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26 फरवरी, 2021|12:25|IST

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वह देखना, जिसे दुनिया देखती है

शिक्षक खूब सिखाते थे, दो जोड़ दो घटाव एक.., लेकिन उस लड़के के जरा भी पल्ले नहीं पड़ता था। पढ़ाई-लिखाई में हाथ इतना तंग था कि एक वाक्य बनाना भी दुर्गम पहाड़ चढ़ने समान था। जाहिर है, जालौर के सिविल लाइंस में रहने वाले साहब के यह कुंवर साहब पहली से छठी कक्षा तक सिफारिश से ही पास किए जाते थे। जो क्लर्क महोदय कुंवर साहब को पास कराने के लिए दौड़-भाग करते थे, वह कुंवर साहब की मां से कहते थे, ‘साहब से तो मत कहिए, लेकिन कुंवर साहब जो हैं, पढ़ाई में एकदम जीरो हैं। मैं इनको पास करवाता रहूंगा, लेकिन इसका जिक्र आप साहब से मत करना’। 
कुंवर साहब लाचार थे, कुछ समझ में आए, तो बोलें। लगभग हर विषय में फेल हो जाते थे, लेकिन कक्षा पार करा दिए जाते थे। पर ऐसा कब तक चलता? माता-पिता को लगने लगा कि अपना लड़का मानसिक रूप से अविकसित है, इसे कुछ समझ नहीं आता। अपने में ही सिमटा, खोया-खोया रहता है। दिल्ली के अच्छे डॉक्टर को दिखा लेना चाहिए। लोग तरह-तरह की सलाह देते थे। चिंता बढ़ ही रही थी कि छुट्टियों में खूबसूरत माउंट आबू जाना हुआ। झील, पठार, पहाड़ के उस बेमिसाल शहर में अचानक छोटी बहन चहक उठी, ‘कितनी अच्छी सड़क है, ऐसा लग रहा है, जैसे रिबन पड़ा चमक रहा हो’। 
बहन की चहक सुनकर भाई अर्थात कुंवर साहब ने भी सिर उठाकर देखा, पर सड़क नजर नहीं आ रही थी, परेशान होकर पूछ बैठे, ‘कौन-सा रिबन पड़ा है?’ तो बहन बोली, ‘सामने वो पहाड़ के पास, दूर, वो नदी किनारे घूम रही है, ऐसा लगता है कि जैसे रिबन पड़ा हो’।
फिर-फिर देखा, पर कोशिश बार-बार नाकाम रही, तो कुंवर साहब परेशान हो उठे, ‘मुझे तो रिबन जैसा कुछ नजर नहीं आ रहा।’ सौभाग्य से यह बात उनके पिता के कानों में पड़ गई। उन्होंने पूछा, ‘तुमको नजर नहीं आ रहा बेटे?’ जवाब मिला, ‘नहीं’। पिता चश्मा पहनते थे। उन्होंने अपना चश्मा उतारा और बेटे को पहना दिया। चश्मा पहनते ही उस 11 साल के लड़के को जिंदगी का पहला झटका लगा। ऐसा झटका कि अचानक कोई बयान नामुमकिन था। आंख ऐसे तो कभी नहीं खुली थी, सामने जो खुला-पसरा हुआ है, वह तो पहले भी होगा, पर अब तक नजर नहीं आया। लड़के को लगा कि इतने साल से तो मैं सो रहा था, एक धुंधली दुनिया में रह रहा था, अब एक-एक चीज नजर आने लगी है। सड़क, नदी, पहाड़, सब नजर के सामने करीब आ गए हैं। पिता की भी  खुशी का ठिकाना नहीं रहा, मर्ज मिल गया था।  
फिर क्या था, जोधपुर में चश्मा बना। जहां ठहरे थे, उस घर की छत से जोधपुर शहर को घंटों देखते रहना किसी महोत्सव से कम नहीं था। जिंदगी पूरी तरह बदल गई। चीजों को देखने की ऐसी लगन लगी कि देखना एक खब्त की तरह हो गया। जहां जा रहे हैं, जहां हैं, जहां सुस्ता रहे हैं, बस देखे जा रहे हैं। अच्छी-अच्छी सुंदर चीजें, विचित्र चीजें, देखते-देखते कभी मन नहीं भरता था। रोशनी कैसी होती है, परछाई कैसे पड़ती है, कैसे रोशनी गिरती है, तो क्या-क्या होता है! सब देखते-देखते रेखांकन की शुरुआत हुई और फिर चित्रांकन, फिल्मांकन की। 
एक चश्मा और उससे देखना, दोनों ने कमाल कर दिया। छठी तक जबरन पास किया गया लड़का अचानक अच्छी पढ़ाई करने लगा। मां से एक एलबम मांगा, तो मां ने कहा, ‘अपने सेक्शन में फस्र्ट आओगे, तो मिल जाएगा’। सातवीं में सेक्शन में फस्र्ट आकर दिखा दिया। पूरे खानदान में खबर फैल गई, इतना तेज तो कोई नहीं निकला था। फिर एक दिन दुकान में एक बॉक्स कैमरा नजर आया, मां से मांगा, तो जवाब मिला, ‘तीनों सेक्शन में फस्र्ट आ जाओगे, तो दिला देंगे’। फिर क्या था, जुट गए कुंवर साहब, कामयाब हो गए, कैमरा मिल गया। तस्वीरें खींचने का सिलसिला शुरू हुआ, जो एक से एक शानदार कलात्मक फिल्मों तक चलता गया। एक लड़का, जो छठी कक्षा तक सबसे फिसड्डी था, वह विश्व और राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित विद्वान फिल्मकार बनकर उभर आया। चश्मा पहनने के बाद प्यार से देखने और दिखाने के जुनून ने ही मणि कौल (1944-2011) को समानांतर सिनेमा का पहला क्रांतिकारी फिल्मकार बना दिया। अपना पहला देखना वह कभी नहीं भूले। साक्षात्कार पुस्तक अभेद आकाश  में उन्होंने बताया है, ‘वह कैमरा अब भी मेरे पास है’। सिनेमा का अध्ययन करने वाले आज भी समझने की कोशिश करते हैं कि मणि कौल कैसे ‘देखते’ थे? उनका ‘देखना’ आभास कराता है कि व्यक्ति सिर्फ देखता है, और जो अलहदा देखता है, उसे दुनिया देखती है। 
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय

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  • Web Title:hindustan meri kahani column 27 september 2020