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यह बच्ची बड़ी होकर जरूर कुछ बनेगी

पिता अपने कर्म से कोई मिसाल कायम करें, तो बेटियां उस मिसाल को मशाल मानकर आगे बढ़ती हैं। पिता वही हैं, जो बेटियों के पंख और परवाज को विस्तार दें। ऐसी बेटियां खुशनसीब होती हैं, जिन्हें पिता द्वारा...

यह बच्ची बड़ी होकर जरूर कुछ बनेगी
Pankaj Tomarमृणालिनी साराभाई, प्रसिद्ध नर्तकीSun, 28 Apr 2024 12:33 AM
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बेटियों के लिए पिता इस संसार सागर में प्रकाश स्तंभ की तरह होते हैं। किसी भी दिशा में चली जाएं बेटियां, पिता को बार-बार खोजती-निहारती रहती हैं कि न जाने कब पिता अपनी आंखों से कोई बात बोल दें, उनके मुखडे़ पर कोई उम्मीद तैरने लगे, चुपचाप। बहुत थोड़ा बोलेंगे पिता और बहुत कुछ मन में रख लेंगे। बेटियों के लिए न जाने क्या-क्या अच्छा सोचते रहेंगे पिता और बेटियां भी कोशिश में लगी रहेंगी कि पिता को पूरा जान लें। पिता अगर अपने कर्म से कोई मिसाल कायम करें, तो बेटियां भी उस मिसाल को मशाल मानकर आगे बढ़ती हैं। वस्तुत: पिता वही हैं, जो अपनी बेटियों के पंख और परवाज को विस्तार दें और ऐसी बेटियां भी खुशनसीब होती हैं, जिन्हें पिता द्वारा दिखाए गए आकाश में शानदार उड़ान का मौका मिलता है।

वह बेटी भी बड़ी खुशनसीब थी। बैरिस्टर पिता सुब्बाराम स्वामीनाथन अपनी बेटी के अस्तित्व की धुरी थे। उनकी मुस्कराहट, स्नेह से सराबोर चमकती आंखें। पिता ने एक दिन गर्व से कहा कि ‘यह बच्ची बड़ी होकर कुछ बनेगी’ और यह बात गहरे असर कर गई। पिता किसी से डरते नहीं थे, बेटी पर भी असर पड़ा। पिता कभी हिम्मत नहीं हारते थे, तो बेटी ने भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। पिता ने बार-बार कहा, तो बेटी भी बार-बार दोहराने लगी कि मुझे नर्तकी बनना है। जब दूसरे ज्यादातर बच्चे खिलौनों और चॉकलेट के बारे में सोचते थे, तब वह नर्तकी बनने के बारे में सोचती रहती थी। उसने सबको बता दिया, मैं नर्तकी बनूंगी। नृत्य ही मेरी सांस है, मेरा जुनून है। 

पिता तभी कुछ अनमने-से लगते थे, जब वह बेटी वाद्य यंत्र पियानो के अभ्यास से मुंह चुराती थी। बेटी को वह वाद्य यंत्र पसंद नहीं था। वह ठहरी चंचल, किसी एक जगह स्थिर बैठना मुश्किल था। उसे गति और गतिशीलता से गहरा प्रेम था। पिता के सान्निध्य में बेटी साहसी और नवाचारी भी खूब हुई। एक बार मंच पर लकड़ी का घोड़ा दौड़ाना था, बेटी ने ऐसी तेजी से दौड़ाया कि घोड़ा टूट गया, पर वह न रुकी। घोड़ा जब टूटा, तो दूसरे लोग यह मान रहे थे कि नाटिका बिगड़ गई, पर उस बेटी ने नाटिका को रुकने नहीं दिया, सामान्य गति में नाटिका को आगे बढ़ा दिया, अपना किरदार ठीक से निभा दिया। 
पिता ने कुछ कर गुजरने का जुनून ऐसा पैदा कर दिया था कि वह बेटी जब पढ़ाई करने स्विटजरलैंड गई, तो वहां भी विदेशी नृत्य सीखती रही। वह थोडे़ समय के लिए अमेरिका में ‘अमेरिकन एकेडमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट्स’ में भी पढ़ी, पर दिल हिन्दुस्तान खींच लाया। बहुत मुश्किल था फैसला, सब अलग-अलग तरह के नर्तक थे। सब अपनी-अपनी कला में माहिर, पर शांति निकेतन में उस बेटी ने देखा कि कोई छात्र एक साथ कई तरह की कलाएं सीख रहा है। एक साथ अनेक प्रकार के नृत्य सीखना भी मुमकिन है। उस छात्रा की दृढ़ता देख प्रसन्न गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर भी दिशा देने में नहीं चूके। गुरुदेव ने भी इस एहसास को मजबूत किया कि मृणालिनी, तुम्हें नृत्य करने से कोई रोक नहीं सकता। गुरुदेव ने उन्हें अपने नाटक चांडालिका में मुख्य भूमिका दी और उनसे अपने हिस्से की कोरियोग्राफी स्वयं करने को कहा; मृणालिनी ने पहली बार टैगोर के नृत्य नाटकों में भरतनाट्यम की शुरुआत की, जिससे उन्हें पहली बार बहुत सराहना मिली। वह सराहना से बहुत खुश हुईं, उन्हें ऐसा लगा, मानो उनकी आत्मा को किसी ने नृत्य के संसार में पूरी तरह स्वतंत्र कर दिया, अब वह जिधर चाहें, उड़ सकती हैं।  

सीखने की तमन्ना इस कदर प्रबल हुई कि किसी महान गुरु ने भरतनाट्यम सिखाया, तो किसी ने कथकली में पारंगत किया, तो किसी ने मोहिनीअट्टम में सिद्ध बना दिया। गुरु उन्हें सिखाकर धन्य-धन्य हो जाते थे। वह अगर उन्नीस भी सीखती थीं, तो उसे इक्कीस बनाकर पेश कर देती थीं। 
देश की आजादी के बाद साल 1949 में उन्होंने अहमदाबाद में अपना नृत्य विद्यालय खोल लिया। नृत्य ने ही उन्हें सब कुछ दिया। नृत्य ने ही जीवनसाथी महान वैज्ञानिक विक्रम साराभाई तक पहुंचाया। वह मृणालिनी स्वामीनाथन से मृणालिनी साराभाई हो गईं। विक्रम साराभाई जब आजाद भारत में आधुनिक विज्ञान की नींव रख रहे थे, तब मृणालिनी साराभाई भारतीय नृत्य संस्कृति की नींव गढ़ रही थीं। नृत्य में उनकी सृजनशीलता और नवाचार को पूरी दुनिया में पहचान मिली। दुनिया हर वर्ष 29 अप्रैल को नृत्य दिवस मनाती है और तब मृणालिनी साराभाई (1918-2016) को भी जरूर याद किया जाता है।
अपने पापा की इस बेहद कामयाब प्रिय परी को 97 साल लंबा जीवन मिला और वह अपने पिता को अक्सर याद करती थीं, ‘पिता ही मेरी पूरी जिंदगी थे।’ 
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय