वैज्ञानिक मैरी क्यूरी की कथा।

वहां बचपन भी बहुत मुश्किलों से घिरा था। रूस के जार शासन में गुलाम पोलैंड के उस निर्मम दौर को याद कर दुनिया की महान वैज्ञानिक मैरी क्यूरी अर्थात मारिया स्लॉडोस्का सिहर जाती थीं। 7 नवंबर, 1867 को वारसॉ में जन्मी मारिया शिक्षक पिता स्लॉडोस्की की पांचवीं संतान थीं। पहले बड़ी बहन की मौत हुई, उसके दो वर्ष बाद मां मैडम स्लॉडोस्का चल बसीं। यह 10 वर्षीय मारिया के लिए जीवन का पहला त्रासद समय था। तब दुखों के बड़े सागर में उनके पास एकमात्र नैया थी- शिक्षा। वह हाईस्कूल टॉपर हुईं, हालांकि यह सुख ज्यादा टिका नहीं, क्योंकि पिता की नौकरी चली गई, परिवार का निवेश डूब गया। अचानक ऐसी गरीबी आ गई कि लगा, आगे नसीब में केवल अंधेरा है। देश में महिलाओं को उच्च शिक्षा का अधिकार न था और पढ़ने के लिए पेरिस, फ्रांस जाने लायक पैसे भी नहीं थे। ऐसे में, उन्हें आगे कौन पढ़ाता? लेकिन खुद से किया वादा था, हर हाल में पढ़ना है। उन्होंने काफी सोचकर अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला किया। यह अपनी बड़ी बहन ब्रोन्या के साथ किया गया त्याग भरा अनुबंध था। महज 16 वर्षीय मारिया ने 18 वर्षीय बहन से कहा, आप मेडिसिन की पढ़ाई के लिए पेरिस जाइए, मैं आपको पढ़ाई और अन्य खर्च के पैसे भेजूंगी, फिर जब आपकी स्थिति ठीक हो जाएगी, आप मुझे वहां पढ़ने बुला लेना।

बड़की ब्रोन्या पेरिस गईं और छोटकी मारिया ट्यूशन पढ़ाकर पैसे भेजने लगीं। ट्यूशन पढ़ाने का सिलसिला दो साल चला। पेरिस के लिए ज्यादा पैसे चाहिए थे, तो मारिया ने एक ग्रामीण अमीर परिवार के बच्चों की सेवा का काम स्वीकार लिया। पढ़ाई अवैध रूप से संचालित कथित फ्लाइंग यूनिवर्सिटी के तहत चलती रही। आया के रूप में करीब तीन साल बीत गए। इस बीच जिस परिवार में वह आया थीं, उस परिवार के पढ़ाकू लड़के से उन्हें प्यार हो गया। परिवार ने शादी से इनकार कर दिया। फिर क्या, दिल के साथ दुख का पहाड़ भी टूटा। लेकिन भाग्य में तो आगे कई मुकाम लिखे थे। पिता की आर्थिक स्थिति ठीक हो गई। बहन को पैसे भेजने की जरूरत नहीं रही। मारिया 24 की उम्र में पढ़ाई के लिए पेरिस पहुंच गईं। अकेले रहते पढ़ाई निखरी। गरीबी ऐसी कि जब कड़ाके की ठंड पड़ती, तो एक पर एक अपने सभी उपलब्ध वस्त्र पहनने पड़ते। पढ़ाई के जुनून में भोजन भूल जातीं। मेहनत रंग लाई, फिजिक्स में टॉप कर गईं। अगले वर्ष लगा कि गणित की पढ़ाई गरीबी की भेंट चढ़ जाएगी। फिर कमाल हुआ, एक शिक्षक ने छात्रवृत्ति का इंतजाम कर दिया, तो मैरी ने मैथ में टॉप करके दिखा दिया।

कहते हैं, वैज्ञानिक मस्तिष्क चैन लेने नहीं देता, लेकिन कुछ कर गुजरने के लिए प्रयोगशालाओं तक पहुंच नहीं थी। तब जीवन में एक अन्य वैज्ञानिक पियेरे क्यूरी के रूप में एक और कामयाबी नसीब हुई। विज्ञान की राह के दो जुनूनी राही जल्द जान गए कि वे एक-दूजे के लिए बने हैं और 1995 में हमसफर बन गए। वह पेरिस की पहली महिला डॉक्टरेट बनीं। शोध, प्रयोग, खोज, सेवा का ऐतिहासिक सिलसिला चल पड़ा। फिजिक्स में रेडियोएक्टिविटी में नई खोज के लिए नोबेल देने का फैसला हुआ। पुरुष पियेरे को ही नोबेल मिलना था और स्त्री मैरी का नाम दब जाना था, लेकिन फिर ऐतिहासिक फैसला हुआ। पियेरे और मैरी को हेनरी बेक्वेरेल के साथ वर्ष 2003 का नोबेल मिला। प्यारे पति का साथ 2006 में एक दुर्घटना की वजह से छूट गया, लेकिन दुनिया में पहली महिला नोबेल विजेता मैरी की विज्ञान यात्रा थमी नहीं। उन्हें वर्ष 2011 में कैमिस्ट्री में पोलोनियम और रेडियम की खोज के लिए दूसरा नोबेल मिला। दुनिया को उनके योगदानों में एक्स-रे का विकास, रेडियम और रेडियोलॉजी को मानव उपयोग योग्य बनाना प्रमुखता से शामिल है। पुरुषों की दुनिया कुछ सभ्य हुई, तो पेरिस में पहली बार मैरी क्यूरी के रूप में किसी महिला को प्रोफेसर बनाया गया।

दुनिया अद्भुत प्रेरक त्याग से भरी मैरी क्यूरी से वंचित रह जाती, यदि वह पढ़ाई के लिए पोलैंड से पेरिस आने का फैसला न करतीं। मानव सेवा के लिए जिस रेडिएशन से वह निरंतर गुजरीं, वही उनके कैंसर की वजह बना। 4 जुलाई, 1934 को वह दुनिया छोड़ गईं। उसके अगले ही वर्ष उनकी बेटी इरीन जोलियट-क्यूरी और उनके पति फ्रेडरिक जोलियट-क्यूरी को भी नोबेल हासिल हुआ। पांच नोबेल जीतने वाला क्यूरी परिवार दुनिया में आज भी अकेला है। आकर्षण देखिए, आया रहते जिस पढ़ाकू लड़के कज्मीर्ज जोवस्की से वह शादी करना चाहती थीं, वह ख्यात गणितज्ञ हो गए थे। मैरी द्वारा स्थापित रेडियम इंस्टीट्यूट में मैरी की आदमकद प्रतिमा थी। जोवस्की बूढ़े हो गए थे, तब भी आते थे और चुपचाप उस प्रतिमा के पास बैठ जाते थे, श्रद्धा से नतमस्तक। 
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय

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  • Web Title:Hindustan Meri Kahani Column 28th July